सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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होना, इन तथ्यों का सत्यस्वरूप यही है । बौद्धदर्शन में इसी को 'मज्झिमा-
पटिपदा' अर्थात् 'मध्यम मार्ग' कहा गया है ।
पश्चाद्वर्त्ती नागार्जुन ने इसी विचार को आगे बढाया और माध्यमिक दर्शन
या शून्यता दर्शन की स्थापना की, जिसका पर्याप्त विकास नालन्दा विश्व-
विद्यालय में हुआ । मध्यमकारिका में नागार्जुन ने लिखा है—
'न सतो नाऽपि परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुतः ।
उत्पन्ना जातु विद्यन्ते भावाः क्वचन केचन ।।'
—नागार्जुन ।
मोक्षकामी दार्शनिक काम यानि मार को संसार का अधिपति समझता
है । अतः सर्वप्रथम उसे जीतकर शान्ति या परम शान्ति प्राप्त कर सकता है ।
यही कारण है कि वह काम को जीतने के लिए बद्धपरिकर रहता है । बुद्ध-
चरित का ग्यारहवां सर्ग इसका उदाहरण है । इस संसार में शत्रु हत्या करना
चाहते हैं, पर वे तो समय पर शत्रुभाव छोड़कर मित्र भी बन जाते हैं, किन्तु
काम इस संसार में या परलोक में प्रतिक्षण दुःख के हेतु हैं—
'इहैव भूत्वा रिपवो वधात्मकाः प्रयान्ति काले पुरुषस्य मित्रताम् ।
परत्र चैवेह च दुःखहेतवो भवन्ति कामाः न तु कस्यचिच्छिवाः ।।'
—सौ० न० ९।४७
यदि तुम्हें शक्तिशाली होने का घमंड है, अपने बल को महान् समझते हो
तो इसकी परीक्षा के लिए काम से युद्ध करो, अगर तुम इन्हें पराजित किये तो
निश्चय ही तुम बलवान् हो, अन्यथा तुम्हारा बल बेकार है । यही मारविजय
बौद्धदर्शन की कामना है ।
यह 'काम' क्या है ? साधारणतः जिसे काम कहते हैं—वह राग है, विष-
योपभोग की आसक्ति है और उसमें अपने आपको भुलाने का एक उपाय है,
एक युक्ति है । मनुष्य प्रतिपल दुःख में है, अपने आपको भूलना चाहता है ।
तथाकथित विषयोपभोग से वह यथार्थ जीवन से बहुत दूर चला जाता है । वह
आसक्ति में डूबकर अपने आपको भुला देता है । केवल दुःखों के प्रति मूर्च्छा
ला देता है । साधारणः काम नाम से जाने जानेवाले 'मार' ऐसे ही मूर्च्छा और
विस्मरण की चित्तस्थिति है । यह कामोपभोग सुख अति क्षणिक है । वह
दुःख से ही उत्पन्न होता है, दुःख को भुलाने के उपाय से ज्यादा नहीं है ।
जगत् के जाल से छुटकारा पाये नन्द की फिर से उसमें फँसने की इच्छा
की दयनीय दशा का एक मार्मिक चित्र दर्शनीय है—
'कृपणं बत यूथलालसो महतो व्याधभयाद्विनिःसृतः ।
प्रविविक्षति वागुरां मृगश्चपलो गीतरवेण वञ्चितः ।।'—सौ० न० ८।१५
इसी तरह बौद्धधर्म के चार आर्यसत्यों का वर्णन बौद्धदर्शन का ही एक
निदर्शन है—
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'बाधात्मकं दुःखमिदं प्रसक्तं दुःखस्य हेतुः प्रभवात्मकोऽयम् ।
दुःखक्षयो निःशरणात्मकोऽयं, त्राणात्मकोऽयं प्रशमस्य मार्गः ॥'
—सौ० न० १६।४
शील, संयम और ब्रह्मचर्य के माध्यम से जीवन्मुक्त होने का उपाय,
प्रदर्शन ही बौद्धदर्शन के जीवन्त तत्त्व हैं। इसमें अहिंसा, सत्य, मैत्रीधर्म,
काम-विजय, इन्द्रिय-नियन्त्रण, आहार और आचारशुद्धि को महत्त्वपूर्ण स्थान
दिया गया है। सर्वप्राणियों पर मित्रचक्षु ही इस दर्शन का सर्वस्व है। इसका
स्वरूप ही प्राणिकल्याण या-सीमित अर्थ में आत्ममुक्ति है। अश्वघोष का दर्शन
उनकी कृतियों में इसी विचार से अनुप्राणित है।
( ४ ) अश्वघोष की कलात्मक मान्यता
अश्वघोष का कलात्मक दृष्टिकोण निश्चित रूप से उपदेशवादी या प्रचार-
वादी है। वे काव्यानन्द को रस का साधन मानते हैं, कालिदास की तरह
साध्य नहीं। इनकी कलात्मक मान्यता पर सोचते ही ध्यान आता है कि कविता
मानव-मन की तरह ही अतिपुरातन है। आजतक इस कलात्मकता की कोई
परिभाषा नहीं बन पाई, जिसमें तर्क-वितर्क की कोई संभावना न रहे। आदि-
युग से 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' से लेकर आजतक शुष्कवादी युग तक जो कुछ
काव्यकला के रूप में और उसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में कहा जा चुका है,
वह परिणाम में कम नहीं हैं, किन्तु इससे न तो मनुष्य के मन का परितोष हो
सका और न ही उसकी तार्किक बुद्धि का समाधान। कवि अपने युग का प्रतिनिधि
होता है और युग अपनी समस्याएँ लेकर समाधान खोजता है। युग ही किसी
कवि की कलात्मक मान्यता को एक विशिष्ट रूपरेखा देता है। ऐसी स्थिति में
किसी कवि से किसी अन्य कवि की तुलना आलोचक के लिए कठिन काम बन
जाता है। फिर भी इनके अध्ययन-मनन से आलोचक को किसी निष्कर्ष पर तो
आना ही पड़ता है। इस दृष्टि से देश-विदेश के समानधर्मी कवियों के दृष्टि-
कोण की समता-विषमता पर स्थिर दृष्टि से किसी निष्कर्ष पर तो आना ही
पड़ेगा। कोटि-निर्धारण में इनके परवर्त्ती कवि कालिदास, भारवि, माघ और
श्रीहर्ष के समूह में इन्हें किसी भी स्थिति में डाला नहीं जा सकता। कालिदास
यदि विशुद्ध रसवादी कवि हैं तो भारवि अपनी अर्थगुरुता के कारण अल-
ङ्कार और रसवादी कवि हैं तथा कलाबाज पण्डित कवि हैं। जहाँ तक श्रीहर्ष
का प्रश्न है तो वे मूलतः विशुद्ध रसवादी कवि हैं। इनके बीच अश्वघोष कवि
होने के नाते दो व्यक्तित्व को अपनाकर चलते नजर आते हैं। बुद्धचरित का
कवि अपने पाठकों को परमशान्ति के मन्दिर तक कभी-कभी रमणीय,
अन्यथा अधिकतर शुष्क पार्वत्य प्रदेश से ले जाना चाहता है, परन्तु ठीक
उसके विपरीत सौन्दरनन्द का कवि अपने पाठकों को सीधे राजमार्ग से ले
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चलता है। जहाँ मार्ग के दोनों ओर शीतल सुरभित सुखद पेड़ों की छाया
पथिक को शान्ति का अनुभव नहीं होने देती है। मार्ग की मनोहरता.पथिक
के पैरों को आगे बढ़ने की स्वतः प्रेरणा देती है। इनके काव्य का लक्ष्य 'रतये'
नहीं 'व्युपशान्तये' है। इसी तरह विदेशी कवियों के बीच अश्वघोष दान्ते या
मिल्टन के समीपवर्त्ती प्रतीत होते हैं। लेकिन सिद्धान्त को अगर छोड़ दिया
जाय तो शैली की दृष्टि से ये फिर उन दोनों से भी अलग पड़ जाते हैं। शैली
की दृष्टि से मिल्टन कलावादी है, दान्ते थोड़ा-बहुत अश्वघोष से मिलते
हैं। अश्वघोष की एक स्वगतोक्ति इस सन्दर्भ में दर्शनीय है—
'इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भाकृतिः,
श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसः काव्योपचारात् कृता।
