सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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रानी से नन्द ने जन्मग्रहण किया। यह अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक था।
रूपवान् होने के कारण इसका नाम सुन्दर पड़ा। दोनों राजकुमारों का विधिवत्
उपनयनादि संस्कार यथावसर हुआ। गौतम बुद्ध के विमातृज कामासक्त कुमार
था। सिद्धार्थ विषयोपभोग से विरत थे। बूढे, रोगी और एक शव को देखकर
सिद्धार्थ का मन अत्यन्त उद्वेलित हो उठा। एक रात प्रसूतिगृह में अपनी पत्नी
यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़ कर मोक्षप्राप्ति के लिए महाभिनिष्क्रमण
किया।
तृतीय सर्ग
वन में सिद्धार्थ ने अनेक तपस्वियों और सन्तों के दर्शन किये। साधुओं
को विषयतृष्णा से कृपण पाया। सन्तों के रूप को स्थिर नहीं देखा। वहाँ
से वह लौट गया। मोक्षवादी अराड़ और उद्रक की उपासना की। इन्होंने
उसे भी तथ्यहीन ही समझा। अनिश्चित मन से पन्थों और शास्त्रों में कौन श्रेष्ठ
हैं? इस विचार को ही छोड़कर दुष्कर तप में मन लगाया। यहाँ भी उसका
मन नहीं रमा। मोक्ष चाहने वाला दार्शनिक संसार को काम का राज्य
समझता है। 'मार'-विजय के बाद ही वह परमशान्ति प्राप्त करता है। इसी-
लिए सिद्धार्थ कामविजय के लिए बद्धपरिकर हुए। गया में एक पीपल
वृक्ष के नीचे वे ध्यानमग्न हुए। मार-पराजय से देवगण प्रसन्न हुए। अवि-
नाशी परमार्थ को सिद्धार्थ ने पहचाना। सत्य, धैर्य, ज्ञान, समाधि, विनय
और नियम का लोगों को उन्होंने उपदेश दिया। काशी, गया और गिरिव्रज
( राजगिर ) में लोगों को उपदेश दिया। फिर अज्ञान के कारण विविध
मार्गों पर चलते पितृनगर के लोगों का अन्धकार दूर किया। दर्शनेच्छुक समा-
गत पिता को विनीत बनाने की इच्छा से सुगत आकाशगामी बन गये।
आनन्दविभोर प्रजा ने झुककर उन्हें सम्मानित किया।
चतुर्थ सर्ग
चतुर्थ सर्ग में नन्द तथा सुन्दरी के विहार का वर्णन है। नन्द एवं सुन्दरी
एक-दूसरे प्रति अनन्यासक्त हैं। वे दोनों एक-दूसरे के प्रति चकवा-चकई की
तरह समर्पित हैं। एक के बिना दूसरे को चैन नहीं है। एक दिन विहार करते
समय ही कोई दासी नन्द को आकर सूचना देती है कि भिक्षाटन के लिए
तथागत उसके दरवाजे पर आये थे, परन्तु भिक्षा नहीं मिलने के कारण लौट
गये। नन्द इस समाचार से दुःखी होकर क्षमा मांगने बुद्ध के पास जाना
चाहता है। जाने के लिए वह सुन्दरी से विदा लेता है। सुन्दरी उसे इस
शर्त पर जाने की अनुमति देती है कि उसके विशेषक अर्थात् चन्दन-पत्रावली के
सूखने के पहले ही वह लौट आये। वह मुड़-मुड़कर पत्नी को देखता हुआ
आगे बढ़ गया।