सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 496 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

( ३९ )
छुटकारा दिलाने के लिए हृदय के तड़पते उद्गारों की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
परोपकार की भावना से ओत-प्रोत आपके महाकाव्य इसीलिए लोकप्रिय हैं।
इन्होंने अपने दोनों ही महाकाव्यों में कुछ ऐसी रूढ़ियों का प्रयोग किया,
जिनका अनुकरण परवर्त्ती कवि कालिदास से लेकर श्रीहर्ष तक ने किया है।
बुद्धचरित के तृतीय सर्ग के १२ से २४ श्लोक तक इन्होंने उन लालायित
ललनाओं का वर्णन किया है, जो वन-विहार के लिए निकले बुद्ध-दर्शन के
लिए व्याकुल हैं। हो सकता है यह उद्भावना अश्वघोष की मौलिक न हो,
परन्तु पाठकों को इनके प्रथम दर्शन तो यहीं होते हैं। इस परम्परा का अक्षुण्ण
अनुकरण या निर्वाह महाकवि कालिदास ने भी रघुवंश एवं कुमारसंभव के
सप्तम सर्ग में किया है। इस परम्परा का अनुसरण माघ के तेरहवें सर्ग में और
श्रीहर्ष-रचित नैषध के सोलहवें सर्ग में अक्षुण्ण रूप में मिलता है। दूसरी रूढि
अश्वघोष की रूखड़ी परन्तु सप्राण प्रकृति-वर्णन की है, जहां वन के पेड़-पौधे
भी जीवन्त प्राणी की तरह व्यवहार करते हैं—
‘हारान् मणीनुत्तमकुण्डलानि केयूरवर्याण्यथ नूपुराणि।
एवंविधान्याभरणानि यत्र स्वर्गानुरूपाणि फलन्ति वृक्षाः ॥’
—सौ० न० १०।२३
वन के सारे वृक्ष हारों, मणियों, उत्तम कुण्डलों, उत्तम केयूरों, नूपुरों
और स्वर्ग के अनुरूप ऐसे ही आभूषणों के फल देते हैं। इसी तरह इसी
सर्ग के—
‘नानाविरागाण्यथ पाण्डराणि सुवर्णभक्तिव्यवभासितानि ।
अतान्तवान्येकघनानि यत्र सूक्ष्माणि वासांसि फलन्ति वृक्षाः ॥’
—सौ० न० १०।२२
उस वन के वृक्ष अनेक रंगों के, सफेद रंग के, सुवर्ण-रेखाओं से उज्ज्वल,
पत्ते के समान तन्तुरहित घने परन्तु पतले कपड़े फलते हैं। कहने का तात्पर्य यह
है कि वृक्षों के द्वारा वस्त्राभरणों को देने की परम्परा अश्वघोष ने संचालित
की, उसका परिष्कृत एवं प्रस्फुट स्वरूप कालिदासकृत अभिज्ञानशाकुन्तलम् के
चतुर्थ अंक में दृष्टिगोचर होता है। शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वन के
लता-पादपों ने उन्हें इन्हीं उपहारों से लाद दिया है।
मनुष्य तथा प्रकृति—दोनों का मंजुल सम्पर्क तथा अद्भुत एकरसता
की परम्परा कायम कर अश्वघोष ने प्रकृति के भीतर स्फुरित होने वाले हृदय
को पहचाना है। अश्वघोष ने अपने समस्त चित्रणों द्वारा मानव-जीवन के
साथ आदर्श की स्थापना ही नहीं की है प्रत्युत् दुःखमय इस संसार-चक्र से
मुक्ति के उपाय का भी संधान किया है। संस्कृत-साहित्य के महाकाव्य के
पाठकों के लिए अश्वघोष का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि वे एक महत्त्व-
र्ण कवि है, प्रत्युत् इस परम्परा में उनका यह भी महत्त्व है कि उनके पर-