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सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

( ३३ )
ध्वन्यात्मक स्थिति का प्रयोग अश्वघोष के सिद्धार्थ नन्द ने 'मार' की सेना को
पराजित करने में किया है। इसका एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा—
'ततः स बोध्यङ्गशितात्तशस्त्रः सम्यक्प्रधानोत्तमवाहनस्थः ।
मार्गाङ्गमातङ्गवता बलेन शनैः शनैः क्लेशचमूं जगाहे ॥'
—सौ० न० १७।२४
यहाँ कवि का प्रधान लक्ष्य शान्तरस ही है, वीररस नहीं। शान्तरस
के विभाव के रूप में संसार की दुःखमयता तथा नारी-सौन्दर्य की बीभत्सता
का वर्णन जो इनके काव्य में हुआ है, वह बड़ा तीव्र है—
'मलपङ्कधरा दिगम्बरा प्रकृतिस्थैर्नखदन्तरोमभिः ।
यदि सा तव सुन्दरी भवेन्नियतं तेऽद्य न सुन्दरी भवेत् ॥
स्रवतीमशुचिं स्पृशेच्च कः सघृणो जर्जरभाण्डवत् स्त्रियम् ।
यदि केवलया त्वचावृता न भवेन्मक्षिकपत्रमात्रया ॥'
— सौ० न० ८।५१-५२
यदि वह सुन्दरी मलरूपी कीचड़ से युक्त और विवस्त्र हो जाए और
उसके नख, दाँत और रोम स्वाभाविक अवस्था में ही आ जाय तो भला कैसी
लगेगी ? इतना ही नहीं, कौन ऐसा घृणित व्यक्ति है, जो टूटे-फूटे बर्तन की तरह
झरती औरत को छू भी सकेगा, अगर मक्खी की पाँख जैसी चमड़ी से वह
ढँकी न हो।
इसी प्रकार अश्वघोष का प्रकृति-वर्णन भी अपने ढंग का ही है। इनके
प्रकृति-चित्रण के अनेक स्थल है। इसके लिए 'बुद्धचरित' का तृतीय और
सप्तम सर्ग तथा सौन्दरनन्द का सप्तम और दशम सर्ग हैं। यहाँ कवि की
निरीक्षण की सूक्ष्मता, नवीनता, हृदय की सरलता और कल्पना की
कमनीयता पायी जाती है। अश्वघोष ने प्रकृति को मूक, चेतनाहीन अथवा
निष्प्राण न मानकर उसमें यत्र-तत्र जीवन-ज्योति जगाने की चेष्टा की है।
फलतः उसमें भी सुख या दुःख की संवेदनशीलता की अनुभूति पाठकों को
होती है। अन्तःप्रकृति और बाह्यप्रकृति की रुचिर सामञ्जस्यपूर्ण उद्भावना
इन्होंने अपने महाकाव्यों में करने की चेष्टा तो की है, परन्तु उसमें इनका मन
रमा नहीं है। सौन्दरनन्द के सप्तम-सर्ग की प्रकृति प्रिया-विरही नन्द के लिए
'उद्दीपन का काम करती हैं—
'स्थितः स दीनः सहकारवीथ्यामालीनसम्मूर्च्छितषट्पदायाम् ।
भृशं जजृम्भे युगदीर्घबाहुर्ध्यात्वा प्रियां चापमिवाचकर्ष ॥'
—सौ० न० ७।३
लगता है वाल्मीकि या कालिदास के प्रकृति-वर्णन के प्रति इस कवि का मोह या
आसक्ति नहीं है। संभवतः ऐसे स्थलों में भिक्षु अश्वघोष के लिए प्रकृति भी

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विकृति का कारण बन गई है। कालिदास के काव्यों में प्रकृति का सर्वाङ्गपूर्ण
वर्णन हुआ है। भवभूति का प्रकृति-वर्णन भी अद्वितीय है। इनका प्रकृति-वर्णन
संश्लिष्ट एवं चित्रोपम है। ये प्रकृति के कोमल तथा कठोर दोनों रूपों के
वर्णन में सिद्धहस्त हैं। इन्होंने प्रकृति का वर्णन आलम्बन के रूप में किया
है। कालिदास का प्रकृति-चित्रण सप्राण सजीव एवं मानवीयकृत है। यदि
कालिदास की प्रकृति का वर्णन अनलंकृत है, तो भवभूति की प्रकृति अनाविल
नैसर्गिक-सौन्दर्य के साथ अलंकार की अनावश्यक अलंकृति से बचती है।
फिर भी प्रकृतिवर्णन प्रभावोत्पादक है। कालिदास और भवभूति के प्रकृति-
वर्णन के सामने सौन्दरनन्द या बुद्धचरित का वर्णन नीरस एवं चलता-सा
दिखलायी पड़ता है।
अश्वघोष का प्रमुख ध्यान अपने प्रतिपाद्य वर्ण्य-वस्तु की ओर अधिक है।
शैली, अलङ्कार, या छन्दोविधान की अभिव्यञ्जनाप्रणाली आनुषङ्गिक है।
यह बात अलग है कि वर्ण्य-वस्तु के साथ ये प्रयोग कहीं-कही अत्यधिक प्रभा-
वोत्पादक या सटीक बन गया है। यह अनायास है, सायास नहीं। कारण
स्पष्ट है, अश्वघोष का दृष्टिकोण कलावादी नहीं है। इनके काव्य में
अश्वघोष का त्रिविध व्यक्तित्व का त्रिकोणात्मक संघर्ष सर्वत्र परिप्रेक्ष्य में है।
कहीं इनकी दार्शनिकता इनके कवित्व पर हावी है, तो कभी इनकी धर्मोप-
देशिकता इनके दर्शन पर भारी है। अतः इनका वर्ण्य-विषय इनकी विधा-
भिव्यञ्जना के बीच असामञ्जस्य जैसा लगता है। इन सभी तथ्यों के
बावजूद इनमें कुछ ऐसी विशेषता है, जो अनायास पाठकों को अपनी ओर
आकृष्ट कर लेती है। कलात्मक विशेषता नहीं रहने के बावजूद अश्वघोष
की काव्यप्रतिभा प्रशंसनीय है।
अश्वघोष की शैली पर जब हम विचार करते हैं तब हमें यह स्पष्ट प्रतीत
होता है कि कवि ने सर्वत्र सुगम भाषा और वैदर्भीरीति को ही प्रश्रय दिया है।
इनकी वर्ण्य-वस्तु की भाषा सुगम एवं सरल है। इनकी शैली परिष्कृत एवं
परिमार्जित है। इनका शब्द-विन्यास सरस, शोभासम्पन्न, विशद और अधिक
अभिव्यञ्जक है। आकर्षक, सरस, प्रवाहमय काव्य के माध्यम से जन-जन तक
बौद्धधर्म का प्रचार-प्रसार इनके काव्य का प्रमुख लक्ष्य था। यही कारण है
कि इनकी शैली प्रसादमयी सरलता के साथ माधुर्य उत्पन्न करती है। इन्होंने
अपने काव्यों में सामासिक शब्दों का प्रयोग तो किया है, परन्तु सदैव दीर्घ और
क्लिष्ट सामासिक पद-विन्यास से बचते रहे हैं। इस दृष्टि से इनकी समग्र
रचनाएँ कृत्रिमता तथा अस्वाभाविकता से सर्वथा दूर हैं। अश्वघोष ने तो
गम्भीर दार्शनिक विचारों को भी अत्यन्त सरल भाषा में प्रकट किया है।
निम्न श्लोक उदाहरणार्थ दर्शनीय है—

