सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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विनाश मुक्ति का स्वरूप है। यह सब जानकर कृतार्थ नन्द ने बुद्ध के समीप
पहुँच कर सोचा कि मेरे लिए किया गया श्रम सफल हुआ। उसने मुनि के
दर्शन करना चाहा। उनके सामने प्रणिपात कर कहा—हे मुनिराज ! आसक्ति
से वशीभूत मैंने जो विषय-भोग रूपी विष पिया था, आपने उसे अपने वचन
रूपी औषधि से उतार दिया। यद्यपि मैं अभी भी संसार में हूँ, परन्तु सांसारि-
कता के प्रति थोड़ा भी आसक्त नहीं हूँ। अतः अब मैं कह सकता हूँ कि मैं संसार
के बंधनों से पूर्णतः मुक्त हूँ। मुनि ने नन्द से संतुष्ट होकर कहा—हे साधु
पुरुष ! अब तुम जन्म, जरा और मरण से मुक्त हो। तुम्हारी प्रज्ञा अत्युत्कृष्ट
है। तुम अब स्थिरात्मा हो। अब तुम अपना कार्य छोड़कर परोपकार में
लगो। अज्ञानरूपी अन्धकार में भटकते प्राणियों के बीच प्रज्ञा रूपी दीप का
प्रकाश फैलाओ। अन्त के दो पद्यों में कवि ने यह काव्य लिखने के कारण का
संकेत किया है।