सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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विकृति का कारण बन गई है। कालिदास के काव्यों में प्रकृति का सर्वाङ्गपूर्ण
वर्णन हुआ है। भवभूति का प्रकृति-वर्णन भी अद्वितीय है। इनका प्रकृति-वर्णन
संश्लिष्ट एवं चित्रोपम है। ये प्रकृति के कोमल तथा कठोर दोनों रूपों के
वर्णन में सिद्धहस्त हैं। इन्होंने प्रकृति का वर्णन आलम्बन के रूप में किया
है। कालिदास का प्रकृति-चित्रण सप्राण सजीव एवं मानवीयकृत है। यदि
कालिदास की प्रकृति का वर्णन अनलंकृत है, तो भवभूति की प्रकृति अनाविल
नैसर्गिक-सौन्दर्य के साथ अलंकार की अनावश्यक अलंकृति से बचती है।
फिर भी प्रकृतिवर्णन प्रभावोत्पादक है। कालिदास और भवभूति के प्रकृति-
वर्णन के सामने सौन्दरनन्द या बुद्धचरित का वर्णन नीरस एवं चलता-सा
दिखलायी पड़ता है।
अश्वघोष का प्रमुख ध्यान अपने प्रतिपाद्य वर्ण्य-वस्तु की ओर अधिक है।
शैली, अलङ्कार, या छन्दोविधान की अभिव्यञ्जनाप्रणाली आनुषङ्गिक है।
यह बात अलग है कि वर्ण्य-वस्तु के साथ ये प्रयोग कहीं-कही अत्यधिक प्रभा-
वोत्पादक या सटीक बन गया है। यह अनायास है, सायास नहीं। कारण
स्पष्ट है, अश्वघोष का दृष्टिकोण कलावादी नहीं है। इनके काव्य में
अश्वघोष का त्रिविध व्यक्तित्व का त्रिकोणात्मक संघर्ष सर्वत्र परिप्रेक्ष्य में है।
कहीं इनकी दार्शनिकता इनके कवित्व पर हावी है, तो कभी इनकी धर्मोप-
देशिकता इनके दर्शन पर भारी है। अतः इनका वर्ण्य-विषय इनकी विधा-
भिव्यञ्जना के बीच असामञ्जस्य जैसा लगता है। इन सभी तथ्यों के
बावजूद इनमें कुछ ऐसी विशेषता है, जो अनायास पाठकों को अपनी ओर
आकृष्ट कर लेती है। कलात्मक विशेषता नहीं रहने के बावजूद अश्वघोष
की काव्यप्रतिभा प्रशंसनीय है।
अश्वघोष की शैली पर जब हम विचार करते हैं तब हमें यह स्पष्ट प्रतीत
होता है कि कवि ने सर्वत्र सुगम भाषा और वैदर्भीरीति को ही प्रश्रय दिया है।
इनकी वर्ण्य-वस्तु की भाषा सुगम एवं सरल है। इनकी शैली परिष्कृत एवं
परिमार्जित है। इनका शब्द-विन्यास सरस, शोभासम्पन्न, विशद और अधिक
अभिव्यञ्जक है। आकर्षक, सरस, प्रवाहमय काव्य के माध्यम से जन-जन तक
बौद्धधर्म का प्रचार-प्रसार इनके काव्य का प्रमुख लक्ष्य था। यही कारण है
कि इनकी शैली प्रसादमयी सरलता के साथ माधुर्य उत्पन्न करती है। इन्होंने
अपने काव्यों में सामासिक शब्दों का प्रयोग तो किया है, परन्तु सदैव दीर्घ और
क्लिष्ट सामासिक पद-विन्यास से बचते रहे हैं। इस दृष्टि से इनकी समग्र
रचनाएँ कृत्रिमता तथा अस्वाभाविकता से सर्वथा दूर हैं। अश्वघोष ने तो
गम्भीर दार्शनिक विचारों को भी अत्यन्त सरल भाषा में प्रकट किया है।
निम्न श्लोक उदाहरणार्थ दर्शनीय है—