सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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ध्वन्यात्मक स्थिति का प्रयोग अश्वघोष के सिद्धार्थ नन्द ने 'मार' की सेना को
पराजित करने में किया है। इसका एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा—
'ततः स बोध्यङ्गशितात्तशस्त्रः सम्यक्प्रधानोत्तमवाहनस्थः ।
मार्गाङ्गमातङ्गवता बलेन शनैः शनैः क्लेशचमूं जगाहे ॥'
—सौ० न० १७।२४
यहाँ कवि का प्रधान लक्ष्य शान्तरस ही है, वीररस नहीं। शान्तरस
के विभाव के रूप में संसार की दुःखमयता तथा नारी-सौन्दर्य की बीभत्सता
का वर्णन जो इनके काव्य में हुआ है, वह बड़ा तीव्र है—
'मलपङ्कधरा दिगम्बरा प्रकृतिस्थैर्नखदन्तरोमभिः ।
यदि सा तव सुन्दरी भवेन्नियतं तेऽद्य न सुन्दरी भवेत् ॥
स्रवतीमशुचिं स्पृशेच्च कः सघृणो जर्जरभाण्डवत् स्त्रियम् ।
यदि केवलया त्वचावृता न भवेन्मक्षिकपत्रमात्रया ॥'
— सौ० न० ८।५१-५२
यदि वह सुन्दरी मलरूपी कीचड़ से युक्त और विवस्त्र हो जाए और
उसके नख, दाँत और रोम स्वाभाविक अवस्था में ही आ जाय तो भला कैसी
लगेगी ? इतना ही नहीं, कौन ऐसा घृणित व्यक्ति है, जो टूटे-फूटे बर्तन की तरह
झरती औरत को छू भी सकेगा, अगर मक्खी की पाँख जैसी चमड़ी से वह
ढँकी न हो।
इसी प्रकार अश्वघोष का प्रकृति-वर्णन भी अपने ढंग का ही है। इनके
प्रकृति-चित्रण के अनेक स्थल है। इसके लिए 'बुद्धचरित' का तृतीय और
सप्तम सर्ग तथा सौन्दरनन्द का सप्तम और दशम सर्ग हैं। यहाँ कवि की
निरीक्षण की सूक्ष्मता, नवीनता, हृदय की सरलता और कल्पना की
कमनीयता पायी जाती है। अश्वघोष ने प्रकृति को मूक, चेतनाहीन अथवा
निष्प्राण न मानकर उसमें यत्र-तत्र जीवन-ज्योति जगाने की चेष्टा की है।
फलतः उसमें भी सुख या दुःख की संवेदनशीलता की अनुभूति पाठकों को
होती है। अन्तःप्रकृति और बाह्यप्रकृति की रुचिर सामञ्जस्यपूर्ण उद्भावना
इन्होंने अपने महाकाव्यों में करने की चेष्टा तो की है, परन्तु उसमें इनका मन
रमा नहीं है। सौन्दरनन्द के सप्तम-सर्ग की प्रकृति प्रिया-विरही नन्द के लिए
'उद्दीपन का काम करती हैं—
'स्थितः स दीनः सहकारवीथ्यामालीनसम्मूर्च्छितषट्पदायाम् ।
भृशं जजृम्भे युगदीर्घबाहुर्ध्यात्वा प्रियां चापमिवाचकर्ष ॥'
—सौ० न० ७।३
लगता है वाल्मीकि या कालिदास के प्रकृति-वर्णन के प्रति इस कवि का मोह या
आसक्ति नहीं है। संभवतः ऐसे स्थलों में भिक्षु अश्वघोष के लिए प्रकृति भी