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सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

९४ शालिहोत्रम् ।
जावडे में बीस दांत, और न निकलने पर केवल अठारह दांत
होते हैं ।
षष्ठे संवत्सरे जाते कालिकादशनद्वये ।
तथा स्यात् सप्तमे वर्षे दाशो दंतचतुष्टये ॥
छठे वर्ष में बीचवाले दो अखण्ड दांतों का गढा भर जाता
है और उनका कालापन भी जाता रहता है, और सातवें वर्ष में
उनके पासवाले और दो दांतों का गढा भर जाता है उनका
कालापन भी जाता रहता है ।
अष्टमे वर्षेऽतीते तु नष्टाः स्युः सर्वकालिकाः ।
नवमेऽथ ते सर्वे पीतत्वं सम्भवन्ति च ॥
आठवें वर्ष में शेष दो दांतोंका गढ़ा भर जाता है और उनका
कालापन भी जाता रहता है और नवें वर्ष में उनमें पीलापन
आने लगता है ।
यावदेकादशं वर्षं तावत् पीतत्वमागतम् ।
तिष्ठन्ति दशनास्तेषां वाजिनां ससिताभ्रमाः ॥
ग्यारहवें वर्ष तक पीलापन बढता रहता है, इसके पश्चात् उन
में सफेदी की झलक मारने लगती है ।
ततः श्वेताः प्रजायन्ते चतुर्दशसमाश्रिताः ।
ततः काचप्रभास्तदृक् यावत् संवत्सरास्त्रयः ॥
तदन्तर चौदह वर्ष की अवस्था पर पहुँचने पर दांत फिर
सफेद होजाते हैं, फिर सत्रह वर्ष की अवस्था तक कांच के
तुल्य रहते हैं ।
तावत्संवत्सरादूर्ध्वं यावद्वर्षाणि विंशतिः ।
माक्षिकाभा रदास्तेषां यावद्वर्षत्रयं पुनः ॥ ४ण