यन्मोक्षात्कृतमन्यदत्र हि मया तत्काव्यधर्मात् कृतम्,
पातुं तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृद्यं कथं स्यादिति ॥'—सौ० न० १८।६३
मुक्तिधर्म की व्याख्या से परिपूर्ण यह कृति शान्ति प्रदान करने के लिए है,
न कि आनन्द देने के लिए; अन्यमनस्क श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए
यह कृति काव्यशैली में रची गयी है। इसमें मुक्तिधर्म के अतिरिक्त मैंने जो कुछ
भी लिखा है, सो इसे काव्यधर्म के अनुसार सरस बनाने के लिए ही; जैसे कि
कड़वी औषधि को पीने लायक बनाने के लिए उसमें मधु मिलाया जाता है।
अश्वघोष कालिदास के इस कथन—'किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्'
से पूर्ण सहमत प्रतीत होते हैं। नीतिपरक होने के नाते अव्युपदेशवादी कवियों
के काव्य की परिणति जिस तरह अतिदयनीय होती है; इस दुःखद परिणति से
अश्वघोष उपदेशवादी होने के बावजूद बचे हैं। इससे भी यह प्रतीत होता है कि
अश्वघोष के पास निश्चय ही एक कवि का सच्चा हृदय था। पाश्चात्य आलोचक
और कवि 'मैथ्यू आर्नल्ड' ने उदात्त काव्य की एक पहचान स्थिर की है। तद-
नुसार साहित्य में वही काव्य स्थायित्व प्राप्त कर सकता है, जो नीतिपरक है।
जीवन का उदात्त दृष्टिकोण, जो निश्चितरूप से नैतिक मर्यादा पर स्थिर रहता
है, उसी से काव्य में स्थायी मूल आंका जा सकता है। जीवन की समष्टि में सूक्ष्म
स्थूल से बाहर कहीं अपना अस्तित्व नहीं रखता। नैतिक मर्यादा के व्यक्ति-
परक, दार्शनिक तथ्य की सौन्दर्यानुभूति पर आश्रित अश्वघोष के महाकाव्य
अपने लौकिक रूपों में इतना परिचित और मर्मस्पर्शी बन गया है कि उसके
प्रवाह में युगों से प्रचलित सस्ती भावुकतामूलक वासना के विकृत चित्र देने-
वाले काव्य सहज ही बह गये हैं। जीवन और कला के क्षेत्र में अश्वघोष ने
जो परिष्कार किया है, वह अविस्मरणीय है।
किसी भी काव्य के लिए आध्यात्मिक या दार्शनिक पृष्ठभूमि उचित है
अथवा अनुचित—इसका निर्णय व्यक्तिगत चेतना ही कर सकेगी। दुःख, स्मृति,
मुक्ति, चैतन्य, प्रवाह स्थूल, व्यक्त, प्रत्यक्ष या यथार्थ जो कुछ, यदि केवल यही
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अध्यात्म या दर्शन से अभिप्रेत है तो हमें वह सौन्दर्य, शील, शक्ति, मैत्रीधर्म
आदि की सभी सूक्ष्मभावनाओं में फैला है । अनेक अव्यक्त, किन्तु यथार्थ
सम्बन्धी धारणाओं में अंकुरित, इन्द्रियानुभूत प्रत्यक्ष की पूर्णता से उत्पन्न,
उसी की परोक्षरूप भावना में छिपा हुआ और अपनी ऊर्ध्वगामी वृत्तियों से
निर्मित मैत्रीधर्म, मानवधर्म आदि के ऊँचे आदर्शों से अनुप्राणित मिलेगा ।
अश्वघोष की कृतियों में ऐसी दार्शनिक अनुभूतियाँ तो भरी पड़ी मिलेगी । एक
चित्र अश्वघोष का कितना नैतिक है, सार्वजनीन एवं मानवधर्मी हैं—इसे देखने
से ही पता चल जाता है । मनुष्य को सभी अवस्थाओं में दृष्टि, घ्राण, श्रवण,
आस्वाद और स्पर्श—इन बुराई करनेवाले शत्रुओं का नियंत्रण करने में सदैव
सावधान रहना चाहिए । इस विषय में क्षणभर के लिए भी प्रमाद या आलस्य
घातक सिद्ध हो सकता है—
'तस्मादेषामकुशलकराणामरीणां चक्षुर्घाणश्रवणरसनस्पर्शनानाम् ।
सर्वावस्थं भव विनियमादप्रमत्तो मास्मिन्नर्थे क्षणमपि कृथास्त्वं प्रमादम् ।।'
—सौन्दरनन्द १३।५६
यदि अश्वघोष के इस कथन को परम्परागत धार्मिक रूढ़ि या अध्यात्म की
संज्ञा देते हैं तो उस रूप में इस काव्य में इसका वह महत्त्व नहीं रह जाता, जो
कवि को अभिप्रेत है । इस कथन में अध्यात्म या दर्शन को बलात् प्रचारवादी
रूप देने का या उसकी मानवीय अतिचेतना की एकान्तिक अनुभूति को अस्वी-
कार करने के आग्रह का औचित्य प्रतीत नहीं होता है । अवश्य ही वह अपने
एकान्तिक रूप में भी सफल है, किन्तु इस मानवीय नैतिकता की अभिव्यक्ति
लौकिक रूपकों में ही तो संभव है ।
अश्वघोष की मुक्तिजन्य परोक्षानुभूति चाहे जितनी एकान्तिक रही हो,
परन्तु उनका शील, इन्द्रिय-संयम, मारजय, आर्यसत्य या वितर्कप्रहाण प्रभृति
की मर्मस्पशिनी अभिव्यञ्जना क्या किसी लोकोत्तर लोक से रूपक लाई है ?
हम भले ही अश्वघोष के आध्यात्मिक एवं दार्शनिक संकेतों से अपरिचित हों,
किन्तु उनकी लौकिक कलात्मक दृष्टिकोण की सप्राणता से हमारा पूर्ण परिचय
है । जहाँ तक धर्मगत रूढ़िग्रस्त प्रचार या उपदेशात्मक काव्य का प्रश्न है तो
वह तो केवल विधिनिषेधमय सिद्धान्तों का संग्रहमात्र है, जो अपने प्रायोगिक
स्वरूप को खोकर इसके वास्तविक स्वरूप के निर्माण में बाधक सिद्ध हुए हैं ।
बौद्ध धार्मिक दृष्टिकोण ने ही उनकी काव्यात्मक व्यापक दृष्टि को रोक दिया
है, जो व्यापक जीवन-दृष्टि कालिदास में पाई जाती है—यह अभाव अवश्य
खटकता है ।
(५) अश्वघोष की काव्य-प्रतिभा तथा उनके काव्यों का सौन्दर्य
भारतीय संस्कृत साहित्य की विशाल काव्य-परम्परा के प्रारंभ में ही
मानवीय चेतना की एक निश्चित दिशा निर्धारित कर दी गई है । यह परम्परा
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आदिकवि की अमर कृति रामायण तथा व्यास के महाभारत के रूप में विद्य-
मान थी। अपना अस्तित्व बनाये रखना, आत्मा की निर्मलता को स्थिर रखना
ही मानव-जीवन का लक्ष्य है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक ये महाकाव्य हैं। इनमें
आत्मपरकता का सिद्धान्त कार्यरत है, जो बाहरी प्रभावों के दबावों से नितान्त
मुक्त हैं। इन आर्षकाव्यों.के अतिरिक्त लौकिक संस्कृत-काव्य-परम्परा भी रही
हो। पाणिनि ने 'जाम्बवती-परिणय' तथा 'पाताल-विजय' नामक दो महा-
काव्यों की रचना की थी। इनके अतिरिक्त कई सुभाषितग्रंथ भी उपलब्ध हैं।
साधारणतः मनुष्य एक स्वचालित यंत्र है; उसके कथन और कार्य,
मानसिक स्थितियाँ और भावनाएँ, विचार और अभिप्राय सभी वाह्य शक्तियों
द्वारा उत्पन्न होते हैं। किन्तु उसे किसी अन्य आधार पर कार्यरत होना
चाहिए। एक पृथक् अस्तित्व बनाना उसके लिए आवश्यक है। जो कुछ वह
है, उतने से ही उसे संतुष्ट नहीं होना चाहिए। वह जो कुछ हो सकता है वहाँ
तक उसे जाना चाहिए। अपनी चेतना में उसका पुनर्जन्म या कायाकल्प
होना चाहिए। आमोद-प्रमोद या विलासमय जीवन बिताने वाला व्यक्ति,
अनिवार्यतः आन्तरिक पथ के पथिक, भीतर से बढने और नई-नई शक्तियाँ