( ३५ )
‘दीपो यथा निवॄतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्।
दिशं न काञ्चिद्विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥’
—सौ० न० १६।२८
‘जिस तरह निर्वाण को प्राप्त हुआ दीपक न पृथ्वी पर रहता है न आकाश
में जाता है, न किसी दिशा या विदिशा में, किन्तु तेल समाप्त हो जाने पर
केवल शान्ति को प्राप्त होता है।’ इस तरह इनकी भाषा में सरलता के
साथ सुबोधता भी मिलती है। कुछ विद्वानों की राय में तो अश्वघोष की
उपमाएँ कालिदास से भी बढ़कर हैं। इस कथ्य के समर्थन में उन्होंने दोनों
की उपमाओं की निम्न-लिखित तुलना की है—
कालिदास ने कुमारसंभव में पार्वती के लिए लिखा है—
‘मार्गाचल व्यतिकराकुलितेव सिन्धुः।
शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥’
राह में आये पहाड़ से क्षुब्ध नदी की तरह पार्वती न तो आगे बढ़ पाती थीं
और न ठहर ही पाती थीं। अब ऐसे ही भाव को व्यक्त करने वाली अश्वघोष
की एक उपमा द्रष्टव्य है—
'सोऽनिश्चयान्नापि ययौ न तस्थौ ।
तरंस्तरङ्गेष्विव राजहंसः ॥'
—सौन्दरनन्द ४।४२
तरङ्गों में तैरते हुए राजहंस की तरह वह अनिश्चय के कारण न तो गया
ही और न ठहरा ही। कुछ आलोचकों ने तरंगों में तैरते हुए राजहंस का निश्चय
संदिग्ध माना है। अतः कालिदास की अपेक्षा अश्वघोष की उत्कृष्टता इससे
सिद्ध नहीं होती। एक अन्य तुलना भी इस दृष्टि से देखना अपेक्षित है।
रघुवंश में राजा दिलीप के लिए प्रयुक्त कालिदास की निम्नलिखित उपमा—
‘व्यूढोरस्को, वृषकन्धः शालप्रांशुर्महाभुजः ।’
—रघु० १।१२
इसी तरह नन्द का वर्णन करते हुए अश्वघोष की एक तुलना—
‘दीर्घबाहुर्महावक्षः सिंहांसो वृषभेक्षणः’ ।
—सौ० न० २।५८
इस सन्दर्भ में श्रीचट्टोपाध्याय का तो मत यहाँ तक है कि—‘कालिदास ने
यहाँ दिलीप की आंखों की ओर आंख उठाकर देखा ही नहीं, वह तो उसके
कंधों को सांढ़ के कन्धे की तरह ही देख रहा है। अश्वघोष ने कुछ भेद रखना
चाहा और अपना भेद स्वयं खोल डाला।’ इस संदर्भ में विशेष अध्ययन के
लिए द्रष्टव्य है—
‘Date of Kalidas’—Kshetresha Chattopadhyaya ( Reprint
form the Allh, University Studies Vol. II 1926 p. 82–106 )

( ३६ )
इन सारी आलोचना-प्रत्यालोचनाओं के बावजूद इतना तो असंदिग्ध रूप
से कहा जा सकता है कि अश्वघोष ने अलंकार के लिए अलंकारों का प्रयोग
नहीं किया है। यह बात अलग है कि उनके काव्यों में सभी प्रमुख साधर्म्य-
मूलक अलंकारों का सुन्दर प्रयोग देखने को मिलता है। एक उपमा—
'अथो नतं तस्य मुखं सबाष्पं प्रवास्यमानेषु शिरोरुहेषु ।
वक्राग्रनालं नलिनं तडागे वर्षोदकक्लिन्नमिवावभासे ।।'
—सौ० न० ५।५२
इसी तरह रूपक का एक उदाहरण जिसमें दोषों में अगाध-सागर का, छल-
कपट में जल का और आधियों में जन्तु का आरोप अत्याकर्षक है—
'स हि दोषसागरमगाधमुपधिजलमाधिजन्तुकम् ।
क्रोधमदभयतरङ्गचञ्चलं प्रततार लोकमपि च व्यतारयत् ॥'
—सौ० न० ३।१४
इसी प्रकार से संभावनाार्थक उत्प्रेक्षा का एक मनोहर उदाहरण बुद्धचरित
के अष्टमसर्ग का ३७वाँ श्लोक है। इसी तरह व्यतिरेकालङ्कार का एक सटीक
उदाहरण—
'प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुजङ्गमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः ।
क्वचिच्च कश्चिच्च दशन्ति पन्नगाः, सदा च सर्वं च तुदन्ति धातवः ।।'
—सौ० न० ९।१३
यद्यपि अश्वघोष के लिए न अलङ्कार अनिवार्य है और न इनके काव्य। वह
साध्यरूप मे ही है। फिर भी अपने अन्तर्निष्ठ चमत्कार-सौष्ठव के विश्लेषण
में अपने कथन को प्रभावोत्पादक बनाने के क्रम में, सौष्ठव के विश्लेषण क्रम में
ही इन्होंने साधर्म्यमूलक अलंकारों का प्रयोग किया है। ये अलंकार उनकी
अनुभूति-साधन को उत्कर्ष प्रदान करते हैं। इनके अतिरिक्त अनुप्रास तथा
यमक जैसे शब्दालङ्कारों का प्रयोग भी इनके भावों को व्यक्त करने में प्रेरणा-
रूप सिद्ध हुए है। इनके एक-दो उदाहरण ही पर्याप्त होंगे। अनुप्रास का
उदाहरण—
'चलत्कदम्बे हिमवन्नितम्बे तरौ प्रलम्बे चमरो ललम्बे ।'
—सौ० न० १०।११
इसी प्रकार यमक का प्रयोग—
'प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुजङ्गमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः ।
क्वचिच्च कश्चिच्च दशन्ति पन्नगाः सदा च सर्वञ्च तुदन्ति धातवः ॥'
—सौ० न० ९।१३
इन अलंकारों के प्रयोग से इनकी कविता में तो विविधता आई ही है,
साथ ही इनका अभिनवप्रयोग भी कवि की प्रतिभा का ही द्योतक है।

( ३७ )
वैसे अश्वघोष ने सुन्दरी के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त सरलता के साथ
बड़ा ही प्रभावपूर्ण किया है। आदर्श अनुराग के चित्रों में तो इसने सजीवता
ही उत्पन्न कर दी है। अश्वघोष एक विशिष्ट कोटि के वैयाकरण थे। इनके
महाकाव्यों में ऐसे अनेक स्थल हैं, जहाँ इन्होंने अप्रचलित अपाणिनीय शब्दों
का प्रयोग किया है। जैसे—उन्होंने 'अस्' धातु का प्रयोग उपमा द्योतक के रूप
में तीनों कालों में निष्पन्न 'अस्ति' का प्रयोग निपात के रूप में किया है—
'त्रिषु कालेषु सर्वेषु निपातोऽस्तिरिव स्मृतः ।'
—सौ० न० १२।१०
सौन्दरनन्द के द्वितीय सर्ग के निम्नलिखित श्लोक में 'लुङ्' के प्रयोगों में
पाण्डित्य प्रदर्शन करते हुए 'मां' 'मि' और 'मी'—तीनों धातुओं के कर्मणि
प्रयोग में सिद्ध होने वाले धातुरूपों का प्रयोग हुआ है—
अश्रान्तः ••• ••• ••• ••• यज्ञभूमिममीमपत् ।
••• ••• ••• ••• निरुद्विग्नानमीमपत् ॥
••• ••• ••• ••• ••• सोमममीमपत् ।
••• ••• ••• ••• •••सैन्यममीमपत् ॥
—सौन्दरनन्द २।३५-३६
इसी तरह 'दा' धातु का प्रयोग द्वितीय सर्ग के ३२ से ३४ श्लोक तक
अपाणिनीय है। इसी तरह कुछ संज्ञावाचक शब्द है, जिनका लिङ्ग अव्यवस्थित
है। जैसे—
'सूर्यरश्मिभिरक्लिष्टं पुष्पवर्षं पतात खात् ।' —सौ० न० २।५३
'सन्ध्याय मित्रं' —सौ० न० १७।५६
'विभूषणश्रीन्निहिते प्रकोष्ठे' —सौ० न० ६।२७
इसी तरह इनके कुछ उपमान भी अटपटे हैं। जैसे—
'सिंहांसोद्वृषभेक्षणः' कंधे सिंह की तरह और आंखे बैल की तरह, यहाँ
आँखों की तुलना बैल की आँखों से अनुचित लगती है।
इसी तरह छन्दों के प्रयोग में भी अश्वघोष सिद्धहस्त हैं। 'उद्गाता'
जैसे कम प्रयोग में आनेवाले छन्द का भी बड़ी सफलता के साथ प्रयोग करके
दिखलाया है। छन्द काव्य में संगीतात्मकता उत्पन्न करते हैं। बिना संगीत के
काव्य में सम्प्रेषणीयता उत्पन्न नहीं हो पाती। संगीत और काव्य का अत्यन्त
घनिष्ठ सम्बन्ध है। भावहीन संगीत और छन्द-विहीन काव्य शुष्क रचना है।
इसीलिए संगीत और साहित्य दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं—
'सङ्गीतमथ साहित्यं सरस्वत्याः स्तनद्वयम् ।
एकमापातमधुरमन्यदालोचनामृतम् ॥'

