सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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वैसे अश्वघोष ने सुन्दरी के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त सरलता के साथ
बड़ा ही प्रभावपूर्ण किया है। आदर्श अनुराग के चित्रों में तो इसने सजीवता
ही उत्पन्न कर दी है। अश्वघोष एक विशिष्ट कोटि के वैयाकरण थे। इनके
महाकाव्यों में ऐसे अनेक स्थल हैं, जहाँ इन्होंने अप्रचलित अपाणिनीय शब्दों
का प्रयोग किया है। जैसे—उन्होंने 'अस्' धातु का प्रयोग उपमा द्योतक के रूप
में तीनों कालों में निष्पन्न 'अस्ति' का प्रयोग निपात के रूप में किया है—
'त्रिषु कालेषु सर्वेषु निपातोऽस्तिरिव स्मृतः ।'
—सौ० न० १२।१०
सौन्दरनन्द के द्वितीय सर्ग के निम्नलिखित श्लोक में 'लुङ्' के प्रयोगों में
पाण्डित्य प्रदर्शन करते हुए 'मां' 'मि' और 'मी'—तीनों धातुओं के कर्मणि
प्रयोग में सिद्ध होने वाले धातुरूपों का प्रयोग हुआ है—
अश्रान्तः ••• ••• ••• ••• यज्ञभूमिममीमपत् ।
••• ••• ••• ••• निरुद्विग्नानमीमपत् ॥
••• ••• ••• ••• ••• सोमममीमपत् ।
••• ••• ••• ••• •••सैन्यममीमपत् ॥
—सौन्दरनन्द २।३५-३६
इसी तरह 'दा' धातु का प्रयोग द्वितीय सर्ग के ३२ से ३४ श्लोक तक
अपाणिनीय है। इसी तरह कुछ संज्ञावाचक शब्द है, जिनका लिङ्ग अव्यवस्थित
है। जैसे—
'सूर्यरश्मिभिरक्लिष्टं पुष्पवर्षं पतात खात् ।' —सौ० न० २।५३
'सन्ध्याय मित्रं' —सौ० न० १७।५६
'विभूषणश्रीन्निहिते प्रकोष्ठे' —सौ० न० ६।२७
इसी तरह इनके कुछ उपमान भी अटपटे हैं। जैसे—
'सिंहांसोद्वृषभेक्षणः' कंधे सिंह की तरह और आंखे बैल की तरह, यहाँ
आँखों की तुलना बैल की आँखों से अनुचित लगती है।
इसी तरह छन्दों के प्रयोग में भी अश्वघोष सिद्धहस्त हैं। 'उद्गाता'
जैसे कम प्रयोग में आनेवाले छन्द का भी बड़ी सफलता के साथ प्रयोग करके
दिखलाया है। छन्द काव्य में संगीतात्मकता उत्पन्न करते हैं। बिना संगीत के
काव्य में सम्प्रेषणीयता उत्पन्न नहीं हो पाती। संगीत और काव्य का अत्यन्त
घनिष्ठ सम्बन्ध है। भावहीन संगीत और छन्द-विहीन काव्य शुष्क रचना है।
इसीलिए संगीत और साहित्य दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं—
'सङ्गीतमथ साहित्यं सरस्वत्याः स्तनद्वयम् ।
एकमापातमधुरमन्यदालोचनामृतम् ॥'