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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 496 में से

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की तृष्णा नरक का द्वार खोलती है। अतः द्वेष और हिंसा का परित्याग
कर, काम-सुख की आशा का परित्याग कर, वितर्कों का विनाश कर ध्यानाव-
स्थित होने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। संसार की विविधताओं और
विचित्रताओं के प्रति आसक्ति ही छन्दराग है। छन्दराग की निवृत्ति से
जीवन आलोकमय हो जाता है। सुनार जैसे सोने से अनेक तरह के आभूषण
तैयार करते हैं, उसी तरह शान्तचित्त व्यक्ति अनेक श्रेय का भागी स्वतः ही
बन जाता है।
षोडश सर्ग
मानसिक एकाग्रता से योगी तत्त्वविद् बन जाता है। वह इनमें कुछ
तत्त्वों को स्वीकार करता है और कुछ का बहिष्कार। फिर वह चार तरह के
ध्यानों तथा पाँच प्रकार के अभिज्ञाओं का अधिकारी बन जाता है। फिर
वह तत्त्वों का स्वयं परीक्षक बन जाता है। तत्त्वों का विश्लेषण कर आर्य-
सत्य का अधिकारी बन जाता है। फिर उसका चित्त मल-रहित निर्मल
बन जाता है। चार आर्य-सत्यों का ज्ञान ही योगी का आत्मदर्शन है। चार
आर्य-सत्यों के ज्ञान से वह दुःखमुक्त हो जाता है। बीज का जो स्वभाव है, वही
रहेगा। आग अपनी प्रकृति नहीं बदलती है। दोषों से ही संसार की
उत्पत्ति होती है। शान्त एवं मंगलकारी धर्म का साक्षात्कार करना चाहिए।
तृष्णा विनाशी है। शान्ति-प्राप्ति के लिए मनुष्य को वैसा ही प्रयास करना
चाहिए, जैसे कृषक खेत जोत कर अन्न का उत्पादन करता है।
सप्तदश सर्ग
ससदश सर्ग में परमशान्ति के लिए नन्द की तपस्या एवं विगत-मोहस्थिति
का वर्णन है। इस सर्ग में अनुगामी नन्द को तत्त्वमार्ग का उपदेश प्राप्त हो
गया। वह गुरु को प्रणाम कर जंगल के लिए प्रस्थान कर गया। वहाँ
जाकर उसने मुक्तिमार्ग का सम्भारप्रत्यय, स्वभाव और दोष-विशेष की
दृष्टि से पदार्थों और धर्मों की विधिवत् परीक्षा की। उसने रूप और अरूप
के सारतत्त्वों को देखने की इच्छा से शरीर का विश्लेषण किया। परीक्ष-
णोपरान्त इन्हें नन्द ने अनात्म और अनित्य पाया। उसने संसार को सकारण
पाया। इस अनुगामी ने अपने उद्योग से उस दुष्कर मार्ग को प्राप्त कर लिया,
जहाँ सामान्य योगी का प्रवेश नहीं हो पाता है। चतुर्थ ध्यान का सहारा लेकर
प्रज्ञारूपी तलवार से इसने मार्ग की सारी बाधाओं को विनष्ट कर डाला। अन्त
में मन ही मन उसने तथागत को प्रणाम किया और कहा कि मैं अब मुक्त हूँ,
सुखी हूँ। अनेकों बार अपने इस मार्गदाता को प्रणाम करता हूँ।
अष्टादश सर्ग
बौद्धदर्शन दुःखवाद के लिए प्रसिद्ध है। जीवन कुछ नहीं है, चेतना की
परिवर्तनशीलता या प्रवाहमयिता है और यही दुःख या क्लेश है। इसी का