सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५ )
‘दीपो यथा निवॄतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्।
दिशं न काञ्चिद्विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥’
—सौ० न० १६।२८
‘जिस तरह निर्वाण को प्राप्त हुआ दीपक न पृथ्वी पर रहता है न आकाश
में जाता है, न किसी दिशा या विदिशा में, किन्तु तेल समाप्त हो जाने पर
केवल शान्ति को प्राप्त होता है।’ इस तरह इनकी भाषा में सरलता के
साथ सुबोधता भी मिलती है। कुछ विद्वानों की राय में तो अश्वघोष की
उपमाएँ कालिदास से भी बढ़कर हैं। इस कथ्य के समर्थन में उन्होंने दोनों
की उपमाओं की निम्न-लिखित तुलना की है—
कालिदास ने कुमारसंभव में पार्वती के लिए लिखा है—
‘मार्गाचल व्यतिकराकुलितेव सिन्धुः।
शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥’
राह में आये पहाड़ से क्षुब्ध नदी की तरह पार्वती न तो आगे बढ़ पाती थीं
और न ठहर ही पाती थीं। अब ऐसे ही भाव को व्यक्त करने वाली अश्वघोष
की एक उपमा द्रष्टव्य है—
'सोऽनिश्चयान्नापि ययौ न तस्थौ ।
तरंस्तरङ्गेष्विव राजहंसः ॥'
—सौन्दरनन्द ४।४२
तरङ्गों में तैरते हुए राजहंस की तरह वह अनिश्चय के कारण न तो गया
ही और न ठहरा ही। कुछ आलोचकों ने तरंगों में तैरते हुए राजहंस का निश्चय
संदिग्ध माना है। अतः कालिदास की अपेक्षा अश्वघोष की उत्कृष्टता इससे
सिद्ध नहीं होती। एक अन्य तुलना भी इस दृष्टि से देखना अपेक्षित है।
रघुवंश में राजा दिलीप के लिए प्रयुक्त कालिदास की निम्नलिखित उपमा—
‘व्यूढोरस्को, वृषकन्धः शालप्रांशुर्महाभुजः ।’
—रघु० १।१२
इसी तरह नन्द का वर्णन करते हुए अश्वघोष की एक तुलना—
‘दीर्घबाहुर्महावक्षः सिंहांसो वृषभेक्षणः’ ।
—सौ० न० २।५८
इस सन्दर्भ में श्रीचट्टोपाध्याय का तो मत यहाँ तक है कि—‘कालिदास ने
यहाँ दिलीप की आंखों की ओर आंख उठाकर देखा ही नहीं, वह तो उसके
कंधों को सांढ़ के कन्धे की तरह ही देख रहा है। अश्वघोष ने कुछ भेद रखना
चाहा और अपना भेद स्वयं खोल डाला।’ इस संदर्भ में विशेष अध्ययन के
लिए द्रष्टव्य है—
‘Date of Kalidas’—Kshetresha Chattopadhyaya ( Reprint
form the Allh, University Studies Vol. II 1926 p. 82–106 )