एवं गुण प्राप्त करने वाले व्यक्ति से ऊँचे स्तर पर कदापि नहीं होते। मानव
केवल भौतिक सम्पत्ति—यहाँ तक कि ज्ञानार्जन—से ही संतुष्ट नहीं हो सकता।
उसका ध्येय कुछ और है—आत्मसाक्षात्कार। और इसी सिद्धान्त के प्रति-
पादक संस्कृत साहित्य की काव्य-परम्परा है।
संस्कृत साहित्य आध्यात्मिक जगत् में प्रमुख स्थान ग्रहण किया है और
इस तथ्य का प्रतीक है कि आत्मविजय, साहस, पवित्रता, जीवन में एकता
और मैत्रीभाव से ही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। यही आदर्श हमें मोक्षमार्ग
के चिन्तन में लीन बौद्ध दार्शनिकों में, अज्ञान, ईर्ष्या और 'मार' को पराजित
करने वाले शान्त एवं सौम्य बुद्ध में आत्मचिन्तन के पश्चात् तपःपूत काया में
सार्वभौम प्रेम में एकाकार हो जाने, मैत्रीभाव से सराबोर, आत्मलीन लाल-
साओं से ऊपर उठकर, परमपिता की इच्छा का पालन इस पार्थिव जगत् में
सदैव करने वाले साधु के आनन्दातिरेक अश्वघोष के साहित्य में मिलता है।
सृजनात्मक जीवन केवल ऐसे कवि के लिए संभव है, जो एकाग्र और
पवित्र रह सकते हैं और जिनमें एकान्त चिन्तन का साहस है। एकान्त के
क्षणों में ही, चित्त की एकाग्रता की स्थिति में, शील, संयम और आहार
नियंत्रण से आत्मोपलब्धि होती है, मुक्तिमार्ग के दर्शन होते हैं और उस
चिन्तन को कोई कवि काव्य-धरातल पर लाता है। फिर उसे अपनी भावनाओं
का परिधान पहनाता है, उसे शब्दों में व्यक्त करता है, गतिमयता प्रदान
करता है अथवा दर्शन के रूप में आंक देता है। मस्तिष्क को आत्मा का वाहन
बनाने के लिए एकान्त चिन्तन और काव्य का सृजन करता है। सम्पूर्ण सिद्धि
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भीतर से बाहर निकल आती है। उसका सच्चा ऐश्वर्य यही मानसिक चिन्तन
होता है, भौतिक नहीं। स्वतंत्रचेता अश्वघोष इसी दृष्टि से अन्य लौकिक
कवियों से भिन्न हैं। शैली की दृष्टि से भी अश्वघोष आदिकवि महर्षि
वाल्मीकि के समीपवर्त्ती ही प्रतीत होते हैं। उसी तरह कुछ स्थलों को छोड़ कर
इनकी भाषा भावानुसारिणी सरस, सरल और तरल है। आदिकवि की ही
तरह अनेक छन्दों का प्रयोग करते हुए भी अश्वघोष ने अधिकतर अनुष्टुप् का
ही प्रयोग किया है।
अश्वघोष की कथावस्तु बौद्ध अवदानों पर आधारित है। वस्तु को ऊर्ज-
स्वित एवं काव्यमयता के लिए उन्होंने जातक-कथाओं में वर्णित कथाओं के
मूल रूप में यत्र-तत्र अपेक्षित परिवर्तन एवं परिष्कार भी किया है। जातक-
कथा में एक बन्दरी का वर्णन है, जिसे बौद्ध ग्रन्थों में भगवान् बुद्ध ने नन्द को
दिखलाकर उसके प्रियासक्त मन को सुस्थिर करना चाहते हैं। उस बन्दरी को
न नाक है और न कान ही, उसे आँख भी नहीं है! पर उसी कथा को अश्व-
घोष ने अपने काव्यगंगाजल से धो-पोंछ कर कितना सुन्दर बना दिया है, वह
दर्शनीय है—
'तस्मात्तु यूथादपसार्यमाणां निष्पीडितालक्तरक्तवक्त्राम्।
शाखामृगीमेकविपन्नदृष्टिं दृष्ट्वा मुनिर्नन्दमिदं बभाषे॥'
—सौ० न० १०।१५
× × ×
का नन्द रूपेण च चेष्टया च सम्पश्यतश्चारुतरा मता मे।
एषा मृगी वैकविपन्नदृष्टिः स वा जनो यत्र गता तवेष्टिः॥'
—सौन्दरनन्द १०।१६
बौद्ध अवदान के इस रूखे प्रसंग को अश्वघोष ने कितना आकर्षक बना
डाला है। 'ओ नन्द ! जरा इस कानी बंदरी को तो देखो, जो अपने दल से भटक
कर इधर आ गई है, इसका मुँह तो देखो, लगता है किसी ने महावर निचोड़
कर डाल दिया हो। इसे देखकर अब तुम्ही बतलाओ कि तुम्हारी समझ में
रूप और हावभाव में कौन अधिक खूबसूरत है—यह बंदरी या वह सुन्दरी,
जिसमें तुम्हारा जी रमा है ?' कितना तीखा कटाक्ष है। दिल को बेंधने वाला
कितना दिलकस व्यंग्य मुस्कुरा रहा है ?
अश्वघोष के प्रथम महाकाव्य बुद्धचरित का कथा-प्रवाह वर्ण्य विषय के
हाथों में हाथ डालकर चलते नजर आता है, किन्तु जहाँ दार्शनिक चिन्तन
अधिक तीव्र हो गया है वहाँ कथा-प्रवाह प्रायः पारिभाषिक शब्द-चट्टानों के
नीचे सूखता नजर आता है। ठीक यही स्थिति सौन्दरनन्द की भी है। जहाँ
दार्शनिकता का भार हल्का हुआ वहाँ बौद्ध संन्यासी अश्वघोष का कवित्व जाग
गया है। प्रसंग चाहे रत्यात्मक हो या वैराग्यात्मक—कथा-प्रवाह की प्राञ्जल
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धारा फूट पड़ी है। कोरा शृंगार-वर्णन या चित्रमयता के लिए कहीं भी कथा
का प्रवाह रुका नहीं है। यहाँ अश्वघोष भारवि, माघ या श्रीहर्ष को बहुत पीछे
छोड़ जाते हैं। दार्शनिक स्थलों को छोड़कर-अश्वघोष का वस्तु-संविधान अधिक
स्वाभाविक, मनोरम, प्रवाहमय, सरस तथा प्रभावोत्पादक है। यहाँ अश्वघोष
कालिदास के साथ हाथ मिलाकर चलते नजर आते हैं। श्रीहर्ष की तरह न तो
अप्रासंगिक प्रकृति-वर्णन में ये उलझते हैं और न ही माघ की तरह चमत्कार
प्रदर्शन में। भट्टि की तरह व्याकरण के जटिल प्रयोगों के प्रदर्शन में भी इनकी
अभिरुचि नहीं है। ये अपने ढंग के निराले ही हैं।
तपःपूत आर्यभदन्त अश्वघोष ज्ञानी, भक्त और मूलतः शान्तरस के
कवि तो थे ही; लेकिन इसके अलावा श्रेष्ठसाधक, गणितज्ञ, शास्त्रवेत्ता, बौद्ध-
संगति-संशोधक और मँजे हुए आयुर्विज्ञानवेत्ता भी थे। इन सभी का स्पष्ट
स्वरूप इनकी कृतियों में देखने को मिलता है। बुद्धचरित, सौन्दरनन्द तथा
उपलब्ध अन्यापदेशी नाटक-खण्डों से भी यह प्रमाणित होता है कि ये शान्तरस
के कवि थे। दया, दान, सत्य, शौच और मृदुता इनके प्रमुख वर्ण्य विषय रहे
हैं। फलतः इन्होंने अपने दोनों ही महाकाव्यों में मुख्य रस के रूप में या
सहयोगी रस के रूप में या विरोधी रस के परिवेश में शान्तरस के अतिरिक्त
वीर, वीभत्स, करुण तथा शृंगार रस का निबन्धन बड़ी कुशलता एवं दक्षता
के साथ किया है। 'बुद्धचरित' के तृतीय, चतुर्थ और पंचम सर्ग में तथा
सौन्दरनन्द के चौथे और दसवें सर्ग में जो उदात्त शृंगार का वर्णन है; उसे
पढ़कर कोई यह सोच भी नहीं सकता कि यह कृति किसी बौद्ध संन्यासी की
है। अश्वघोष के कवि की परिनिष्ठित इस इमानदारी को कोई अस्वीकार नहीं
कर सकता। यह बात अलग है कि अपने चरितनायक बुद्ध की तरह इनका मन
भी शृङ्गार में अधिक नहीं रमता। फिर भी, इनके शृङ्गार की यह विशेषता है
कि वे नायिका की चेष्टा-वर्णन में उपमा को माध्यम के रूप में लेकर एक
ओर उनके दर्शन करते हैं, तो दूसरी ओर उनका गुण-वर्णन कर ये शान्त हो
