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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 130 में से

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पृष्ठ 31

९२ शालिहोत्रम् ।
घोडा वैसाही परिश्रम करते रहते हैं, मिहनतसे परिश्रान्त नहीं
होते हैं ।
परिश्रम आदि की रीति-घोडे पर सवारी करते ही उसे
बहुत वेग से नहीं चलाना चाहिये, प्रथम ही धीरे धीरे चलावे
फिर वेग से परन्तु रोकने के समय एक साथ रोक भी न लेना
चाहिये, जैसे धीरे धीरे उसका वेग बढाया था वैसे ही धीरे
धीरे उसका वेग कम करके रोकना चाहिये ।
परिश्रम के पीछे उसी समय उसे घुडसाल में ले जाकर न
बांध देना चाहिये, किन्तु स्वच्छ पानी से उसके मुख के फेन
और अंड तथा उसके छोर पास के फेन धोकर इधर उधर
टहलावे, जब पसीना सूख जाय तब घुडसाल में लेजाकर बांध
दे और सूखी घास से उसका शरीर रगड कर कपडे से पोंछ
डाले ऐसा करने से उसकी सब थकावट दूर होजाती है तब
उसकी पिछाडी बांध कर उसके सामने सूखी घास डाल देवे ।
गर्भादि धारण विधि-घोडी सांड़ के अनुसार बच्चा देती है ।
कभी २ गर्भधारण के समय उत्तम जाति का घोडा उसके सम्मुख
लाकर खडाकर देते हैं, इससे भी उत्तम बच्चा होने की संभावना
होती है ।
घोडी के ग्यारह महीने में बच्चा हुआ करता है और पैदा
होते ही खुर से जानु तक जितनी ऊंचाई होती है,
उससे तिगुनी ऊंचाई उस बच्चे की युवावस्था में होती है ।
जब बच्चा पैदा होता है तब उसके मुख के सामने कोई
दांत नहीं होता है । परन्तु जावडे के दोनों किनारों पर दो २
पेषण दंत निकला करते हैं जिन में से एक को प्रथम पेषण

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