सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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इन सारी आलोचना-प्रत्यालोचनाओं के बावजूद इतना तो असंदिग्ध रूप
से कहा जा सकता है कि अश्वघोष ने अलंकार के लिए अलंकारों का प्रयोग
नहीं किया है। यह बात अलग है कि उनके काव्यों में सभी प्रमुख साधर्म्य-
मूलक अलंकारों का सुन्दर प्रयोग देखने को मिलता है। एक उपमा—
'अथो नतं तस्य मुखं सबाष्पं प्रवास्यमानेषु शिरोरुहेषु ।
वक्राग्रनालं नलिनं तडागे वर्षोदकक्लिन्नमिवावभासे ।।'
—सौ० न० ५।५२
इसी तरह रूपक का एक उदाहरण जिसमें दोषों में अगाध-सागर का, छल-
कपट में जल का और आधियों में जन्तु का आरोप अत्याकर्षक है—
'स हि दोषसागरमगाधमुपधिजलमाधिजन्तुकम् ।
क्रोधमदभयतरङ्गचञ्चलं प्रततार लोकमपि च व्यतारयत् ॥'
—सौ० न० ३।१४
इसी प्रकार से संभावनाार्थक उत्प्रेक्षा का एक मनोहर उदाहरण बुद्धचरित
के अष्टमसर्ग का ३७वाँ श्लोक है। इसी तरह व्यतिरेकालङ्कार का एक सटीक
उदाहरण—
'प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुजङ्गमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः ।
क्वचिच्च कश्चिच्च दशन्ति पन्नगाः, सदा च सर्वं च तुदन्ति धातवः ।।'
—सौ० न० ९।१३
यद्यपि अश्वघोष के लिए न अलङ्कार अनिवार्य है और न इनके काव्य। वह
साध्यरूप मे ही है। फिर भी अपने अन्तर्निष्ठ चमत्कार-सौष्ठव के विश्लेषण
में अपने कथन को प्रभावोत्पादक बनाने के क्रम में, सौष्ठव के विश्लेषण क्रम में
ही इन्होंने साधर्म्यमूलक अलंकारों का प्रयोग किया है। ये अलंकार उनकी
अनुभूति-साधन को उत्कर्ष प्रदान करते हैं। इनके अतिरिक्त अनुप्रास तथा
यमक जैसे शब्दालङ्कारों का प्रयोग भी इनके भावों को व्यक्त करने में प्रेरणा-
रूप सिद्ध हुए है। इनके एक-दो उदाहरण ही पर्याप्त होंगे। अनुप्रास का
उदाहरण—
'चलत्कदम्बे हिमवन्नितम्बे तरौ प्रलम्बे चमरो ललम्बे ।'
—सौ० न० १०।११
इसी प्रकार यमक का प्रयोग—
'प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुजङ्गमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः ।
क्वचिच्च कश्चिच्च दशन्ति पन्नगाः सदा च सर्वञ्च तुदन्ति धातवः ॥'
—सौ० न० ९।१३
इन अलंकारों के प्रयोग से इनकी कविता में तो विविधता आई ही है,
साथ ही इनका अभिनवप्रयोग भी कवि की प्रतिभा का ही द्योतक है।