जाते हैं। अपने शृङ्गार के भव्य एवं मर्यादित स्वरूप को इन्होंने बड़े संयत
एवं मूर्त्त रूप में ही व्यक्त किया है। इन्होंने नारी-सौन्दर्य को शान्त, वैराग्य-
शील एक भिक्षु की दृष्टि से नहीं देखा है। वस्तुस्थिति यह है कि इन्हें जहाँ
कहीं भी नारी के रूप-सौन्दर्य के वर्णन का अवसर मिला है, बाह्य-सौन्दर्य
वर्णन की अपेक्षा अन्तःसौन्दर्य के रहस्य का उद्घाटन करने में ही अत्यधिक
आत्मतोष का अनुभव करते हैं। नारी-सौन्दर्य की रुचिर अभिव्यक्ति में निरी-
क्षण की सूक्ष्मता, नवीनता, हृदय की सरलता और कल्पना की कमनीयता
सर्वत्र पायी जाती है। यद्यपि अश्वघोष स्वयं शान्त, विरक्त एक बौद्धभिक्षु
हैं, फिर भी उन्होंने इस नारी-सौन्दर्य को वैराग्यशील की दृष्टि से देखने की
अपेक्षा सरस लौकिक दृष्टि से ही देखा है। किन्तु जहाँ वे शान्तरस के प्रवाह
३ सौ० भू०
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में बहते हैं, वहां नारी का मूल्य उनकी दृष्टि में एक 'कानी बंदरी' से अधिक
नहीं है, उसे वे जर्जर भाण्ड की तरह 'मल-मूत्र-धरा' से अधिक महत्त्व नहीं
देते । फिर भी अपने इस शान्तरस के लिए कहीं भी उन्होंने शृङ्गार की
आत्मा को कुचला नहीं है । शृङ्गार के सारे चित्र सरस, भावमय और
प्रभावोत्पादक हैं । इनके वर्णन में सरसता तो है परन्तु ऐन्द्रिय विलासजन्य
कुत्सा नहीं है । कुछ उदाहरण दर्शनीय है—
'स चेद्भवेस्त्वं खलु दीर्घसूत्रो दण्डं महान्तं त्वयि पातयेयम् ।
मुहुर्मुहुस्त्वां शयितं कुचाभ्यां विबोधयेयं च न चापलेयम् ॥'
—सौन्दरनन्द ४।३५
अगर लौटने में तुमने देर की तो जब तुम सोओगे तो अपने कठोर कुचों
की लगातार ठोकरों से तुम्हें सोने न दूँगी, परन्तु तुमसे बात बिल्कुल ही नहीं
करूँगी । शृङ्गार की यह तरलता रसिक पाठकों के दिल को छू लेती है । कवि
के रूप-सौन्दर्य का एक और हृदय संवेद्य उदाहरण—
'छातोदरीं पीनपयोधरोरुं स सुन्दरीं रुक्मदरीमिवाद्रेः ।
काक्षेण पश्यन्न ततर्प नन्दः पिबन्निवैकेन जलं करेण ॥'
—सौन्दरनन्द ४।४१
सुनहले पर्वत-गुफा की तरह क्षीण उदर वाली, पीन पयोधर और मोटी-मोटी
जांघों वाली उस सुन्दरी को कनखी आंखों से देखता हुआ नन्द उसी तरह तृप्त
नहीं हुआ, जैसे अतिप्यासा व्यक्ति चुल्लू से पानी पीकर नहीं अघाता । शृङ्गार
के सरस-सरल एक और चित्र—
'मुहुर्मुहुंमंदव्याजसुस्तनीलांशुकापरा ।
आलक्ष्यदशना रेजे स्फुरद्विद्युदिव क्षपा ॥'
—बु० च० ४।३३
नारी-सौन्दर्य का उद्दाम, परन्तु कितना मर्यादित यह रूप है। वह नारी
नहीं बिजली से कौंधती रात है। नशे के बहाने वह बार-बार अपने नीले आँचल
को नीचे सरका देती है, जिससे उसकी करधनी चमक उठती है।
अश्वघोष केवल बौद्धभिक्षु या पण्डित कवि ही न थे, अपितु ये प्रचण्ड
साधक और समुन्नत योगी भी थे । इनकी अमूर्त्त कल्पना से गृहीत नारी-
सौन्दर्य का एक और चित्र—
पणव युवतिर्भुजांसदेशादवविस्रंसितचारुपाशमन्या ।
सविलासरतान्ततान्तमूर्वोर्विवरेकान्तमिवाभिनीय शिश्ये ॥
—बु० च० ५।५६
वाह रे खूबसूरती ? कन्धे से हार नीचे खिसक गये हैं, सविलास सुरत के
अन्त में थके प्रिय के पणव को जांघों के बीच दबाकर सो गई है । अन्योक्ति के
कैसे सजीव चित्रण हैं ।
( ३१ )
श्रृंगार के उद्दीपन के लिए नारी-सौन्दर्य एक महत्त्वपूर्ण अङ्ग है। क्योंकि
रस के विभावादि समस्त अवयवों का ही साधारणीकरण होता है और विभा-
वादि के साधारणीकरण के फलस्वरूप ही स्थायी का साधारणीकरण होता
है, जिसमें सहृदय की चेतना व्यक्ति-संसर्गों से मुक्त हो जाती है। इस निर्मुक्ति
के विभाव पक्ष में नारी-सौन्दर्य का वर्णन अश्वघोष के काव्य में कई स्थलों पर
आकर्षक रूप से वर्णित है। सौन्दरनन्द के दशम सर्ग में अप्सराओं का वर्णन
इसी शृङ्गारिक कोटि का है। एक दृश्य द्रष्टव्य है—
'तासां जगुर्धीरमुदात्तमन्याः पद्मानि काश्चिल्ललितं बभञ्जुः ।
अन्योन्यहर्षान्निनृतुस्तथान्याश्चित्राङ्गहाराः स्तनभिन्नहाराः ॥'
—सौ० न० १०।३७
कुछ ने लीलापूर्वक कमल के फूल तोड़े और कुछ ने धैर्यपूर्वक उदात्त गीत
गाये । पारस्परिक आनन्द में डूबे कुछ ने नृत्य किया । कुछ ने अनेक हाव-भाव
प्रकट किये, नृत्य करते समय उनके कठोर स्तनों के कारण हार टूट-टूट कर
गिर गये । कितना उदात्त शृंगार है ?
वस्तुतः कल्पना जितनी स्फीत होगी, वर्णन उतना ही स्पष्ट होगा । कल्पना,
अनुभूति और अभिव्यक्ति—ये तीनों ही गुण इस प्रतिभाशाली संन्यासी वरेण्य
कवि में उपस्थित हैं—
'दरीचरीणामतिसुन्दरीणां मनोहरश्रोणिकुचोदरीणाम् ।
वृन्दानि रेजुर्दिशि किन्नरीणां पुष्पोत्कचानामिव वल्लरीणाम् ॥'
—सौ० न० १०।१३
हिमालय की तलहटियों में विचरण करती किन्नरियों का कितना अनुभूत
और सरस सौन्दर्य वर्णन है ? ये सुन्दर किन्नरियां, जिनके नितम्ब, स्तन और
उदर मनोहर थे, वहाँ हर दिशाओं में ऐसे शोभायमान हो रही थीं जैसे फूलों
से भरी लताएँ हों । सौन्दरनन्द एवं बुद्धचरित दोनों ही महाकाव्यों के सौन्दर्य
वर्णन में अश्वघोष ने पर्याप्त अलङ्कृत शैली का प्रयोग किया है, किन्तु उनकी
अप्रस्तुत योजना स्वाभाविक है, दुरारूढ़ नहीं—
'कासाञ्चिदासां वदनानि रेजुर्वनान्तरेभ्यश्चलकुण्डलानि ।
व्याविद्धपर्णेभ्य इवाकरेभ्यः पद्मानि कारण्डविघट्टितानि ॥'
—सौ० न० १०।३८
इनमें से कुछ अप्सराओं के चंचल कुण्डल वाले मुख वन के बीच इसी
तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे घने पत्तों वाले तालाबों के बीच हंसों के द्वारा
हिलाये गये कमल हों ।
वैसे अश्वघोष ने सुन्दरी के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त सरलता के साथ
बड़े ही प्रभावपूर्ण ढंग से किया है । आदर्श अनुराग के चित्रों में तो इसने
सजीवता ही उत्पन्न कर दी है ।
( ३२ )
शृङ्गार के बाद अश्वघोष का दूसरा कोमल रस है 'करुण'। करुणरस
की साक्षात् प्रतिकृति उपस्थित करने में अश्वघोष सिद्धहस्त कवि हैं। बुद्ध-
चरित का अष्टम सर्ग तथा सौन्दरनन्द का षष्ठ सर्ग करुणरस से आप्लावित
है। बुद्ध को अकेले वन में छोड़कर जब छन्दक खाली घोड़े के साथ लौटता
है तो सम्पूर्ण कपिलवस्तु दयनीय करुणरस के प्रवाह में मानो डूब जाता है।
सिद्धार्थ के माता-पिता का विलाप तथा यशोधरा का आर्तनाद भला किस