( ३८ )
छन्द प्रयोग में ही कवि की योग्यता परखी जाती है। यह एक ऐसी कसौटी
है, जहाँ कवि के भाषाज्ञान की परीक्षा होती है। कविता में भाषा, रीति,
गुण, अलंकार और छन्द का सहयोग भावों को उत्कर्ष पर पहुँचाता है। इनके
सहयोग से काव्य स्वयं उत्कृष्ट बन जाते हैं। इस दृष्टि से अश्वघोष की
शैली विषयानुकूल और सर्वत्र सशक्त है। सौन्दरनन्द के शब्द-शब्द में कवि-
कौशल का उत्कृष्टतम रूप झलकता है। शब्दों का सुन्दर चयन और उनका
विन्यास अश्वघोष के प्रकाण्ड पाण्डित्य का प्रदर्शन करता है। इस दृष्टि से
काव्य और भावपक्ष दोनों ही सुन्दर हैं। वैसे तो इन्होंने कुल सोलह तरह के
छन्दों का प्रयोग सफलतापूर्वक सौन्दरनन्द में किया है, किन्तु सुवदना, शिख-
रिणी, शार्दूलविक्रीड़ित, प्रहर्षिणी, रुचिरा, उद्गता, सुन्दरी, मालिनी, वसन्त-
तिलका, वंशस्थ, उपजाति, पुष्पिताग्रा, अनुष्टुप् आदि छन्दों का भी प्रयोग
किया है। आदिकवि वाल्मीकि की तरह इन्हें भी अनुष्टुप् के प्रति आसक्ति है।
संगीत की दृष्टि से प्रहर्षिणी और रुचिरा का प्रयोग अधिक सफल हुआ है।
संस्कृत महाकाव्यों में अश्वघोष का स्थान
संस्कृत महाकाव्यों की परम्परा में महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि और
उनकी रामायण को प्रथम महाकाव्य कहा जाता है। अश्वघोष को इस काव्य-
परम्परा की पहली श्रेणी में तो हम नहीं रख सकते, क्योंकि इनके एक ओर
रसवादी कवि कालिदास हैं तो दूसरी ओर कलावादी माघ और हर्ष जैसे महा-
कवि हैं। फिर भी इनमें कुछ विशिष्टता है, जिसका संकेत हम पूर्व ही कर चुके
हैं, जो इन्हें महत्त्वपूर्ण बना दिया है। अश्वघोष में ही हमें सर्वप्रथम कुछ ऐसी
काव्य-रूढ़ियाँ मिलती है, जिनका प्रयोग कालिदास से श्रीहर्ष तक मिलता है।
इनकी शैली में वाल्मीकीय शैली का उदात्त उत्कर्ष मिलता है। पाश्चात्य
कवि मिल्टन ने कविता को सादा, प्रत्यक्षमूलक और रागात्मक कहा है—
'Poetry should be simple, senseous and passionate'
अश्वघोष की कविता में प्रायः इन तीनों गुणों का समावेश है। इनकी
कविता में माधुर्य का मधुर निवेश, प्रसाद की स्निग्धता, पदों की सरलता,
वैराग्य की शीतलता, दर्शन का सौष्ठव, यत्र-तत्र अलंकारों और छन्दों का उप-
युक्त प्रयोग इन्हें कुछ पृथक् महत्त्व देते हैं। ये गुण ही इन्हें संस्कृत-महाकाव्यों
का प्रतिनिधि कवि मान लेने को विवश कर देते हैं। अश्वघोष के दोनों महा-
काव्यों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सफल चित्रण हुआ है। अपने
उदात्त एवं उन्नत हृदय को भिक्षु-कवि अश्वघोष ने संसार की असारता और
मानव-जीवन के शाश्वत मूल्यों के बीच रखकर जो संवेदना, जैसी अनुभूति
आपने प्राप्त की है, उसकी अभिव्यंजना और स्पष्ट अभिव्यक्ति इनके दोनों
महाकाव्यों में दर्शनीय है। आपकी कविता दुःखपूर्ण मानव-जीवन को दुःख से

( ३९ )
छुटकारा दिलाने के लिए हृदय के तड़पते उद्गारों की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
परोपकार की भावना से ओत-प्रोत आपके महाकाव्य इसीलिए लोकप्रिय हैं।
इन्होंने अपने दोनों ही महाकाव्यों में कुछ ऐसी रूढ़ियों का प्रयोग किया,
जिनका अनुकरण परवर्त्ती कवि कालिदास से लेकर श्रीहर्ष तक ने किया है।
बुद्धचरित के तृतीय सर्ग के १२ से २४ श्लोक तक इन्होंने उन लालायित
ललनाओं का वर्णन किया है, जो वन-विहार के लिए निकले बुद्ध-दर्शन के
लिए व्याकुल हैं। हो सकता है यह उद्भावना अश्वघोष की मौलिक न हो,
परन्तु पाठकों को इनके प्रथम दर्शन तो यहीं होते हैं। इस परम्परा का अक्षुण्ण
अनुकरण या निर्वाह महाकवि कालिदास ने भी रघुवंश एवं कुमारसंभव के
सप्तम सर्ग में किया है। इस परम्परा का अनुसरण माघ के तेरहवें सर्ग में और
श्रीहर्ष-रचित नैषध के सोलहवें सर्ग में अक्षुण्ण रूप में मिलता है। दूसरी रूढि
अश्वघोष की रूखड़ी परन्तु सप्राण प्रकृति-वर्णन की है, जहां वन के पेड़-पौधे
भी जीवन्त प्राणी की तरह व्यवहार करते हैं—
‘हारान् मणीनुत्तमकुण्डलानि केयूरवर्याण्यथ नूपुराणि।
एवंविधान्याभरणानि यत्र स्वर्गानुरूपाणि फलन्ति वृक्षाः ॥’
—सौ० न० १०।२३
वन के सारे वृक्ष हारों, मणियों, उत्तम कुण्डलों, उत्तम केयूरों, नूपुरों
और स्वर्ग के अनुरूप ऐसे ही आभूषणों के फल देते हैं। इसी तरह इसी
सर्ग के—
‘नानाविरागाण्यथ पाण्डराणि सुवर्णभक्तिव्यवभासितानि ।
अतान्तवान्येकघनानि यत्र सूक्ष्माणि वासांसि फलन्ति वृक्षाः ॥’
—सौ० न० १०।२२
उस वन के वृक्ष अनेक रंगों के, सफेद रंग के, सुवर्ण-रेखाओं से उज्ज्वल,
पत्ते के समान तन्तुरहित घने परन्तु पतले कपड़े फलते हैं। कहने का तात्पर्य यह
है कि वृक्षों के द्वारा वस्त्राभरणों को देने की परम्परा अश्वघोष ने संचालित
की, उसका परिष्कृत एवं प्रस्फुट स्वरूप कालिदासकृत अभिज्ञानशाकुन्तलम् के
चतुर्थ अंक में दृष्टिगोचर होता है। शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वन के
लता-पादपों ने उन्हें इन्हीं उपहारों से लाद दिया है।
मनुष्य तथा प्रकृति—दोनों का मंजुल सम्पर्क तथा अद्भुत एकरसता
की परम्परा कायम कर अश्वघोष ने प्रकृति के भीतर स्फुरित होने वाले हृदय
को पहचाना है। अश्वघोष ने अपने समस्त चित्रणों द्वारा मानव-जीवन के
साथ आदर्श की स्थापना ही नहीं की है प्रत्युत् दुःखमय इस संसार-चक्र से
मुक्ति के उपाय का भी संधान किया है। संस्कृत-साहित्य के महाकाव्य के
पाठकों के लिए अश्वघोष का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि वे एक महत्त्व-
र्ण कवि है, प्रत्युत् इस परम्परा में उनका यह भी महत्त्व है कि उनके पर-

( ४० )
वर्ती महिमाशाली कवियों को ठीक से समझने के लिए अश्वघोष को ठीक से
समझना आवश्यक है ।
अश्वघोष के महाकाव्यों का एकमात्र संदेश है कि त्याग, तपस्या, जनन-
मरण जन्य दुःख से मुक्ति का अन्वेषण ब्रह्मचर्य रहकर, विषयोपभोग त्यागकर
तपोमय जीवन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । क्षुद्र-स्वार्थपूर्ण जीवन का
उद्धार त्याग से होता है । मनुष्य की सच्ची उन्नति संयम-नियम से ही संभव
है । संसार में जन्म लेकर वासना के हाथों का खिलौना बनकर जीना ही मानव
जीवन की सार्थकता नहीं है, प्रत्युत् आत्मोपलब्धि से ही जन्म लेने की सार्थ-
कता सिद्ध होती है, उसी से निःश्रेयस् की प्राप्ति होती है । मानव-जीवन के
इस महत्त्वपूर्ण संदेश के लिए भी संस्कृत महाकाव्यों की परम्परा में महाकवि
अश्वघोष अविस्मरणीय हैं और रहेंगे ।

