सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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काषायवस्त्रौ कनकावदातौ विरेजतुस्तौ नभसि प्रसन्ने ।
अन्योन्यसंश्लिष्टविकीर्णपक्षौ सरःप्रकीर्णाविव चक्रवाकौ ॥'
—सौ० न० १०।४
इसके बाद बुद्ध ने हिमालय की तलहटी में एक पेड़ पर बैठी एक कानी
बंदरिया को दिखलाकर नन्द से पूछा—क्या तुम जिस सुन्दरी को चाहते हो, वह
इस बंदरिया से अधिक सुन्दर है ? नन्द ने कहा—भगवान् आपकी अनुज-वधू से
इस तुच्छ बंदरी की तुलना ही क्या है, तब उन्होंने नन्द को देवलोक ले जाकर
अप्सराओं को दिखलाया, उनके दीर्घकालीन अतिविलासपूर्ण जीवन को
दिखलाया और पूछा—अब तुम्हें क्या कहना है ? इन्हें देख-सुनकर नन्द
उन अप्सराओं को पाने के लिए लालायित हो उठा । बुद्ध ने उन्हें कहा—ये
अप्सराएँ तप से प्राप्त होती हैं । तथागत ने उसे शीलवान् बनने की सलाह
दी । नन्द अप्सराओं को पाने के लिए तपस्या में निरत हुआ ।
एकादश सर्ग
कामचर्या में निपुण एवं भिक्षुचर्या में अकुशल नन्द ने अपने चपल चित्त
को संयमित किया । अप्सराओं को पाने के निमित्त भार्या-प्रेमी होते हुए भी
स्थिर चित्त से ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना सीखा । वीतरागी भिक्षु की तरह
उसे एकाग्रचित्त देखकर आनन्द को बड़ी प्रसन्नता हुई । एक दिन उसने एकान्त
में नन्द से पूछा—तुम अपने कुलानुरूप धैर्यवान हो, क्योंकि अनार्य के लिए
सज्जनता, अभिमानी के लिए सदाचरण, लोभी के लिए दान और कामी के
लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन असंभव है । परन्तु मुझे सुनने में आया है कि यह
धर्माचरण तुम केवल अप्सराओं की प्राप्ति के लिए ही करते हो । क्या यह सच
है ? या परिहास ? क्योंकि विषय-तृष्णा कभी शान्त होती ही नहीं । विषयों
की खोज शोक है और शोक दुःखमूलक है । स्वर्गीय सुख भी सावधिक है ।
पुण्य क्षीण होते ही स्वर्ग से जरा-जन्म-मरणरूप संसार-चक्र में मनुष्य को आना
पड़ता है । अतः स्थाई सुख रूपी मुक्ति के लिए ही तपश्चर्या में लगो । मुक्ति-
मार्ग ही रक्षक है, कल्याणकारी है और अमृत है । अतः उसी के लिए प्रयत्न-
शील बने रहो ।
द्वादश सर्ग
प्रत्यवमर्श नामक बारहवें सर्ग में आनन्द के इस कथन से कि अप्सरा के
लिए वह तप कर रहा है, अतः तापस समाज में उसकी खिल्ली उड़ाई जा
रही है । यह सुनकर नन्द में स्वतः ज्ञानोदय होता है । वह बुद्ध की शरण में
जाता है । उनसे उसने प्रार्थना की—भगवन् ! मुझे पूर्ण ज्ञान दें । तब शास्ता ने
कहा—आज ही तुम्हारा जन्म सार्थक हुआ । निश्चय ही आकुल व्यक्ति दुर्बल
है । उसकी चंचल श्रद्धा अनिष्ठा के सिवा और कुछ नहीं है । तत्त्वज्ञान के बिना
न तो श्रद्धा बलवती होती है और न बुद्धि ही स्थिर । संयम के द्वारा इन्द्रियों
४ सौ० भू०