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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 496 में से

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पृष्ठ 47

संक्षिप्त कथावस्तु
प्रथम सर्ग
प्रथमसर्ग में कपिलवस्तु के वर्णन-क्रम में शाक्यों का वर्णन है। प्रथम
तीन सर्गों में शाक्यों की वंश-परम्परा, सिद्धार्थ-जन्म, निष्क्रमण, बुद्धत्व की
प्राप्ति में बुद्धचरित के पूर्वार्ध की कथा का ही संक्षिप्त रूप परिलक्षित होता
है। परम धार्मिक, तपःपूत, सिद्धपुरुष कपिल गौतम एक मुनि थे। उनका
आश्रम हिमाचल में था। एक बार इक्ष्वाकुवंश के दो राजकुमार घूमते-
फिरते वहाँ पहुँचे। दोनों ही भाई अपने पिता के सत्य की रक्षा के लिए
वनाञ्चल में घूम रहे थे। बड़ा भाई जितना ही संयमित था, छोटा उतना ही
उद्दण्ड। कपिलमुनि का आश्रम उनके मन को भा गया। वे दोनों मुनि
कपिल गौतम के शिष्य बन गये। कपिल गौतम का आश्रम शाकवन में था।
कपिल गौतम के शिष्यत्व के कारण गौतमगोत्रीय तथा शाकवन में रहने के
कारण शाक्य-मूलक विख्यात हुए। गुरु ने शिष्यों को एक समृद्ध नगर बसाने
का आदेश दिया। मुनि के स्वर्गारोहण के पश्चात् राजकुमारों ने वहाँ गुरु के
नाम पर 'कपिलवास्तु' नामक एक समृद्ध नगर बसाया।
द्वितीय सर्ग
कपिलवास्तु के प्रथम नृपति शुद्धोदन हुए। अपनी शासन-व्यवस्था और
प्रजावत्सलता के कारण ये बड़े ही लोकप्रिय प्रशासक बने। रक्षा-व्यवस्था
के कारण प्रजा समृद्ध एवं सुखी थी। इनके सुशासन में विद्वान् सम्मानित
थे। सामन्तगण भय से नहीं, अपितु श्रद्धा और प्रेम से उनकी आज्ञा का पालन
करते थे। राजा शुद्धोदन नीतिज्ञ, प्रजापालक तथा एक राजा के कर्त्तव्य
से पूर्णतया परिचित थे। प्रजा को प्रसन्न करने के लिए सतत प्रयत्नशील थे।
राष्ट्र धन-धान्य से समृद्ध था। उसके उत्तम व्यवहारों से प्रसन्न होकर लोग प्राण
देकर भी उसका हित चाहते थे। राज्य में कभी अनुचित कर नहीं लगाया
गया। इन्होंने आपद्ग्रस्तजनों को अपनाया, सुजनतावश शत्रुओं के गुणों की भी
सराहना की। अपनी प्रज्ञा से सभी को प्रसन्न किया। धर्म-जिज्ञासुओं ने इस
धार्मिक राजा को निष्ठा और श्रद्धा से सम्मानित किया। तृषित देवताओं ने
इसके घर अवतार लेना चाहा।
एक रात राजमहिषी माया ने एक विचित्र स्वप्न देखा। तदनुसार छः
दाँत वाले एक श्वेत गजराज ने उसके गर्भ में प्रवेश किया। इसे स्वप्नविदों ने
यशस्वी राजकुमार के जन्म की सूचना बतलाया। शुभलग्न एवं मंगलकारी
वातावरण में सिद्धार्थ ने गौतम के रूप में अवतार लिया। शुद्धोदन की छोटी