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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 496 में से

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( ४३ )
पञ्चम सर्ग
शास्ता उपासक जनता की भीड़ के बीच धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ रहे
थे । जब वे दूसरे रास्ते पर मुड़े तो समय पाकर नन्द ने उन्हें विनत भाव से
प्रणाम किया तथा विनम्र प्रार्थना की—'अभी पिण्डपात का समय शेष हैं' मेरी
गलती क्षमा की जाय । सुगत ने संकेत से उन्हें मना कर दिया । बुद्ध ने उसके
हाथ में भिक्षापात्र रख दिया । वे उसे ले जाकर धर्मदीक्षित बना देते हैं ।
अनिच्छुक नन्द के सिर के बाल घोंट दिये जाते हैं और वह टपाटप आंसू
गिराता रहता है—
'अथो नतं तस्य मुखं सबाष्पं प्रवास्यमानेषु शिरोरुहेषु ।
वक्राग्रनालं नलिनं तडागे वर्षोदकक्लिन्नमिवाबभासे ॥'
—सौ० न० ५।५२
षष्ठ सर्ग
षष्ठ सर्ग में सुन्दरी के विलाप का करुण प्रसङ्ग है । पति के लौटने की
प्रतीक्षा करते-करते उसका अंगराग सूख गया । उसके न लौटने पर वह अति-
चिन्तातुर हो गई । उसकी आँखें पथरा गईं । पति के अन्यत्र होने की चिन्ता
उसे खाने लगी । खिड़की से पति की वाट जोहते-जोहते वह बिस्तर पर गिर
गई । उसकी दयनीय दशा देखते-देखते महल की अन्य महिलाएँ भी रोने लगीं ।
इन्हें रोते देख वह और घबड़ा गई और अन्य स्त्रियों के प्रति नन्द की
आसक्तिजन्य दुश्चिन्ताएँ उसे खलने लगी । तथागत के प्रति अनुरक्ति की बातें
तो उसे एक बहाना जैसे ही लगा, किन्तु जब महिलाओं ने प्रव्रज्या का संकेत
देकर उसे सान्त्वना दी, तब वह अपने शयन-कक्ष में लौट गई ।
सप्तम सर्ग
सप्तम सर्ग में घर भागने वाले नन्द की चेष्टा का वर्णन है । काषायवस्त्र-
धारी नन्द उन उदाहरणों को ढूँढ़ता है, जिनमें कितने गृहत्यागी व्यक्ति पुनः
अपने घर लौट गये । शान्त तपस्वियों के सम्बन्ध में उसकी धारणा है कि ये
ध्यानी और साधक अपनी वासना की पूर्ण तृप्ति के बाद ही इस साधना के क्षेत्र
में प्रवेश किये हैं । इसीलिए ये शान्त एवं ध्यानस्थ हैं । इसी उधेड़बुन में वह
यह निश्चय करता है कि जब बुद्ध भिक्षाटन के लिए बाहर निकलेंगे, तब अवसर
मिलते ही मैं घर लौट जाऊँगा । विषयों से संतुष्ट होने के पश्चात् ही मैं भी
प्रव्रज्या ग्रहण करूँगा ।
अष्टम सर्ग
अष्टम सर्ग में एक श्रमण ने आकुल नन्द को शिक्षा दी है । उसने समझाते
हुए कहा—मित्र ! धैर्य धारण करो । शान्ति और मन की विकृति एकसाथ अनु-
चित और अशोभनीय है । मैं मानता हूँ कि तुम्हें शारीरिक और मानसिक पीड़ा