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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 496 में से

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होती रही है, परन्तु इसके उपचार भी तो हैं। यदि तुम्हें शारीरिक पीड़ा है तो
किसी वैद्य से कहकर उपचार करवाओ और यदि मानसिक पीड़ा है और मुझसे
कह सकते हो तो कहो। तब उस श्रमण को एक ओर ले जाकर नन्द ने अपनी
मानसिक व्यथा सुनाते हुए कहा—मित्र ! मैं प्रिया-वियोग में तड़प रहा हूँ। मैं मर
जाना पसन्द करता हूँ, परन्तु उसके बिना जीना नहीं चाहता। यह सुनकर उस
भिक्षु ने हितकर परन्तु कटुसत्य समझाते हुए उसे कहा—जिसका मन शान्त है,
उसका ही धार्मिक अनुष्ठानों में मन लगता है। कामासक्त व्यक्ति धार्मिक कृत्य
में आनन्द की अनुभूति प्राप्त कर ही नहीं सकता। तृष्णावान् व्यक्ति ही काम-
सुख में आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। तुम्हें यह पता नहीं है कि औरतें
मीठी बोली से आकृष्ट करती हैं, परन्तु तीक्ष्ण चित्त से प्रहार भी करती हैं। उनकी
बातों में मधु और हृदय में हलाहल भरा रहता है। नारी का शरीर और मन
दोनों ही दोषपूर्ण हैं। उनके प्रति अपने चंचल मन को रोको। काषाय वस्त्र
धारण कर फिर उस नियम को तोड़ना अन्याय है। मृत्युभय से ग्रस्त कच्चे
बर्तन की तरह इस क्षणभंगुर संसार के प्रति यह आसक्ति छोड़कर मुक्ति-मार्ग
में मन लगाओ।
नवम सर्ग
उस भिक्षु के उपदेश का नन्द पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह कामोन्मत्त
घर जाने के लिए कृतसंकल्प हो गया। भिक्षु ने उसकी शान्ति के लिए उसे
पुनः समझाने की चेष्टा की। उसने कहा—मैं तुम्हारी जवानी के जोश को
पहचानता हूँ। तुम्हारी यह युवावस्था, तुम्हारा लावण्य, तुम्हारा बल सबके
सब क्षयिष्णु एवं क्षणिक है। सोचकर देखो—हड्डी, मांस और रक्त-मज्जा से
निर्मित इस देह पर घमंड करना कितनी मूर्खता है। शरीर तो सदैव विपत्ति से
ग्रस्त है। यह तो मिट्टी के घड़े से भी गया बीता है। विधिपूर्वक रखने पर घड़े
तो कुछ दिनों तक रह सकते हैं, परन्तु यह देह तो अच्छी तरह से रखने पर भी
नष्ट हो जाती है। जब जाड़े से कांपता आग की, गरमी से तड़पता ठंड की,
प्यासा पानी की और भूखा अन्न की इच्छा करता है तो फिर बल कैसा ? हे
नन्द ! रूप, तारुण्य और बल के अनायं अभिमान को दूर करो। पाप रहित मन
से मुक्तिमार्ग को पहचानो। भिक्षु के उपदेश से भी जब नन्द का मन शान्त नहीं
हुआ, तब उस भिक्षु ने भगवान् बुद्ध को नन्द की स्थिति से अवगत करा दिया।
दशम सर्ग
परम कृपालु बुद्ध ने नन्द को बुलाकर उससे ही उसकी सारी बातें जान
लीं। उन्होंने दार्शनिक पृष्ठभूमि में उन्हें समझाना प्रारंभ किया। तत्पश्चात्
तथागत नन्द को साथ लेकर योगविद्या के बल से आकाश में उड़ गये। वे
हिमालय के ऊपर निर्मल आकाश में, एक सरोवर में पंखों को फैलाकर तथा
दूसरे से सटाकर विचरते हुए दो चकवों को दिखला दिये।