संक्षिप्त कथावस्तु
प्रथम सर्ग
प्रथमसर्ग में कपिलवस्तु के वर्णन-क्रम में शाक्यों का वर्णन है। प्रथम
तीन सर्गों में शाक्यों की वंश-परम्परा, सिद्धार्थ-जन्म, निष्क्रमण, बुद्धत्व की
प्राप्ति में बुद्धचरित के पूर्वार्ध की कथा का ही संक्षिप्त रूप परिलक्षित होता
है। परम धार्मिक, तपःपूत, सिद्धपुरुष कपिल गौतम एक मुनि थे। उनका
आश्रम हिमाचल में था। एक बार इक्ष्वाकुवंश के दो राजकुमार घूमते-
फिरते वहाँ पहुँचे। दोनों ही भाई अपने पिता के सत्य की रक्षा के लिए
वनाञ्चल में घूम रहे थे। बड़ा भाई जितना ही संयमित था, छोटा उतना ही
उद्दण्ड। कपिलमुनि का आश्रम उनके मन को भा गया। वे दोनों मुनि
कपिल गौतम के शिष्य बन गये। कपिल गौतम का आश्रम शाकवन में था।
कपिल गौतम के शिष्यत्व के कारण गौतमगोत्रीय तथा शाकवन में रहने के
कारण शाक्य-मूलक विख्यात हुए। गुरु ने शिष्यों को एक समृद्ध नगर बसाने
का आदेश दिया। मुनि के स्वर्गारोहण के पश्चात् राजकुमारों ने वहाँ गुरु के
नाम पर 'कपिलवास्तु' नामक एक समृद्ध नगर बसाया।
द्वितीय सर्ग
कपिलवास्तु के प्रथम नृपति शुद्धोदन हुए। अपनी शासन-व्यवस्था और
प्रजावत्सलता के कारण ये बड़े ही लोकप्रिय प्रशासक बने। रक्षा-व्यवस्था
के कारण प्रजा समृद्ध एवं सुखी थी। इनके सुशासन में विद्वान् सम्मानित
थे। सामन्तगण भय से नहीं, अपितु श्रद्धा और प्रेम से उनकी आज्ञा का पालन
करते थे। राजा शुद्धोदन नीतिज्ञ, प्रजापालक तथा एक राजा के कर्त्तव्य
से पूर्णतया परिचित थे। प्रजा को प्रसन्न करने के लिए सतत प्रयत्नशील थे।
राष्ट्र धन-धान्य से समृद्ध था। उसके उत्तम व्यवहारों से प्रसन्न होकर लोग प्राण
देकर भी उसका हित चाहते थे। राज्य में कभी अनुचित कर नहीं लगाया
गया। इन्होंने आपद्ग्रस्तजनों को अपनाया, सुजनतावश शत्रुओं के गुणों की भी
सराहना की। अपनी प्रज्ञा से सभी को प्रसन्न किया। धर्म-जिज्ञासुओं ने इस
धार्मिक राजा को निष्ठा और श्रद्धा से सम्मानित किया। तृषित देवताओं ने
इसके घर अवतार लेना चाहा।
एक रात राजमहिषी माया ने एक विचित्र स्वप्न देखा। तदनुसार छः
दाँत वाले एक श्वेत गजराज ने उसके गर्भ में प्रवेश किया। इसे स्वप्नविदों ने
यशस्वी राजकुमार के जन्म की सूचना बतलाया। शुभलग्न एवं मंगलकारी
वातावरण में सिद्धार्थ ने गौतम के रूप में अवतार लिया। शुद्धोदन की छोटी

( ४२ )
रानी से नन्द ने जन्मग्रहण किया। यह अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक था।
रूपवान् होने के कारण इसका नाम सुन्दर पड़ा। दोनों राजकुमारों का विधिवत्
उपनयनादि संस्कार यथावसर हुआ। गौतम बुद्ध के विमातृज कामासक्त कुमार
था। सिद्धार्थ विषयोपभोग से विरत थे। बूढे, रोगी और एक शव को देखकर
सिद्धार्थ का मन अत्यन्त उद्वेलित हो उठा। एक रात प्रसूतिगृह में अपनी पत्नी
यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़ कर मोक्षप्राप्ति के लिए महाभिनिष्क्रमण
किया।
तृतीय सर्ग
वन में सिद्धार्थ ने अनेक तपस्वियों और सन्तों के दर्शन किये। साधुओं
को विषयतृष्णा से कृपण पाया। सन्तों के रूप को स्थिर नहीं देखा। वहाँ
से वह लौट गया। मोक्षवादी अराड़ और उद्रक की उपासना की। इन्होंने
उसे भी तथ्यहीन ही समझा। अनिश्चित मन से पन्थों और शास्त्रों में कौन श्रेष्ठ
हैं? इस विचार को ही छोड़कर दुष्कर तप में मन लगाया। यहाँ भी उसका
मन नहीं रमा। मोक्ष चाहने वाला दार्शनिक संसार को काम का राज्य
समझता है। 'मार'-विजय के बाद ही वह परमशान्ति प्राप्त करता है। इसी-
लिए सिद्धार्थ कामविजय के लिए बद्धपरिकर हुए। गया में एक पीपल
वृक्ष के नीचे वे ध्यानमग्न हुए। मार-पराजय से देवगण प्रसन्न हुए। अवि-
नाशी परमार्थ को सिद्धार्थ ने पहचाना। सत्य, धैर्य, ज्ञान, समाधि, विनय
और नियम का लोगों को उन्होंने उपदेश दिया। काशी, गया और गिरिव्रज
( राजगिर ) में लोगों को उपदेश दिया। फिर अज्ञान के कारण विविध
मार्गों पर चलते पितृनगर के लोगों का अन्धकार दूर किया। दर्शनेच्छुक समा-
गत पिता को विनीत बनाने की इच्छा से सुगत आकाशगामी बन गये।
आनन्दविभोर प्रजा ने झुककर उन्हें सम्मानित किया।
चतुर्थ सर्ग
चतुर्थ सर्ग में नन्द तथा सुन्दरी के विहार का वर्णन है। नन्द एवं सुन्दरी
एक-दूसरे प्रति अनन्यासक्त हैं। वे दोनों एक-दूसरे के प्रति चकवा-चकई की
तरह समर्पित हैं। एक के बिना दूसरे को चैन नहीं है। एक दिन विहार करते
समय ही कोई दासी नन्द को आकर सूचना देती है कि भिक्षाटन के लिए
तथागत उसके दरवाजे पर आये थे, परन्तु भिक्षा नहीं मिलने के कारण लौट
गये। नन्द इस समाचार से दुःखी होकर क्षमा मांगने बुद्ध के पास जाना
चाहता है। जाने के लिए वह सुन्दरी से विदा लेता है। सुन्दरी उसे इस
शर्त पर जाने की अनुमति देती है कि उसके विशेषक अर्थात् चन्दन-पत्रावली के
सूखने के पहले ही वह लौट आये। वह मुड़-मुड़कर पत्नी को देखता हुआ
आगे बढ़ गया।