सहृदय के हृदय को हिला नहीं देता। अश्वघोष ने आस-पास के करुण
वातावरण को चित्रित कर करुणा की तीव्रता को और अधिक बढ़ा दिया है।
कपोतपालिका रूपी भुजाएँ फटकाती हुई; बैठे हुए कबूतरों के चिल्लाने की
दीर्घ श्वास वाली ये पंक्तियाँ सिद्धार्थ से वियुक्त होने के कारण दुःखी होकर
अन्तःपुरिकाओं के साथ मानो अत्यधिक रो रही हैं। यहाँ वस्तूप्रेक्षा,
सहोक्ति तथा रूपक केवल आलंकारिक चमत्कार न होकर करुण के उपयुक्त
वातावरण की सृष्टि कर अन्तःपुरिकाओं की करुणदशा का चित्र और कितना
अधिक मार्मिक बना दिया है—
'इमांश्च विक्षिप्तविरङ्गबाहवः प्रसक्तपारावतदीर्घनिःस्वनाः ।
विनाकृतास्तेन महावरोधनैर्भृशं रुदन्तीव विमानपङ्क्तयः ॥'
—बु० च० ८।३७
ठीक इसी तरह का मार्मिक-चित्रण सौन्दरनन्द का भी है। जहाँ बाज के
द्वारा घायल चक्रवाक के कारण तड़पती चकई की तरह सुन्दरी अत्यन्त
विलाप करती है और महल में टिके, चंचल कण्ठ वाले कबूतर मानो उसकी
स्पर्द्धा करते हुए कूजन कर रहे हों—
सा चक्रवाकीव भृशं चुकूज श्येनाग्रपक्षक्षतचक्रवाकाः ।
विस्पर्द्धमानेव विमानसंस्थैः, पारावतैः कूजनलोलकण्ठैः ॥'
—सौ० न० ६।३०
दोनों चित्रों में कितनी समता है? इससे यह प्रमाणित होता है कि
अश्वघोष का करुणरस सरस है तथा व्यंजनावृत्ति पर आधारित है।
अश्वघोष ने अपने दोनों महाकाव्यों में 'मारविजय' में रूपक का आश्रय
लेकर वीररस का प्रयोग किया है। साम्यविवक्षा की दृष्टि से ही यहाँ वीर
और शान्त दोनों ही रसों का सामञ्जस्य उपस्थित किया गया है। ये दोनों
रस तो इन काव्यों में इस तरह घुल-मिल गये हैं कि इनके बिना इस महा-
काव्य की समीक्षा का एक पग भी संचारण असंभव है। विदेश में कल्पना को
काव्य का एक आवश्यक अंग माना गया है और हमारे यहाँ यह एक उपकरण
है। एडिसन ने इस प्रक्रिया को 'Appeal to the imagination' संस्कृत-
साहित्य की ध्वनि-विषयक आत्मा भी तो कल्पना पर ही आश्रित है। इसी
( ३३ )
ध्वन्यात्मक स्थिति का प्रयोग अश्वघोष के सिद्धार्थ नन्द ने 'मार' की सेना को
पराजित करने में किया है। इसका एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा—
'ततः स बोध्यङ्गशितात्तशस्त्रः सम्यक्प्रधानोत्तमवाहनस्थः ।
मार्गाङ्गमातङ्गवता बलेन शनैः शनैः क्लेशचमूं जगाहे ॥'
—सौ० न० १७।२४
यहाँ कवि का प्रधान लक्ष्य शान्तरस ही है, वीररस नहीं। शान्तरस
के विभाव के रूप में संसार की दुःखमयता तथा नारी-सौन्दर्य की बीभत्सता
का वर्णन जो इनके काव्य में हुआ है, वह बड़ा तीव्र है—
'मलपङ्कधरा दिगम्बरा प्रकृतिस्थैर्नखदन्तरोमभिः ।
यदि सा तव सुन्दरी भवेन्नियतं तेऽद्य न सुन्दरी भवेत् ॥
स्रवतीमशुचिं स्पृशेच्च कः सघृणो जर्जरभाण्डवत् स्त्रियम् ।
यदि केवलया त्वचावृता न भवेन्मक्षिकपत्रमात्रया ॥'
— सौ० न० ८।५१-५२
यदि वह सुन्दरी मलरूपी कीचड़ से युक्त और विवस्त्र हो जाए और
उसके नख, दाँत और रोम स्वाभाविक अवस्था में ही आ जाय तो भला कैसी
लगेगी ? इतना ही नहीं, कौन ऐसा घृणित व्यक्ति है, जो टूटे-फूटे बर्तन की तरह
झरती औरत को छू भी सकेगा, अगर मक्खी की पाँख जैसी चमड़ी से वह
ढँकी न हो।
इसी प्रकार अश्वघोष का प्रकृति-वर्णन भी अपने ढंग का ही है। इनके
प्रकृति-चित्रण के अनेक स्थल है। इसके लिए 'बुद्धचरित' का तृतीय और
सप्तम सर्ग तथा सौन्दरनन्द का सप्तम और दशम सर्ग हैं। यहाँ कवि की
निरीक्षण की सूक्ष्मता, नवीनता, हृदय की सरलता और कल्पना की
कमनीयता पायी जाती है। अश्वघोष ने प्रकृति को मूक, चेतनाहीन अथवा
निष्प्राण न मानकर उसमें यत्र-तत्र जीवन-ज्योति जगाने की चेष्टा की है।
फलतः उसमें भी सुख या दुःख की संवेदनशीलता की अनुभूति पाठकों को
होती है। अन्तःप्रकृति और बाह्यप्रकृति की रुचिर सामञ्जस्यपूर्ण उद्भावना
इन्होंने अपने महाकाव्यों में करने की चेष्टा तो की है, परन्तु उसमें इनका मन
रमा नहीं है। सौन्दरनन्द के सप्तम-सर्ग की प्रकृति प्रिया-विरही नन्द के लिए
'उद्दीपन का काम करती हैं—
'स्थितः स दीनः सहकारवीथ्यामालीनसम्मूर्च्छितषट्पदायाम् ।
भृशं जजृम्भे युगदीर्घबाहुर्ध्यात्वा प्रियां चापमिवाचकर्ष ॥'
—सौ० न० ७।३
लगता है वाल्मीकि या कालिदास के प्रकृति-वर्णन के प्रति इस कवि का मोह या
आसक्ति नहीं है। संभवतः ऐसे स्थलों में भिक्षु अश्वघोष के लिए प्रकृति भी
( ३४ )
विकृति का कारण बन गई है। कालिदास के काव्यों में प्रकृति का सर्वाङ्गपूर्ण
वर्णन हुआ है। भवभूति का प्रकृति-वर्णन भी अद्वितीय है। इनका प्रकृति-वर्णन
संश्लिष्ट एवं चित्रोपम है। ये प्रकृति के कोमल तथा कठोर दोनों रूपों के
वर्णन में सिद्धहस्त हैं। इन्होंने प्रकृति का वर्णन आलम्बन के रूप में किया
है। कालिदास का प्रकृति-चित्रण सप्राण सजीव एवं मानवीयकृत है। यदि
कालिदास की प्रकृति का वर्णन अनलंकृत है, तो भवभूति की प्रकृति अनाविल
नैसर्गिक-सौन्दर्य के साथ अलंकार की अनावश्यक अलंकृति से बचती है।
फिर भी प्रकृतिवर्णन प्रभावोत्पादक है। कालिदास और भवभूति के प्रकृति-
वर्णन के सामने सौन्दरनन्द या बुद्धचरित का वर्णन नीरस एवं चलता-सा
दिखलायी पड़ता है।
अश्वघोष का प्रमुख ध्यान अपने प्रतिपाद्य वर्ण्य-वस्तु की ओर अधिक है।
शैली, अलङ्कार, या छन्दोविधान की अभिव्यञ्जनाप्रणाली आनुषङ्गिक है।
यह बात अलग है कि वर्ण्य-वस्तु के साथ ये प्रयोग कहीं-कही अत्यधिक प्रभा-
वोत्पादक या सटीक बन गया है। यह अनायास है, सायास नहीं। कारण
स्पष्ट है, अश्वघोष का दृष्टिकोण कलावादी नहीं है। इनके काव्य में
अश्वघोष का त्रिविध व्यक्तित्व का त्रिकोणात्मक संघर्ष सर्वत्र परिप्रेक्ष्य में है।
कहीं इनकी दार्शनिकता इनके कवित्व पर हावी है, तो कभी इनकी धर्मोप-
देशिकता इनके दर्शन पर भारी है। अतः इनका वर्ण्य-विषय इनकी विधा-
भिव्यञ्जना के बीच असामञ्जस्य जैसा लगता है। इन सभी तथ्यों के
बावजूद इनमें कुछ ऐसी विशेषता है, जो अनायास पाठकों को अपनी ओर
आकृष्ट कर लेती है। कलात्मक विशेषता नहीं रहने के बावजूद अश्वघोष
की काव्यप्रतिभा प्रशंसनीय है।
अश्वघोष की शैली पर जब हम विचार करते हैं तब हमें यह स्पष्ट प्रतीत
होता है कि कवि ने सर्वत्र सुगम भाषा और वैदर्भीरीति को ही प्रश्रय दिया है।
इनकी वर्ण्य-वस्तु की भाषा सुगम एवं सरल है। इनकी शैली परिष्कृत एवं
