शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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तरह अयाल और दुमके वालों को भी कंघी से साफ कर
देना उचित है !
प्रत्येक साल में दोवार कार्तिक और फाल्गुन के महीनों में
घोडे के पुराने रोम गिर जाते हैं और उनके बदले में नये
आते हैं इस लिये उस समय खुग्हरा न करना चाहिये ।
गर्मी की ऋतुमें बहती हुई स्वच्छ नदी में वा निर्मल तालाब
में घोडे को स्नान कराकर सूखे कपडे से पोंछ देना चाहिये,
परन्तु इस काम को प्रति दिन नहीं करना चाहिये ।
परिश्रम का वर्णन-जिस घोडे पर प्रतिदिन सवारी का काम
न पडता हो तो एक ही स्थान में लगातार कई दिन तक बँधे
रहने से वह बीमार होजाता है, परिश्रम करने की आदत कम
होती है और फिर किसी दिन यकायक अधिक परिश्रम करने
का काम पड़जाय तो भारी हानि की सम्भावना होती है; पैर
फूल जाते हैं वा लँगडाने लगते हैं, फेंफडे में रोग होजाता है
और कभी २ ज्वर भी हो जाता है. इसलिये प्रतिदिन घण्टे दो
घण्टे खुले मैदान में ले जाकर परिश्रम का काम लेना बहुत ही
आवश्यकीय है । प्रतिदिन परिश्रम करते रहने से देह चुस्त
और फुर्तीली बनी रहती है, प्रतिदिन शक्ति बढती चली
जाती है; मिहनत करने से कभी जी नहीं चुराता है, और न
व्याकुल होता है । घुडदौड और शिकार के घोडों से तो ऐसा
परिश्रम कराना बहुत ही आवश्यकीय है । जिसको परिश्रम-
करने की प्रकृति पड़ जाती है वह कभी कोई भारी काम
आ पड़ने पर भी सहज में कर लेते हैं। जो प्रतिदिन
ऐसा ही परिश्रम काम में लाया जाय तो बुढापे में भी