( ४३ )
पञ्चम सर्ग
शास्ता उपासक जनता की भीड़ के बीच धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ रहे
थे । जब वे दूसरे रास्ते पर मुड़े तो समय पाकर नन्द ने उन्हें विनत भाव से
प्रणाम किया तथा विनम्र प्रार्थना की—'अभी पिण्डपात का समय शेष हैं' मेरी
गलती क्षमा की जाय । सुगत ने संकेत से उन्हें मना कर दिया । बुद्ध ने उसके
हाथ में भिक्षापात्र रख दिया । वे उसे ले जाकर धर्मदीक्षित बना देते हैं ।
अनिच्छुक नन्द के सिर के बाल घोंट दिये जाते हैं और वह टपाटप आंसू
गिराता रहता है—
'अथो नतं तस्य मुखं सबाष्पं प्रवास्यमानेषु शिरोरुहेषु ।
वक्राग्रनालं नलिनं तडागे वर्षोदकक्लिन्नमिवाबभासे ॥'
—सौ० न० ५।५२
षष्ठ सर्ग
षष्ठ सर्ग में सुन्दरी के विलाप का करुण प्रसङ्ग है । पति के लौटने की
प्रतीक्षा करते-करते उसका अंगराग सूख गया । उसके न लौटने पर वह अति-
चिन्तातुर हो गई । उसकी आँखें पथरा गईं । पति के अन्यत्र होने की चिन्ता
उसे खाने लगी । खिड़की से पति की वाट जोहते-जोहते वह बिस्तर पर गिर
गई । उसकी दयनीय दशा देखते-देखते महल की अन्य महिलाएँ भी रोने लगीं ।
इन्हें रोते देख वह और घबड़ा गई और अन्य स्त्रियों के प्रति नन्द की
आसक्तिजन्य दुश्चिन्ताएँ उसे खलने लगी । तथागत के प्रति अनुरक्ति की बातें
तो उसे एक बहाना जैसे ही लगा, किन्तु जब महिलाओं ने प्रव्रज्या का संकेत
देकर उसे सान्त्वना दी, तब वह अपने शयन-कक्ष में लौट गई ।
सप्तम सर्ग
सप्तम सर्ग में घर भागने वाले नन्द की चेष्टा का वर्णन है । काषायवस्त्र-
धारी नन्द उन उदाहरणों को ढूँढ़ता है, जिनमें कितने गृहत्यागी व्यक्ति पुनः
अपने घर लौट गये । शान्त तपस्वियों के सम्बन्ध में उसकी धारणा है कि ये
ध्यानी और साधक अपनी वासना की पूर्ण तृप्ति के बाद ही इस साधना के क्षेत्र
में प्रवेश किये हैं । इसीलिए ये शान्त एवं ध्यानस्थ हैं । इसी उधेड़बुन में वह
यह निश्चय करता है कि जब बुद्ध भिक्षाटन के लिए बाहर निकलेंगे, तब अवसर
मिलते ही मैं घर लौट जाऊँगा । विषयों से संतुष्ट होने के पश्चात् ही मैं भी
प्रव्रज्या ग्रहण करूँगा ।
अष्टम सर्ग
अष्टम सर्ग में एक श्रमण ने आकुल नन्द को शिक्षा दी है । उसने समझाते
हुए कहा—मित्र ! धैर्य धारण करो । शान्ति और मन की विकृति एकसाथ अनु-
चित और अशोभनीय है । मैं मानता हूँ कि तुम्हें शारीरिक और मानसिक पीड़ा

( ४४ )
होती रही है, परन्तु इसके उपचार भी तो हैं। यदि तुम्हें शारीरिक पीड़ा है तो
किसी वैद्य से कहकर उपचार करवाओ और यदि मानसिक पीड़ा है और मुझसे
कह सकते हो तो कहो। तब उस श्रमण को एक ओर ले जाकर नन्द ने अपनी
मानसिक व्यथा सुनाते हुए कहा—मित्र ! मैं प्रिया-वियोग में तड़प रहा हूँ। मैं मर
जाना पसन्द करता हूँ, परन्तु उसके बिना जीना नहीं चाहता। यह सुनकर उस
भिक्षु ने हितकर परन्तु कटुसत्य समझाते हुए उसे कहा—जिसका मन शान्त है,
उसका ही धार्मिक अनुष्ठानों में मन लगता है। कामासक्त व्यक्ति धार्मिक कृत्य
में आनन्द की अनुभूति प्राप्त कर ही नहीं सकता। तृष्णावान् व्यक्ति ही काम-
सुख में आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। तुम्हें यह पता नहीं है कि औरतें
मीठी बोली से आकृष्ट करती हैं, परन्तु तीक्ष्ण चित्त से प्रहार भी करती हैं। उनकी
बातों में मधु और हृदय में हलाहल भरा रहता है। नारी का शरीर और मन
दोनों ही दोषपूर्ण हैं। उनके प्रति अपने चंचल मन को रोको। काषाय वस्त्र
धारण कर फिर उस नियम को तोड़ना अन्याय है। मृत्युभय से ग्रस्त कच्चे
बर्तन की तरह इस क्षणभंगुर संसार के प्रति यह आसक्ति छोड़कर मुक्ति-मार्ग
में मन लगाओ।
नवम सर्ग
उस भिक्षु के उपदेश का नन्द पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह कामोन्मत्त
घर जाने के लिए कृतसंकल्प हो गया। भिक्षु ने उसकी शान्ति के लिए उसे
पुनः समझाने की चेष्टा की। उसने कहा—मैं तुम्हारी जवानी के जोश को
पहचानता हूँ। तुम्हारी यह युवावस्था, तुम्हारा लावण्य, तुम्हारा बल सबके
सब क्षयिष्णु एवं क्षणिक है। सोचकर देखो—हड्डी, मांस और रक्त-मज्जा से
निर्मित इस देह पर घमंड करना कितनी मूर्खता है। शरीर तो सदैव विपत्ति से
ग्रस्त है। यह तो मिट्टी के घड़े से भी गया बीता है। विधिपूर्वक रखने पर घड़े
तो कुछ दिनों तक रह सकते हैं, परन्तु यह देह तो अच्छी तरह से रखने पर भी
नष्ट हो जाती है। जब जाड़े से कांपता आग की, गरमी से तड़पता ठंड की,
प्यासा पानी की और भूखा अन्न की इच्छा करता है तो फिर बल कैसा ? हे
नन्द ! रूप, तारुण्य और बल के अनायं अभिमान को दूर करो। पाप रहित मन
से मुक्तिमार्ग को पहचानो। भिक्षु के उपदेश से भी जब नन्द का मन शान्त नहीं
हुआ, तब उस भिक्षु ने भगवान् बुद्ध को नन्द की स्थिति से अवगत करा दिया।
दशम सर्ग
परम कृपालु बुद्ध ने नन्द को बुलाकर उससे ही उसकी सारी बातें जान
लीं। उन्होंने दार्शनिक पृष्ठभूमि में उन्हें समझाना प्रारंभ किया। तत्पश्चात्
तथागत नन्द को साथ लेकर योगविद्या के बल से आकाश में उड़ गये। वे
हिमालय के ऊपर निर्मल आकाश में, एक सरोवर में पंखों को फैलाकर तथा
दूसरे से सटाकर विचरते हुए दो चकवों को दिखला दिये।

( ४५ )
काषायवस्त्रौ कनकावदातौ विरेजतुस्तौ नभसि प्रसन्ने ।
अन्योन्यसंश्लिष्टविकीर्णपक्षौ सरःप्रकीर्णाविव चक्रवाकौ ॥'
—सौ० न० १०।४
इसके बाद बुद्ध ने हिमालय की तलहटी में एक पेड़ पर बैठी एक कानी
बंदरिया को दिखलाकर नन्द से पूछा—क्या तुम जिस सुन्दरी को चाहते हो, वह
इस बंदरिया से अधिक सुन्दर है ? नन्द ने कहा—भगवान् आपकी अनुज-वधू से
इस तुच्छ बंदरी की तुलना ही क्या है, तब उन्होंने नन्द को देवलोक ले जाकर
अप्सराओं को दिखलाया, उनके दीर्घकालीन अतिविलासपूर्ण जीवन को
दिखलाया और पूछा—अब तुम्हें क्या कहना है ? इन्हें देख-सुनकर नन्द
उन अप्सराओं को पाने के लिए लालायित हो उठा । बुद्ध ने उन्हें कहा—ये
अप्सराएँ तप से प्राप्त होती हैं । तथागत ने उसे शीलवान् बनने की सलाह
दी । नन्द अप्सराओं को पाने के लिए तपस्या में निरत हुआ ।
एकादश सर्ग
कामचर्या में निपुण एवं भिक्षुचर्या में अकुशल नन्द ने अपने चपल चित्त
को संयमित किया । अप्सराओं को पाने के निमित्त भार्या-प्रेमी होते हुए भी
स्थिर चित्त से ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना सीखा । वीतरागी भिक्षु की तरह
उसे एकाग्रचित्त देखकर आनन्द को बड़ी प्रसन्नता हुई । एक दिन उसने एकान्त
में नन्द से पूछा—तुम अपने कुलानुरूप धैर्यवान हो, क्योंकि अनार्य के लिए
सज्जनता, अभिमानी के लिए सदाचरण, लोभी के लिए दान और कामी के
लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन असंभव है । परन्तु मुझे सुनने में आया है कि यह
धर्माचरण तुम केवल अप्सराओं की प्राप्ति के लिए ही करते हो । क्या यह सच
है ? या परिहास ? क्योंकि विषय-तृष्णा कभी शान्त होती ही नहीं । विषयों
की खोज शोक है और शोक दुःखमूलक है । स्वर्गीय सुख भी सावधिक है ।
पुण्य क्षीण होते ही स्वर्ग से जरा-जन्म-मरणरूप संसार-चक्र में मनुष्य को आना
पड़ता है । अतः स्थाई सुख रूपी मुक्ति के लिए ही तपश्चर्या में लगो । मुक्ति-
मार्ग ही रक्षक है, कल्याणकारी है और अमृत है । अतः उसी के लिए प्रयत्न-
शील बने रहो ।
द्वादश सर्ग
प्रत्यवमर्श नामक बारहवें सर्ग में आनन्द के इस कथन से कि अप्सरा के
लिए वह तप कर रहा है, अतः तापस समाज में उसकी खिल्ली उड़ाई जा
रही है । यह सुनकर नन्द में स्वतः ज्ञानोदय होता है । वह बुद्ध की शरण में
जाता है । उनसे उसने प्रार्थना की—भगवन् ! मुझे पूर्ण ज्ञान दें । तब शास्ता ने
कहा—आज ही तुम्हारा जन्म सार्थक हुआ । निश्चय ही आकुल व्यक्ति दुर्बल
है । उसकी चंचल श्रद्धा अनिष्ठा के सिवा और कुछ नहीं है । तत्त्वज्ञान के बिना
न तो श्रद्धा बलवती होती है और न बुद्धि ही स्थिर । संयम के द्वारा इन्द्रियों
४ सौ० भू०