परिमार्जित है। इनका शब्द-विन्यास सरस, शोभासम्पन्न, विशद और अधिक
अभिव्यञ्जक है। आकर्षक, सरस, प्रवाहमय काव्य के माध्यम से जन-जन तक
बौद्धधर्म का प्रचार-प्रसार इनके काव्य का प्रमुख लक्ष्य था। यही कारण है
कि इनकी शैली प्रसादमयी सरलता के साथ माधुर्य उत्पन्न करती है। इन्होंने
अपने काव्यों में सामासिक शब्दों का प्रयोग तो किया है, परन्तु सदैव दीर्घ और
क्लिष्ट सामासिक पद-विन्यास से बचते रहे हैं। इस दृष्टि से इनकी समग्र
रचनाएँ कृत्रिमता तथा अस्वाभाविकता से सर्वथा दूर हैं। अश्वघोष ने तो
गम्भीर दार्शनिक विचारों को भी अत्यन्त सरल भाषा में प्रकट किया है।
निम्न श्लोक उदाहरणार्थ दर्शनीय है—
( ३५ )
‘दीपो यथा निवॄतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्।
दिशं न काञ्चिद्विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥’
—सौ० न० १६।२८
‘जिस तरह निर्वाण को प्राप्त हुआ दीपक न पृथ्वी पर रहता है न आकाश
में जाता है, न किसी दिशा या विदिशा में, किन्तु तेल समाप्त हो जाने पर
केवल शान्ति को प्राप्त होता है।’ इस तरह इनकी भाषा में सरलता के
साथ सुबोधता भी मिलती है। कुछ विद्वानों की राय में तो अश्वघोष की
उपमाएँ कालिदास से भी बढ़कर हैं। इस कथ्य के समर्थन में उन्होंने दोनों
की उपमाओं की निम्न-लिखित तुलना की है—
कालिदास ने कुमारसंभव में पार्वती के लिए लिखा है—
‘मार्गाचल व्यतिकराकुलितेव सिन्धुः।
शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥’
राह में आये पहाड़ से क्षुब्ध नदी की तरह पार्वती न तो आगे बढ़ पाती थीं
और न ठहर ही पाती थीं। अब ऐसे ही भाव को व्यक्त करने वाली अश्वघोष
की एक उपमा द्रष्टव्य है—
'सोऽनिश्चयान्नापि ययौ न तस्थौ ।
तरंस्तरङ्गेष्विव राजहंसः ॥'
—सौन्दरनन्द ४।४२
तरङ्गों में तैरते हुए राजहंस की तरह वह अनिश्चय के कारण न तो गया
ही और न ठहरा ही। कुछ आलोचकों ने तरंगों में तैरते हुए राजहंस का निश्चय
संदिग्ध माना है। अतः कालिदास की अपेक्षा अश्वघोष की उत्कृष्टता इससे
सिद्ध नहीं होती। एक अन्य तुलना भी इस दृष्टि से देखना अपेक्षित है।
रघुवंश में राजा दिलीप के लिए प्रयुक्त कालिदास की निम्नलिखित उपमा—
‘व्यूढोरस्को, वृषकन्धः शालप्रांशुर्महाभुजः ।’
—रघु० १।१२
इसी तरह नन्द का वर्णन करते हुए अश्वघोष की एक तुलना—
‘दीर्घबाहुर्महावक्षः सिंहांसो वृषभेक्षणः’ ।
—सौ० न० २।५८
इस सन्दर्भ में श्रीचट्टोपाध्याय का तो मत यहाँ तक है कि—‘कालिदास ने
यहाँ दिलीप की आंखों की ओर आंख उठाकर देखा ही नहीं, वह तो उसके
कंधों को सांढ़ के कन्धे की तरह ही देख रहा है। अश्वघोष ने कुछ भेद रखना
चाहा और अपना भेद स्वयं खोल डाला।’ इस संदर्भ में विशेष अध्ययन के
लिए द्रष्टव्य है—
‘Date of Kalidas’—Kshetresha Chattopadhyaya ( Reprint
form the Allh, University Studies Vol. II 1926 p. 82–106 )
( ३६ )
इन सारी आलोचना-प्रत्यालोचनाओं के बावजूद इतना तो असंदिग्ध रूप
से कहा जा सकता है कि अश्वघोष ने अलंकार के लिए अलंकारों का प्रयोग
नहीं किया है। यह बात अलग है कि उनके काव्यों में सभी प्रमुख साधर्म्य-
मूलक अलंकारों का सुन्दर प्रयोग देखने को मिलता है। एक उपमा—
'अथो नतं तस्य मुखं सबाष्पं प्रवास्यमानेषु शिरोरुहेषु ।
वक्राग्रनालं नलिनं तडागे वर्षोदकक्लिन्नमिवावभासे ।।'
—सौ० न० ५।५२
इसी तरह रूपक का एक उदाहरण जिसमें दोषों में अगाध-सागर का, छल-
कपट में जल का और आधियों में जन्तु का आरोप अत्याकर्षक है—
'स हि दोषसागरमगाधमुपधिजलमाधिजन्तुकम् ।
क्रोधमदभयतरङ्गचञ्चलं प्रततार लोकमपि च व्यतारयत् ॥'
—सौ० न० ३।१४
इसी प्रकार से संभावनाार्थक उत्प्रेक्षा का एक मनोहर उदाहरण बुद्धचरित
के अष्टमसर्ग का ३७वाँ श्लोक है। इसी तरह व्यतिरेकालङ्कार का एक सटीक
उदाहरण—
'प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुजङ्गमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः ।
क्वचिच्च कश्चिच्च दशन्ति पन्नगाः, सदा च सर्वं च तुदन्ति धातवः ।।'
—सौ० न० ९।१३
यद्यपि अश्वघोष के लिए न अलङ्कार अनिवार्य है और न इनके काव्य। वह
साध्यरूप मे ही है। फिर भी अपने अन्तर्निष्ठ चमत्कार-सौष्ठव के विश्लेषण
में अपने कथन को प्रभावोत्पादक बनाने के क्रम में, सौष्ठव के विश्लेषण क्रम में
ही इन्होंने साधर्म्यमूलक अलंकारों का प्रयोग किया है। ये अलंकार उनकी
अनुभूति-साधन को उत्कर्ष प्रदान करते हैं। इनके अतिरिक्त अनुप्रास तथा
यमक जैसे शब्दालङ्कारों का प्रयोग भी इनके भावों को व्यक्त करने में प्रेरणा-
रूप सिद्ध हुए है। इनके एक-दो उदाहरण ही पर्याप्त होंगे। अनुप्रास का
उदाहरण—
'चलत्कदम्बे हिमवन्नितम्बे तरौ प्रलम्बे चमरो ललम्बे ।'
—सौ० न० १०।११
इसी प्रकार यमक का प्रयोग—
'प्रयान्ति मन्त्रैः प्रशमं भुजङ्गमा न मन्त्रसाध्यास्तु भवन्ति धातवः ।
क्वचिच्च कश्चिच्च दशन्ति पन्नगाः सदा च सर्वञ्च तुदन्ति धातवः ॥'
—सौ० न० ९।१३
इन अलंकारों के प्रयोग से इनकी कविता में तो विविधता आई ही है,
साथ ही इनका अभिनवप्रयोग भी कवि की प्रतिभा का ही द्योतक है।
( ३७ )
वैसे अश्वघोष ने सुन्दरी के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त सरलता के साथ
बड़ा ही प्रभावपूर्ण किया है। आदर्श अनुराग के चित्रों में तो इसने सजीवता
ही उत्पन्न कर दी है। अश्वघोष एक विशिष्ट कोटि के वैयाकरण थे। इनके
महाकाव्यों में ऐसे अनेक स्थल हैं, जहाँ इन्होंने अप्रचलित अपाणिनीय शब्दों
का प्रयोग किया है। जैसे—उन्होंने 'अस्' धातु का प्रयोग उपमा द्योतक के रूप
में तीनों कालों में निष्पन्न 'अस्ति' का प्रयोग निपात के रूप में किया है—
'त्रिषु कालेषु सर्वेषु निपातोऽस्तिरिव स्मृतः ।'
—सौ० न० १२।१०
सौन्दरनन्द के द्वितीय सर्ग के निम्नलिखित श्लोक में 'लुङ्' के प्रयोगों में
पाण्डित्य प्रदर्शन करते हुए 'मां' 'मि' और 'मी'—तीनों धातुओं के कर्मणि
प्रयोग में सिद्ध होने वाले धातुरूपों का प्रयोग हुआ है—
अश्रान्तः ••• ••• ••• ••• यज्ञभूमिममीमपत् ।
••• ••• ••• ••• निरुद्विग्नानमीमपत् ॥
••• ••• ••• ••• ••• सोमममीमपत् ।
••• ••• ••• ••• •••सैन्यममीमपत् ॥
—सौन्दरनन्द २।३५-३६
इसी तरह 'दा' धातु का प्रयोग द्वितीय सर्ग के ३२ से ३४ श्लोक तक
