सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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शृङ्गार के बाद अश्वघोष का दूसरा कोमल रस है 'करुण'। करुणरस
की साक्षात् प्रतिकृति उपस्थित करने में अश्वघोष सिद्धहस्त कवि हैं। बुद्ध-
चरित का अष्टम सर्ग तथा सौन्दरनन्द का षष्ठ सर्ग करुणरस से आप्लावित
है। बुद्ध को अकेले वन में छोड़कर जब छन्दक खाली घोड़े के साथ लौटता
है तो सम्पूर्ण कपिलवस्तु दयनीय करुणरस के प्रवाह में मानो डूब जाता है।
सिद्धार्थ के माता-पिता का विलाप तथा यशोधरा का आर्तनाद भला किस
सहृदय के हृदय को हिला नहीं देता। अश्वघोष ने आस-पास के करुण
वातावरण को चित्रित कर करुणा की तीव्रता को और अधिक बढ़ा दिया है।
कपोतपालिका रूपी भुजाएँ फटकाती हुई; बैठे हुए कबूतरों के चिल्लाने की
दीर्घ श्वास वाली ये पंक्तियाँ सिद्धार्थ से वियुक्त होने के कारण दुःखी होकर
अन्तःपुरिकाओं के साथ मानो अत्यधिक रो रही हैं। यहाँ वस्तूप्रेक्षा,
सहोक्ति तथा रूपक केवल आलंकारिक चमत्कार न होकर करुण के उपयुक्त
वातावरण की सृष्टि कर अन्तःपुरिकाओं की करुणदशा का चित्र और कितना
अधिक मार्मिक बना दिया है—
'इमांश्च विक्षिप्तविरङ्गबाहवः प्रसक्तपारावतदीर्घनिःस्वनाः ।
विनाकृतास्तेन महावरोधनैर्भृशं रुदन्तीव विमानपङ्क्तयः ॥'
—बु० च० ८।३७
ठीक इसी तरह का मार्मिक-चित्रण सौन्दरनन्द का भी है। जहाँ बाज के
द्वारा घायल चक्रवाक के कारण तड़पती चकई की तरह सुन्दरी अत्यन्त
विलाप करती है और महल में टिके, चंचल कण्ठ वाले कबूतर मानो उसकी
स्पर्द्धा करते हुए कूजन कर रहे हों—
सा चक्रवाकीव भृशं चुकूज श्येनाग्रपक्षक्षतचक्रवाकाः ।
विस्पर्द्धमानेव विमानसंस्थैः, पारावतैः कूजनलोलकण्ठैः ॥'
—सौ० न० ६।३०
दोनों चित्रों में कितनी समता है? इससे यह प्रमाणित होता है कि
अश्वघोष का करुणरस सरस है तथा व्यंजनावृत्ति पर आधारित है।
अश्वघोष ने अपने दोनों महाकाव्यों में 'मारविजय' में रूपक का आश्रय
लेकर वीररस का प्रयोग किया है। साम्यविवक्षा की दृष्टि से ही यहाँ वीर
और शान्त दोनों ही रसों का सामञ्जस्य उपस्थित किया गया है। ये दोनों
रस तो इन काव्यों में इस तरह घुल-मिल गये हैं कि इनके बिना इस महा-
काव्य की समीक्षा का एक पग भी संचारण असंभव है। विदेश में कल्पना को
काव्य का एक आवश्यक अंग माना गया है और हमारे यहाँ यह एक उपकरण
है। एडिसन ने इस प्रक्रिया को 'Appeal to the imagination' संस्कृत-
साहित्य की ध्वनि-विषयक आत्मा भी तो कल्पना पर ही आश्रित है। इसी