( ४६ )
को जीतकर ही मनुष्य तत्त्वदर्शी बनता है। उसी को श्रद्धा फल और आश्रय
देने में समर्थ होती है।
त्रयोदश सर्ग
तेरहवें सर्ग में बुद्ध के उपदेश और आर्य-सत्य की पृष्ठभूमि का वर्णन है।
जितेन्द्रिय नन्द को श्रद्धावान् देखकर भगवान् बुद्ध ने सर्वप्रथम श्रेय का क्रम
निर्दिष्ट किया। श्रद्धा रूपी साधन से युक्त निर्वाण के लिए उन्हें शील की रक्षा
का उपदेश दिया। शील के आश्रय से श्रद्धा श्रेयस्कर होती है। मुक्ति का
आधार वैराग्य है। वैराग्य का सम्यक् ज्ञान तत्त्वदर्शन है। तत्त्वदर्शी ही
समाधि का अधिकारी है। सम्यक् समाधि का सम्बन्ध मानसिक और शारीरिक
सुख से है। शारीरिक और मानसिक सुख परमशान्ति से सम्बद्ध है।
परमानन्द से जीवों के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है। परम प्रीति से कुकृत्य एवं
अकृत्यों का मानसिक अभाव होता है और इस अभाव का आश्रय शील है।
अतः हे नन्द ! शीलवान् बनो। हथियारों से हत व्यक्ति नरक नहीं जाता है,
किन्तु इन्द्रियों से मारा गया व्यक्ति घसीट कर नरक को ले जाया जाता है।
विषयों की अयथार्थ कल्पना से मनुष्य बाँधा जाता है और उन्हीं विषयों को
यथार्थ रूप में देखता हुआ व्यक्ति जीवन्मुक्त हो जाता है।
चतुर्दश सर्ग
आदिप्रस्थान इन्द्रिय-विजय का प्रथम सोपान है। स्मृति रूपी किवाड़ों
से इन्द्रिय रूपी बाँधों को बन्द कर दो। ध्यान और आरोग्य के लिए भोजन
की मात्रा को पहचानों। बुद्धिमान् व्यक्ति अनुराग, तृष्णा, भक्ति से अभिभूत
न होकर भूख मिटाने के लिए ही भोजन करता है। जब तक अस्त्रयुक्त शत्रुओं
को शान्त न कर लिया जाय, तब तक नींद को अपने अधिकार में रखना
चाहिए। रात्रि के प्रथम प्रहर में योगाभ्यास करना चाहिए। द्वितीय प्रहर में
दाहिने करवट प्रज्ञावान् पुरुष को आत्मचिन्तन करते हुए सो जाना चाहिए।
अन्तिम प्रहर में संयतभाव से योगाभ्यास करना चाहिए। निर्जन, शान्त एवं
एकान्त स्थान में योगाभ्यास करना चाहिए। स्मृतिहीन व्यक्ति दोषों का शिकार
होता है। अतः स्मृतिवान् बने रहना चाहिए। इन्धनहीन आग जैसे स्वयं शान्त
हो जाती है, उसी तरह अकम्पित चित्त स्वतः शान्त हो जाता है।
पञ्चदश सर्ग
इस सर्ग में शील का पालन करने के लिए समाधि का उपयोग अत्या-
वश्यक है। पर्यङ्कासन में बैठकर शरीर को सीधे रखकर स्मृति की सहायता से
चंचल चित्त को स्थिर कर समाधि साधने का अभ्यास करना चाहिए।
कुतर्कों का परित्याग मानसिक शुद्धि है। वितर्क-प्रहाण एकाग्रता से ही
समुपलब्ध होता है। स्वर्ग-प्राप्ति की कामना, धनार्जन की लालसा, काम-सुख

( ४७ )
की तृष्णा नरक का द्वार खोलती है। अतः द्वेष और हिंसा का परित्याग
कर, काम-सुख की आशा का परित्याग कर, वितर्कों का विनाश कर ध्यानाव-
स्थित होने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। संसार की विविधताओं और
विचित्रताओं के प्रति आसक्ति ही छन्दराग है। छन्दराग की निवृत्ति से
जीवन आलोकमय हो जाता है। सुनार जैसे सोने से अनेक तरह के आभूषण
तैयार करते हैं, उसी तरह शान्तचित्त व्यक्ति अनेक श्रेय का भागी स्वतः ही
बन जाता है।
षोडश सर्ग
मानसिक एकाग्रता से योगी तत्त्वविद् बन जाता है। वह इनमें कुछ
तत्त्वों को स्वीकार करता है और कुछ का बहिष्कार। फिर वह चार तरह के
ध्यानों तथा पाँच प्रकार के अभिज्ञाओं का अधिकारी बन जाता है। फिर
वह तत्त्वों का स्वयं परीक्षक बन जाता है। तत्त्वों का विश्लेषण कर आर्य-
सत्य का अधिकारी बन जाता है। फिर उसका चित्त मल-रहित निर्मल
बन जाता है। चार आर्य-सत्यों का ज्ञान ही योगी का आत्मदर्शन है। चार
आर्य-सत्यों के ज्ञान से वह दुःखमुक्त हो जाता है। बीज का जो स्वभाव है, वही
रहेगा। आग अपनी प्रकृति नहीं बदलती है। दोषों से ही संसार की
उत्पत्ति होती है। शान्त एवं मंगलकारी धर्म का साक्षात्कार करना चाहिए।
तृष्णा विनाशी है। शान्ति-प्राप्ति के लिए मनुष्य को वैसा ही प्रयास करना
चाहिए, जैसे कृषक खेत जोत कर अन्न का उत्पादन करता है।
सप्तदश सर्ग
ससदश सर्ग में परमशान्ति के लिए नन्द की तपस्या एवं विगत-मोहस्थिति
का वर्णन है। इस सर्ग में अनुगामी नन्द को तत्त्वमार्ग का उपदेश प्राप्त हो
गया। वह गुरु को प्रणाम कर जंगल के लिए प्रस्थान कर गया। वहाँ
जाकर उसने मुक्तिमार्ग का सम्भारप्रत्यय, स्वभाव और दोष-विशेष की
दृष्टि से पदार्थों और धर्मों की विधिवत् परीक्षा की। उसने रूप और अरूप
के सारतत्त्वों को देखने की इच्छा से शरीर का विश्लेषण किया। परीक्ष-
णोपरान्त इन्हें नन्द ने अनात्म और अनित्य पाया। उसने संसार को सकारण
पाया। इस अनुगामी ने अपने उद्योग से उस दुष्कर मार्ग को प्राप्त कर लिया,
जहाँ सामान्य योगी का प्रवेश नहीं हो पाता है। चतुर्थ ध्यान का सहारा लेकर
प्रज्ञारूपी तलवार से इसने मार्ग की सारी बाधाओं को विनष्ट कर डाला। अन्त
में मन ही मन उसने तथागत को प्रणाम किया और कहा कि मैं अब मुक्त हूँ,
सुखी हूँ। अनेकों बार अपने इस मार्गदाता को प्रणाम करता हूँ।
अष्टादश सर्ग
बौद्धदर्शन दुःखवाद के लिए प्रसिद्ध है। जीवन कुछ नहीं है, चेतना की
परिवर्तनशीलता या प्रवाहमयिता है और यही दुःख या क्लेश है। इसी का