अपाणिनीय है। इसी तरह कुछ संज्ञावाचक शब्द है, जिनका लिङ्ग अव्यवस्थित
है। जैसे—
'सूर्यरश्मिभिरक्लिष्टं पुष्पवर्षं पतात खात् ।' —सौ० न० २।५३
'सन्ध्याय मित्रं' —सौ० न० १७।५६
'विभूषणश्रीन्निहिते प्रकोष्ठे' —सौ० न० ६।२७
इसी तरह इनके कुछ उपमान भी अटपटे हैं। जैसे—
'सिंहांसोद्वृषभेक्षणः' कंधे सिंह की तरह और आंखे बैल की तरह, यहाँ
आँखों की तुलना बैल की आँखों से अनुचित लगती है।
इसी तरह छन्दों के प्रयोग में भी अश्वघोष सिद्धहस्त हैं। 'उद्गाता'
जैसे कम प्रयोग में आनेवाले छन्द का भी बड़ी सफलता के साथ प्रयोग करके
दिखलाया है। छन्द काव्य में संगीतात्मकता उत्पन्न करते हैं। बिना संगीत के
काव्य में सम्प्रेषणीयता उत्पन्न नहीं हो पाती। संगीत और काव्य का अत्यन्त
घनिष्ठ सम्बन्ध है। भावहीन संगीत और छन्द-विहीन काव्य शुष्क रचना है।
इसीलिए संगीत और साहित्य दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं—
'सङ्गीतमथ साहित्यं सरस्वत्याः स्तनद्वयम् ।
एकमापातमधुरमन्यदालोचनामृतम् ॥'
( ३८ )
छन्द प्रयोग में ही कवि की योग्यता परखी जाती है। यह एक ऐसी कसौटी
है, जहाँ कवि के भाषाज्ञान की परीक्षा होती है। कविता में भाषा, रीति,
गुण, अलंकार और छन्द का सहयोग भावों को उत्कर्ष पर पहुँचाता है। इनके
सहयोग से काव्य स्वयं उत्कृष्ट बन जाते हैं। इस दृष्टि से अश्वघोष की
शैली विषयानुकूल और सर्वत्र सशक्त है। सौन्दरनन्द के शब्द-शब्द में कवि-
कौशल का उत्कृष्टतम रूप झलकता है। शब्दों का सुन्दर चयन और उनका
विन्यास अश्वघोष के प्रकाण्ड पाण्डित्य का प्रदर्शन करता है। इस दृष्टि से
काव्य और भावपक्ष दोनों ही सुन्दर हैं। वैसे तो इन्होंने कुल सोलह तरह के
छन्दों का प्रयोग सफलतापूर्वक सौन्दरनन्द में किया है, किन्तु सुवदना, शिख-
रिणी, शार्दूलविक्रीड़ित, प्रहर्षिणी, रुचिरा, उद्गता, सुन्दरी, मालिनी, वसन्त-
तिलका, वंशस्थ, उपजाति, पुष्पिताग्रा, अनुष्टुप् आदि छन्दों का भी प्रयोग
किया है। आदिकवि वाल्मीकि की तरह इन्हें भी अनुष्टुप् के प्रति आसक्ति है।
संगीत की दृष्टि से प्रहर्षिणी और रुचिरा का प्रयोग अधिक सफल हुआ है।
संस्कृत महाकाव्यों में अश्वघोष का स्थान
संस्कृत महाकाव्यों की परम्परा में महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि और
उनकी रामायण को प्रथम महाकाव्य कहा जाता है। अश्वघोष को इस काव्य-
परम्परा की पहली श्रेणी में तो हम नहीं रख सकते, क्योंकि इनके एक ओर
रसवादी कवि कालिदास हैं तो दूसरी ओर कलावादी माघ और हर्ष जैसे महा-
कवि हैं। फिर भी इनमें कुछ विशिष्टता है, जिसका संकेत हम पूर्व ही कर चुके
हैं, जो इन्हें महत्त्वपूर्ण बना दिया है। अश्वघोष में ही हमें सर्वप्रथम कुछ ऐसी
काव्य-रूढ़ियाँ मिलती है, जिनका प्रयोग कालिदास से श्रीहर्ष तक मिलता है।
इनकी शैली में वाल्मीकीय शैली का उदात्त उत्कर्ष मिलता है। पाश्चात्य
कवि मिल्टन ने कविता को सादा, प्रत्यक्षमूलक और रागात्मक कहा है—
'Poetry should be simple, senseous and passionate'
अश्वघोष की कविता में प्रायः इन तीनों गुणों का समावेश है। इनकी
कविता में माधुर्य का मधुर निवेश, प्रसाद की स्निग्धता, पदों की सरलता,
वैराग्य की शीतलता, दर्शन का सौष्ठव, यत्र-तत्र अलंकारों और छन्दों का उप-
युक्त प्रयोग इन्हें कुछ पृथक् महत्त्व देते हैं। ये गुण ही इन्हें संस्कृत-महाकाव्यों
का प्रतिनिधि कवि मान लेने को विवश कर देते हैं। अश्वघोष के दोनों महा-
काव्यों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सफल चित्रण हुआ है। अपने
उदात्त एवं उन्नत हृदय को भिक्षु-कवि अश्वघोष ने संसार की असारता और
मानव-जीवन के शाश्वत मूल्यों के बीच रखकर जो संवेदना, जैसी अनुभूति
आपने प्राप्त की है, उसकी अभिव्यंजना और स्पष्ट अभिव्यक्ति इनके दोनों
महाकाव्यों में दर्शनीय है। आपकी कविता दुःखपूर्ण मानव-जीवन को दुःख से
( ३९ )
छुटकारा दिलाने के लिए हृदय के तड़पते उद्गारों की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
परोपकार की भावना से ओत-प्रोत आपके महाकाव्य इसीलिए लोकप्रिय हैं।
इन्होंने अपने दोनों ही महाकाव्यों में कुछ ऐसी रूढ़ियों का प्रयोग किया,
जिनका अनुकरण परवर्त्ती कवि कालिदास से लेकर श्रीहर्ष तक ने किया है।
बुद्धचरित के तृतीय सर्ग के १२ से २४ श्लोक तक इन्होंने उन लालायित
ललनाओं का वर्णन किया है, जो वन-विहार के लिए निकले बुद्ध-दर्शन के
लिए व्याकुल हैं। हो सकता है यह उद्भावना अश्वघोष की मौलिक न हो,
परन्तु पाठकों को इनके प्रथम दर्शन तो यहीं होते हैं। इस परम्परा का अक्षुण्ण
अनुकरण या निर्वाह महाकवि कालिदास ने भी रघुवंश एवं कुमारसंभव के
सप्तम सर्ग में किया है। इस परम्परा का अनुसरण माघ के तेरहवें सर्ग में और
श्रीहर्ष-रचित नैषध के सोलहवें सर्ग में अक्षुण्ण रूप में मिलता है। दूसरी रूढि
अश्वघोष की रूखड़ी परन्तु सप्राण प्रकृति-वर्णन की है, जहां वन के पेड़-पौधे
भी जीवन्त प्राणी की तरह व्यवहार करते हैं—
‘हारान् मणीनुत्तमकुण्डलानि केयूरवर्याण्यथ नूपुराणि।
एवंविधान्याभरणानि यत्र स्वर्गानुरूपाणि फलन्ति वृक्षाः ॥’
—सौ० न० १०।२३
वन के सारे वृक्ष हारों, मणियों, उत्तम कुण्डलों, उत्तम केयूरों, नूपुरों
और स्वर्ग के अनुरूप ऐसे ही आभूषणों के फल देते हैं। इसी तरह इसी
सर्ग के—
‘नानाविरागाण्यथ पाण्डराणि सुवर्णभक्तिव्यवभासितानि ।
अतान्तवान्येकघनानि यत्र सूक्ष्माणि वासांसि फलन्ति वृक्षाः ॥’
—सौ० न० १०।२२
उस वन के वृक्ष अनेक रंगों के, सफेद रंग के, सुवर्ण-रेखाओं से उज्ज्वल,
पत्ते के समान तन्तुरहित घने परन्तु पतले कपड़े फलते हैं। कहने का तात्पर्य यह
है कि वृक्षों के द्वारा वस्त्राभरणों को देने की परम्परा अश्वघोष ने संचालित
की, उसका परिष्कृत एवं प्रस्फुट स्वरूप कालिदासकृत अभिज्ञानशाकुन्तलम् के
चतुर्थ अंक में दृष्टिगोचर होता है। शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वन के
लता-पादपों ने उन्हें इन्हीं उपहारों से लाद दिया है।
मनुष्य तथा प्रकृति—दोनों का मंजुल सम्पर्क तथा अद्भुत एकरसता
की परम्परा कायम कर अश्वघोष ने प्रकृति के भीतर स्फुरित होने वाले हृदय
