सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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छन्द प्रयोग में ही कवि की योग्यता परखी जाती है। यह एक ऐसी कसौटी
है, जहाँ कवि के भाषाज्ञान की परीक्षा होती है। कविता में भाषा, रीति,
गुण, अलंकार और छन्द का सहयोग भावों को उत्कर्ष पर पहुँचाता है। इनके
सहयोग से काव्य स्वयं उत्कृष्ट बन जाते हैं। इस दृष्टि से अश्वघोष की
शैली विषयानुकूल और सर्वत्र सशक्त है। सौन्दरनन्द के शब्द-शब्द में कवि-
कौशल का उत्कृष्टतम रूप झलकता है। शब्दों का सुन्दर चयन और उनका
विन्यास अश्वघोष के प्रकाण्ड पाण्डित्य का प्रदर्शन करता है। इस दृष्टि से
काव्य और भावपक्ष दोनों ही सुन्दर हैं। वैसे तो इन्होंने कुल सोलह तरह के
छन्दों का प्रयोग सफलतापूर्वक सौन्दरनन्द में किया है, किन्तु सुवदना, शिख-
रिणी, शार्दूलविक्रीड़ित, प्रहर्षिणी, रुचिरा, उद्गता, सुन्दरी, मालिनी, वसन्त-
तिलका, वंशस्थ, उपजाति, पुष्पिताग्रा, अनुष्टुप् आदि छन्दों का भी प्रयोग
किया है। आदिकवि वाल्मीकि की तरह इन्हें भी अनुष्टुप् के प्रति आसक्ति है।
संगीत की दृष्टि से प्रहर्षिणी और रुचिरा का प्रयोग अधिक सफल हुआ है।
संस्कृत महाकाव्यों में अश्वघोष का स्थान
संस्कृत महाकाव्यों की परम्परा में महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि और
उनकी रामायण को प्रथम महाकाव्य कहा जाता है। अश्वघोष को इस काव्य-
परम्परा की पहली श्रेणी में तो हम नहीं रख सकते, क्योंकि इनके एक ओर
रसवादी कवि कालिदास हैं तो दूसरी ओर कलावादी माघ और हर्ष जैसे महा-
कवि हैं। फिर भी इनमें कुछ विशिष्टता है, जिसका संकेत हम पूर्व ही कर चुके
हैं, जो इन्हें महत्त्वपूर्ण बना दिया है। अश्वघोष में ही हमें सर्वप्रथम कुछ ऐसी
काव्य-रूढ़ियाँ मिलती है, जिनका प्रयोग कालिदास से श्रीहर्ष तक मिलता है।
इनकी शैली में वाल्मीकीय शैली का उदात्त उत्कर्ष मिलता है। पाश्चात्य
कवि मिल्टन ने कविता को सादा, प्रत्यक्षमूलक और रागात्मक कहा है—
'Poetry should be simple, senseous and passionate'
अश्वघोष की कविता में प्रायः इन तीनों गुणों का समावेश है। इनकी
कविता में माधुर्य का मधुर निवेश, प्रसाद की स्निग्धता, पदों की सरलता,
वैराग्य की शीतलता, दर्शन का सौष्ठव, यत्र-तत्र अलंकारों और छन्दों का उप-
युक्त प्रयोग इन्हें कुछ पृथक् महत्त्व देते हैं। ये गुण ही इन्हें संस्कृत-महाकाव्यों
का प्रतिनिधि कवि मान लेने को विवश कर देते हैं। अश्वघोष के दोनों महा-
काव्यों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सफल चित्रण हुआ है। अपने
उदात्त एवं उन्नत हृदय को भिक्षु-कवि अश्वघोष ने संसार की असारता और
मानव-जीवन के शाश्वत मूल्यों के बीच रखकर जो संवेदना, जैसी अनुभूति
आपने प्राप्त की है, उसकी अभिव्यंजना और स्पष्ट अभिव्यक्ति इनके दोनों
महाकाव्यों में दर्शनीय है। आपकी कविता दुःखपूर्ण मानव-जीवन को दुःख से