( ४८ )
विनाश मुक्ति का स्वरूप है। यह सब जानकर कृतार्थ नन्द ने बुद्ध के समीप
पहुँच कर सोचा कि मेरे लिए किया गया श्रम सफल हुआ। उसने मुनि के
दर्शन करना चाहा। उनके सामने प्रणिपात कर कहा—हे मुनिराज ! आसक्ति
से वशीभूत मैंने जो विषय-भोग रूपी विष पिया था, आपने उसे अपने वचन
रूपी औषधि से उतार दिया। यद्यपि मैं अभी भी संसार में हूँ, परन्तु सांसारि-
कता के प्रति थोड़ा भी आसक्त नहीं हूँ। अतः अब मैं कह सकता हूँ कि मैं संसार
के बंधनों से पूर्णतः मुक्त हूँ। मुनि ने नन्द से संतुष्ट होकर कहा—हे साधु
पुरुष ! अब तुम जन्म, जरा और मरण से मुक्त हो। तुम्हारी प्रज्ञा अत्युत्कृष्ट
है। तुम अब स्थिरात्मा हो। अब तुम अपना कार्य छोड़कर परोपकार में
लगो। अज्ञानरूपी अन्धकार में भटकते प्राणियों के बीच प्रज्ञा रूपी दीप का
प्रकाश फैलाओ। अन्त के दो पद्यों में कवि ने यह काव्य लिखने के कारण का
संकेत किया है।

॥ श्रीः ॥
महाकवि-अश्वघोषप्रणीतं
सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
'विमला'-संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्
प्रथमः सर्गः
कपिलवस्तुवर्णनम्
गौतमः कपिलो नाम मुनिर्धर्मभृतां वरः ।
बभूव तपसि श्रान्तः काक्षीवानिव गौतमः ॥ १ ॥
टीकाकर्तुः मङ्गलाचरणम्
कामारिर्भूत्वाऽपि सकामचेतसा भोगीव योगी गिरिजां ददर्श ।
प्रयत्नसंस्तम्भितविकृतियंः स मे शिवः मङ्गलमातनोतु ॥ १ ॥
नमो ब्रह्मस्वरूपाय परेशाय यतात्मने ।
निर्विकल्पाय नित्याय विश्वरूपाय शम्भवे ॥ २ ॥
बुद्धं सङ्घहितं नत्वा त्वाचारं विभाव्य च ।
व्याख्येयं क्रियते 'विमला' प्रीतये च सतां मुदा ॥ ३ ॥
सौन्दरनन्दार्णवात् किञ्चिद्रत्नान्युद्धृत्य ग्रथ्यते ।
मालेयमश्वघोषस्य सुखयेद्विबुधानपि ॥ ४ ॥
मिश्रजगदीशचन्द्रेण वाणीं संवर्द्धितात्मना ।
बालानां सुखबोधाय क्रियते विमला मया ॥ ५ ॥
अथ तत्रभवान् महाधीमान् बौद्धसङ्घचूडामणिः प्राज्ञजनस्तुत्यजनिः चूडान्तप्रतिभा-
विकासोऽश्वघोषः सत्काव्यस्य सर्वजनाऽभिलाषविषयचतुर्वर्गफलप्राप्तिहेतुतया भगवतो
बुद्धस्यानवद्यभव्यचरित्रपवित्रमतिशयरुच्यं सौन्दरनन्दाऽभिख्यं महाकाव्यं चिकीर्षुः
'आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम्' इति शास्त्रात् आदौ प्रस्तुतविषया-
नुकूलं वस्तु निर्दिशति—
अन्वयः—कपिलः गौतमः नाम मुनिः धर्मभृतां वरः काक्षीवान् गौतमः इव
तपसि श्रान्तः बभूव ॥ १ ॥

२ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
व्याख्या—कपिलः = एको मुनिस्तद्वंशावतीर्णः, गौतमः = शौद्धोदनिः, नाम = एत-
न्नामकः, मुनिः = शास्ता, 'मुनीन्द्रः श्रीघनः शास्ता मुनिः' इत्यमरः; धर्मभृताम्—धर्मं
विभर्त्तीति धर्मभृत्, तेषां धर्मभृताम् ( धर्म + √भृञ् + क्विप् + षष्ठीबहुवचने 'यतश्च
निर्धारणे' इत्यनेन षष्ठी ) = धर्माचरणकर्तॄणाम्, वरः = श्रेष्ठः, काक्षीवान्--काक्षी =
सुराष्ट्रजा 'काक्षी मृत्स्ना तु वरिकामृतालकसुराष्ट्रजे' इत्यमरस्तथा 'काक्षी तु वरिकायां
च सौराष्ट्रमुद्यपि स्त्रियाम्' इति मेदिनी; कक्षे भवा इति काक्षी ( 'तत्र भवः' ४।३।५३
इत्यण् ), काक्षी अस्ति अस्य इति काक्षीवान् ( काक्षी + मतुप् ), गौतमः =
अहल्यापतिगौतमनामकः, मुनिः = ऋषिः, इव = सदृशः, तपसि = तपस्यायाम्,
श्रान्तः = निरतः, बभूव = अभवत् । अनुष्टुप् छन्दः ॥ १ ॥
हिन्दी—धार्मिकों में श्रेष्ठ महातपस्वी, अहल्यापति ज्ञानी गौतम की तरह कपिल
वंश में गौतम बुद्ध नामक एक तपस्वी हुए ॥ १ ॥
अशिश्रियद्यः सततं दीप्तं काश्यपवत्तपः ।
आशिश्राय च तद्वृद्धौ सिद्धिं काश्यपवत्पराम् ॥ २ ॥
अन्वयः—यः काश्यपवत् सततं दीप्तं तपः अशिश्रियत्, तद्वृद्धौ काश्यपवत् परां
सिद्धिम् आशिश्राय च ॥ २ ॥
व्याख्या—यः = गौतमः, काश्यपवत् = एकः प्रसिद्धः ऋषिः तदिव ( कश्यप् +
अण् ), सततम् = अनवरतम्, दीप्तम् = प्रज्ज्वलितम् ( दीप् + क्त ), तपः = नियम-
स्थितिः, अशिश्रियत् = अकरोत् ( 'श्रिञ् सेवायाम्' लुङ्लकारश्च्लेश्चङादेशः छित्व-
ञ्चेति ) । अथ च तद्वृद्धौ = तपोवृद्धौ, काश्यपवत् = कणादमुनिरिव, पराम् = परमो-
त्कृष्टां, सिद्धिम् = साफल्यम्, आशिश्राय = लब्धवान् । ( 'आ' उपसर्गात् श्रिञ् धातोः
लिट्, प्र० पु० एकवचनस्य रूपम् ) ॥ २ ॥
हिन्दी—उन्होंने मुनि काश्यप की तरह कठोर तपस्या की तथा उस प्रदीप्त तप
को बढ़ाकर परम सिद्धि की प्राप्ति की ॥ २ ॥
हविःषु यश्च स्वात्मार्थं गामधुक्षद् वसिष्ठवत् ।
तपःशिष्टेषु च शिष्येषु गामधु(धो)क्षद् वसिष्ठवत् ॥ ३ ॥
अन्वयः—यः च वसिष्ठवत् स्वात्मार्थं हविःषु गाम् अधुक्षत् तपःशिष्टेषु शिष्येषु
वसिष्ठवत् गां च अधुक्षत् ॥ ३ ॥
व्याख्या—यः = गौतममुनिः, चः = पुनः, वसिष्ठवत् = वसिष्ठमुनिरिव ( वसिष्ठ +
मतुप् ), वसिष्ठो हि मुनिः निजगोभ्यः स्वकृतयज्ञार्थं दुग्ध-दधि-घृतादिकमलभत । तद्वत्
स्वात्मार्थम्—स्वस्य=आत्मनोऽर्थमिति=निजार्थं, हविःषु=हविष्यान्नेषु, गाम् = धेनुम्,
अधुक्षत् = दोग्धवान् । ( 'हविषे' इति पाठान्तरे 'निमित्तात् कर्मयोगे' इत्यनेनात्र सप्त-
मीति ) तपःशिष्टेषु = तपस्विषु, शिष्येषु = छात्रेषु, वसिष्ठवत् = वसिष्ठमुनिरिव, च =
पुनः, गाम्=धेनुम्, पक्षान्तरे—पृथिवीं वाणीञ्च, अधुक्षत् = दुदोह । तपःशिष्टेष्वत्र बहु-