को पहचाना है। अश्वघोष ने अपने समस्त चित्रणों द्वारा मानव-जीवन के
साथ आदर्श की स्थापना ही नहीं की है प्रत्युत् दुःखमय इस संसार-चक्र से
मुक्ति के उपाय का भी संधान किया है। संस्कृत-साहित्य के महाकाव्य के
पाठकों के लिए अश्वघोष का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि वे एक महत्त्व-
र्ण कवि है, प्रत्युत् इस परम्परा में उनका यह भी महत्त्व है कि उनके पर-
( ४० )
वर्ती महिमाशाली कवियों को ठीक से समझने के लिए अश्वघोष को ठीक से
समझना आवश्यक है ।
अश्वघोष के महाकाव्यों का एकमात्र संदेश है कि त्याग, तपस्या, जनन-
मरण जन्य दुःख से मुक्ति का अन्वेषण ब्रह्मचर्य रहकर, विषयोपभोग त्यागकर
तपोमय जीवन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । क्षुद्र-स्वार्थपूर्ण जीवन का
उद्धार त्याग से होता है । मनुष्य की सच्ची उन्नति संयम-नियम से ही संभव
है । संसार में जन्म लेकर वासना के हाथों का खिलौना बनकर जीना ही मानव
जीवन की सार्थकता नहीं है, प्रत्युत् आत्मोपलब्धि से ही जन्म लेने की सार्थ-
कता सिद्ध होती है, उसी से निःश्रेयस् की प्राप्ति होती है । मानव-जीवन के
इस महत्त्वपूर्ण संदेश के लिए भी संस्कृत महाकाव्यों की परम्परा में महाकवि
अश्वघोष अविस्मरणीय हैं और रहेंगे ।
संक्षिप्त कथावस्तु
प्रथम सर्ग
प्रथमसर्ग में कपिलवस्तु के वर्णन-क्रम में शाक्यों का वर्णन है। प्रथम
तीन सर्गों में शाक्यों की वंश-परम्परा, सिद्धार्थ-जन्म, निष्क्रमण, बुद्धत्व की
प्राप्ति में बुद्धचरित के पूर्वार्ध की कथा का ही संक्षिप्त रूप परिलक्षित होता
है। परम धार्मिक, तपःपूत, सिद्धपुरुष कपिल गौतम एक मुनि थे। उनका
आश्रम हिमाचल में था। एक बार इक्ष्वाकुवंश के दो राजकुमार घूमते-
फिरते वहाँ पहुँचे। दोनों ही भाई अपने पिता के सत्य की रक्षा के लिए
वनाञ्चल में घूम रहे थे। बड़ा भाई जितना ही संयमित था, छोटा उतना ही
उद्दण्ड। कपिलमुनि का आश्रम उनके मन को भा गया। वे दोनों मुनि
कपिल गौतम के शिष्य बन गये। कपिल गौतम का आश्रम शाकवन में था।
कपिल गौतम के शिष्यत्व के कारण गौतमगोत्रीय तथा शाकवन में रहने के
कारण शाक्य-मूलक विख्यात हुए। गुरु ने शिष्यों को एक समृद्ध नगर बसाने
का आदेश दिया। मुनि के स्वर्गारोहण के पश्चात् राजकुमारों ने वहाँ गुरु के
नाम पर 'कपिलवास्तु' नामक एक समृद्ध नगर बसाया।
द्वितीय सर्ग
कपिलवास्तु के प्रथम नृपति शुद्धोदन हुए। अपनी शासन-व्यवस्था और
प्रजावत्सलता के कारण ये बड़े ही लोकप्रिय प्रशासक बने। रक्षा-व्यवस्था
के कारण प्रजा समृद्ध एवं सुखी थी। इनके सुशासन में विद्वान् सम्मानित
थे। सामन्तगण भय से नहीं, अपितु श्रद्धा और प्रेम से उनकी आज्ञा का पालन
करते थे। राजा शुद्धोदन नीतिज्ञ, प्रजापालक तथा एक राजा के कर्त्तव्य
से पूर्णतया परिचित थे। प्रजा को प्रसन्न करने के लिए सतत प्रयत्नशील थे।
राष्ट्र धन-धान्य से समृद्ध था। उसके उत्तम व्यवहारों से प्रसन्न होकर लोग प्राण
देकर भी उसका हित चाहते थे। राज्य में कभी अनुचित कर नहीं लगाया
गया। इन्होंने आपद्ग्रस्तजनों को अपनाया, सुजनतावश शत्रुओं के गुणों की भी
सराहना की। अपनी प्रज्ञा से सभी को प्रसन्न किया। धर्म-जिज्ञासुओं ने इस
धार्मिक राजा को निष्ठा और श्रद्धा से सम्मानित किया। तृषित देवताओं ने
इसके घर अवतार लेना चाहा।
एक रात राजमहिषी माया ने एक विचित्र स्वप्न देखा। तदनुसार छः
दाँत वाले एक श्वेत गजराज ने उसके गर्भ में प्रवेश किया। इसे स्वप्नविदों ने
यशस्वी राजकुमार के जन्म की सूचना बतलाया। शुभलग्न एवं मंगलकारी
वातावरण में सिद्धार्थ ने गौतम के रूप में अवतार लिया। शुद्धोदन की छोटी
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रानी से नन्द ने जन्मग्रहण किया। यह अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक था।
रूपवान् होने के कारण इसका नाम सुन्दर पड़ा। दोनों राजकुमारों का विधिवत्
उपनयनादि संस्कार यथावसर हुआ। गौतम बुद्ध के विमातृज कामासक्त कुमार
था। सिद्धार्थ विषयोपभोग से विरत थे। बूढे, रोगी और एक शव को देखकर
सिद्धार्थ का मन अत्यन्त उद्वेलित हो उठा। एक रात प्रसूतिगृह में अपनी पत्नी
यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़ कर मोक्षप्राप्ति के लिए महाभिनिष्क्रमण
किया।
तृतीय सर्ग
वन में सिद्धार्थ ने अनेक तपस्वियों और सन्तों के दर्शन किये। साधुओं
को विषयतृष्णा से कृपण पाया। सन्तों के रूप को स्थिर नहीं देखा। वहाँ
से वह लौट गया। मोक्षवादी अराड़ और उद्रक की उपासना की। इन्होंने
उसे भी तथ्यहीन ही समझा। अनिश्चित मन से पन्थों और शास्त्रों में कौन श्रेष्ठ
हैं? इस विचार को ही छोड़कर दुष्कर तप में मन लगाया। यहाँ भी उसका
मन नहीं रमा। मोक्ष चाहने वाला दार्शनिक संसार को काम का राज्य
समझता है। 'मार'-विजय के बाद ही वह परमशान्ति प्राप्त करता है। इसी-
लिए सिद्धार्थ कामविजय के लिए बद्धपरिकर हुए। गया में एक पीपल
वृक्ष के नीचे वे ध्यानमग्न हुए। मार-पराजय से देवगण प्रसन्न हुए। अवि-
नाशी परमार्थ को सिद्धार्थ ने पहचाना। सत्य, धैर्य, ज्ञान, समाधि, विनय
और नियम का लोगों को उन्होंने उपदेश दिया। काशी, गया और गिरिव्रज
( राजगिर ) में लोगों को उपदेश दिया। फिर अज्ञान के कारण विविध
मार्गों पर चलते पितृनगर के लोगों का अन्धकार दूर किया। दर्शनेच्छुक समा-
गत पिता को विनीत बनाने की इच्छा से सुगत आकाशगामी बन गये।
आनन्दविभोर प्रजा ने झुककर उन्हें सम्मानित किया।
चतुर्थ सर्ग
चतुर्थ सर्ग में नन्द तथा सुन्दरी के विहार का वर्णन है। नन्द एवं सुन्दरी
एक-दूसरे प्रति अनन्यासक्त हैं। वे दोनों एक-दूसरे के प्रति चकवा-चकई की
तरह समर्पित हैं। एक के बिना दूसरे को चैन नहीं है। एक दिन विहार करते
समय ही कोई दासी नन्द को आकर सूचना देती है कि भिक्षाटन के लिए
तथागत उसके दरवाजे पर आये थे, परन्तु भिक्षा नहीं मिलने के कारण लौट
गये। नन्द इस समाचार से दुःखी होकर क्षमा मांगने बुद्ध के पास जाना
चाहता है। जाने के लिए वह सुन्दरी से विदा लेता है। सुन्दरी उसे इस
शर्त पर जाने की अनुमति देती है कि उसके विशेषक अर्थात् चन्दन-पत्रावली के
सूखने के पहले ही वह लौट आये। वह मुड़-मुड़कर पत्नी को देखता हुआ
आगे बढ़ गया।