सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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को जीतकर ही मनुष्य तत्त्वदर्शी बनता है। उसी को श्रद्धा फल और आश्रय
देने में समर्थ होती है।
त्रयोदश सर्ग
तेरहवें सर्ग में बुद्ध के उपदेश और आर्य-सत्य की पृष्ठभूमि का वर्णन है।
जितेन्द्रिय नन्द को श्रद्धावान् देखकर भगवान् बुद्ध ने सर्वप्रथम श्रेय का क्रम
निर्दिष्ट किया। श्रद्धा रूपी साधन से युक्त निर्वाण के लिए उन्हें शील की रक्षा
का उपदेश दिया। शील के आश्रय से श्रद्धा श्रेयस्कर होती है। मुक्ति का
आधार वैराग्य है। वैराग्य का सम्यक् ज्ञान तत्त्वदर्शन है। तत्त्वदर्शी ही
समाधि का अधिकारी है। सम्यक् समाधि का सम्बन्ध मानसिक और शारीरिक
सुख से है। शारीरिक और मानसिक सुख परमशान्ति से सम्बद्ध है।
परमानन्द से जीवों के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है। परम प्रीति से कुकृत्य एवं
अकृत्यों का मानसिक अभाव होता है और इस अभाव का आश्रय शील है।
अतः हे नन्द ! शीलवान् बनो। हथियारों से हत व्यक्ति नरक नहीं जाता है,
किन्तु इन्द्रियों से मारा गया व्यक्ति घसीट कर नरक को ले जाया जाता है।
विषयों की अयथार्थ कल्पना से मनुष्य बाँधा जाता है और उन्हीं विषयों को
यथार्थ रूप में देखता हुआ व्यक्ति जीवन्मुक्त हो जाता है।
चतुर्दश सर्ग
आदिप्रस्थान इन्द्रिय-विजय का प्रथम सोपान है। स्मृति रूपी किवाड़ों
से इन्द्रिय रूपी बाँधों को बन्द कर दो। ध्यान और आरोग्य के लिए भोजन
की मात्रा को पहचानों। बुद्धिमान् व्यक्ति अनुराग, तृष्णा, भक्ति से अभिभूत
न होकर भूख मिटाने के लिए ही भोजन करता है। जब तक अस्त्रयुक्त शत्रुओं
को शान्त न कर लिया जाय, तब तक नींद को अपने अधिकार में रखना
चाहिए। रात्रि के प्रथम प्रहर में योगाभ्यास करना चाहिए। द्वितीय प्रहर में
दाहिने करवट प्रज्ञावान् पुरुष को आत्मचिन्तन करते हुए सो जाना चाहिए।
अन्तिम प्रहर में संयतभाव से योगाभ्यास करना चाहिए। निर्जन, शान्त एवं
एकान्त स्थान में योगाभ्यास करना चाहिए। स्मृतिहीन व्यक्ति दोषों का शिकार
होता है। अतः स्मृतिवान् बने रहना चाहिए। इन्धनहीन आग जैसे स्वयं शान्त
हो जाती है, उसी तरह अकम्पित चित्त स्वतः शान्त हो जाता है।
पञ्चदश सर्ग
इस सर्ग में शील का पालन करने के लिए समाधि का उपयोग अत्या-
वश्यक है। पर्यङ्कासन में बैठकर शरीर को सीधे रखकर स्मृति की सहायता से
चंचल चित्त को स्थिर कर समाधि साधने का अभ्यास करना चाहिए।
कुतर्कों का परित्याग मानसिक शुद्धि है। वितर्क-प्रहाण एकाग्रता से ही
समुपलब्ध होता है। स्वर्ग-प्राप्ति की कामना, धनार्जन की लालसा, काम-सुख