कपिलवस्तुवर्णनम् ] प्रथमः सर्गः ३
व्रीहिः तपःशिष्टं येषां तेषु । वसिष्ठ इवात्रेवेन सहोपमालङ्कारः । गाम् शब्दस्य च
द्विरावृत्त्या यमकाऽलङ्कारोऽप्यस्ति ॥ ३ ॥
हिन्दी—अपनी हवन-सामग्री के लिए मुनि वसिष्ठ ने जैसे अपनी गायों को दुहा,
उसी तरह गौतम बुद्ध ने भी अपने तपस्वी शिष्यों को उपदेश देने के लिए अपनी
वाणी को दुहा ॥ ३ ॥
माहात्म्याद् दीर्घतपसो यो द्वितीय इवाभवत् ।
तृतीय इव यश्चाभूत् काव्याङ्गिरसयोर्धिया ॥ ४ ॥
अन्वयः—माहात्म्यात् यः, द्वितीयः दीर्घतपस इव अभवत्, च धिया यः तृतीयः
काव्याङ्गिरसयोः इव अभूत् ॥ ४ ॥
व्याख्या—माहात्म्यात् = निजप्रभावात्, यः = गौतमो बुद्धः, द्वितीयः = अपरः,
दीर्घतपसः = दीर्घं तपः यस्य सः तस्य, महत्पुण्यभाग्, इव = यथा, अहल्यापति-
गौतमस्य विशेषणम्, अभवत् = आसीत्, च = पुनः, धिया = बुद्ध्या, तृतीयः काव्या-
ङ्गिरसयोः = एतन्नामकयोः मुन्योः, काव्यश्च आङ्गिरसश्च तयोः काव्याङ्गिरसयोः,
काव्यः = रक्षसां गुरुः शुक्राचार्यः ( कवि + ण्यत् = काव्यः ), आङ्गिरसः = देवानां गुरुः
बृहस्पतिः, अङ्गिरसः अपत्यं पुमान् आङ्गिरसः ( अङ्गिरस् + अण् ), बृहस्पतिः
ऋग्वेदस्य मन्त्रद्रष्टाऋषेरङ्गिरसः पुत्र आसीत् । इव = तद्वत्, अभूत् = बभूव । गौतमं
काव्याङ्गिरसयोरिव कथितमस्ति । अतोऽत्र उपमालङ्कारः ॥ ४ ॥
हिन्दी—अपनी महिमा में वे मानों दूसरे अहल्यापति गौतम थे और ज्ञान में तो
शुक्र और बृहस्पति की तरह तीसरे ज्ञानी थे ॥ ४ ॥
तस्य विस्तीर्णतपसः पार्श्वे हिमवतः शुभे ।
क्षेत्रं चायतनं चैव तपसामाश्रमोऽभवत् ॥ ५ ॥
अन्वयः—तस्य विस्तीर्णतपंसः हिमवतः शुभे पार्श्वे तपसाम् आश्रमः आयतनं
क्षेत्रं च अभवत् ॥ ५ ॥
व्याख्या—तस्य = गौतमस्य, विस्तीर्णतपसः = विस्तीर्णं तपः यस्य सः, तस्य =
दीर्घतपसः, हिमवतः = हिमालयस्य, शुभे = कल्याणिने, पार्श्वे = अञ्चले, तपसाम् =
साधनानाम्, आश्रमः = आस्थानम्, आयतनम् = निकेतनम्, च क्षेत्रम् = स्थानम्,
च अभवत् = आसीत् ॥ ५ ॥
हिन्दी—हिमालय की सुखद तराई में उस महातपस्वी का आश्रम था, जो संसिद्धि
का क्षेत्र था ॥ ५ ॥
चारुवीरुत्तरुवनः प्रस्निग्धमृदुशाद्वलः ।
हविर्धूमवितानेन यः सदाभ्र इवाबभौ ॥ ६ ॥
अन्वयः—चारुवीरुत्तरुवनः प्रस्निग्धमृदुशाद्वलः यः हविर्धूमवितानेन सदा अभ्र
इव आबभौ ॥ ६ ॥

४ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
व्याख्या—चारुवीरुत्तरुवनः—वीरुधश्च, विशेषेण रुणद्धि अन्यान् वृक्षान्; ( वि+
रुध् + क्विप्, उपसर्गस्य दीर्घः ) 'लताप्रतानिनी वीरुत्' इति भट्टिः; लताश्च, तरवश्च =
वृक्षाणि च ( व्रश्च् + क्सू ), वीरुधश्चेति तरवश्चेति वीरुत्तरवः, चारवः वीरुत्तरवः इति
चारुवीरुत्तरवः, तैः सहितं वनम् इति चारुवीरुत्तरवनं यस्मिन् सः चारुवीरुत्तरवनः=
सुन्दरलतावृक्षारण्यः, प्रस्निग्धमृदुशाद्वलः=मसृणकोमलशाद्वलः, प्रस्निग्धे=चिक्कणे,
मृदुः = कोमलम्, शाद्वलम्—शादाः सन्ति अत्रेति ( शाद् + वलच् ), शाद्वलम्=तृणयुक्त-
भूमिः, हविर्धूमवितानेन—हविषः धूमस्तस्य वितानस्तेन =यज्ञधूमाच्छादनेन, यः=
आश्रमः, सदा=सर्वदा, अभ्रः=मेघः, इव=यथा, आवभौ=सुशोभितो बभूव
( आङ्+√भा+लिट् ) । इवपदेनात्रोपमालङ्कारः ॥ ६ ॥
हिन्दी—सुन्दर लताओं और वृक्षों से वह वन आकर्षक बना था। वहाँ की धरती
पर चिकनी, कोमल एवं हरी घासों की चादर बिछी थी। होम के धुएँ से बने बादलों
का ऊपर चंदोवा टँगा था ॥ ६ ॥
मृदुभिः सैकतैः स्निग्धैः केसरास्तरपाण्डुभिः ।
भूमिभागैरसङ्कीर्णैः साङ्गरागा इवाभवत् ॥ ७ ॥
अन्वयः—मृदुभिः सैकतैः स्निग्धैः असङ्कीर्णैः केसरास्तरपाण्डुभिः, भूमिभागैः,
साङ्गरागाः इव अभवत् ॥ ७ ॥
व्याख्या—मृदुभिः =कोमलैः, सैकतैः = सिकतामयैः, स्निग्धैः=मसृणैः, असङ्कीर्णैः
—न सङ्कीर्णास्तैः=पवित्रैः, केसरास्तरपाण्डुभिः—केसराणाम् आस्तरस्तेन पाण्डुस्तैः =
केसरशय्यापीतैः, भूमिभागैः—भूमेः भागास्तैः=भूखण्डैः, साङ्गरागाः—अङ्गरागेन
सहिताः साङ्गरागाः = अङ्गरागयुक्ताः, इव=यथा, अभवत्=बभूवेति ॥ ७ ॥
हिन्दी—अत्यन्त कोमल एवं चिकने फैले हुए सुगन्धित पुष्प-पराग से पीली बनी
धरती ही उस आश्रम के लिए सुगन्धि लेप दी ॥ ७ ॥
शुचिभिस्तीर्थसङ्ख्यातः पावनैर्भावनैरपि ।
बन्धुमानिव यस्तस्थौ सरोभिः ससरोरुहैः ॥ ८ ॥
अन्वयः—शुचिभिः तीर्थसङ्ख्यातैः पावनैः भावनैः अपि ससरोरुहैः सरोभिः यः
बन्धुमान् इव तस्थौ ॥ ८ ॥
व्याख्या—शुचिभिः=पवित्रैः, तीर्थसङ्ख्यातः—तीर्थानां सङ्ख्यातानि, तैः =तीर्थ-
स्वरूपैः, पावनैः = निर्मलैः, भावनैः=सुन्दरैः, अपि=चेत्, ससरोरुहैः—सरसि रोहन्तीति
सरोरुहास्तैः=कमलैः, सरोभिः=जलाशयैः, यः =आश्रमः, बन्धुमान्—बन्धवः सन्ति
अस्येति बन्धुमान् ( बन्धु+मतुप् )=बन्धुयुक्तः, इव =यथा, तस्थौ = ( √स्था + लिट्
+तिप् ) तस्थिवान् ॥ ८ ॥
हिन्दी—विकसित कमलों से भरा परिगणित एवं पवित्र घाटों वाले सरोवरों से
घिरा वह आश्रम बहुकुटुम्बी की तरह लग रहा था ॥ ८ ॥