सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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धारा फूट पड़ी है। कोरा शृंगार-वर्णन या चित्रमयता के लिए कहीं भी कथा
का प्रवाह रुका नहीं है। यहाँ अश्वघोष भारवि, माघ या श्रीहर्ष को बहुत पीछे
छोड़ जाते हैं। दार्शनिक स्थलों को छोड़कर-अश्वघोष का वस्तु-संविधान अधिक
स्वाभाविक, मनोरम, प्रवाहमय, सरस तथा प्रभावोत्पादक है। यहाँ अश्वघोष
कालिदास के साथ हाथ मिलाकर चलते नजर आते हैं। श्रीहर्ष की तरह न तो
अप्रासंगिक प्रकृति-वर्णन में ये उलझते हैं और न ही माघ की तरह चमत्कार
प्रदर्शन में। भट्टि की तरह व्याकरण के जटिल प्रयोगों के प्रदर्शन में भी इनकी
अभिरुचि नहीं है। ये अपने ढंग के निराले ही हैं।
तपःपूत आर्यभदन्त अश्वघोष ज्ञानी, भक्त और मूलतः शान्तरस के
कवि तो थे ही; लेकिन इसके अलावा श्रेष्ठसाधक, गणितज्ञ, शास्त्रवेत्ता, बौद्ध-
संगति-संशोधक और मँजे हुए आयुर्विज्ञानवेत्ता भी थे। इन सभी का स्पष्ट
स्वरूप इनकी कृतियों में देखने को मिलता है। बुद्धचरित, सौन्दरनन्द तथा
उपलब्ध अन्यापदेशी नाटक-खण्डों से भी यह प्रमाणित होता है कि ये शान्तरस
के कवि थे। दया, दान, सत्य, शौच और मृदुता इनके प्रमुख वर्ण्य विषय रहे
हैं। फलतः इन्होंने अपने दोनों ही महाकाव्यों में मुख्य रस के रूप में या
सहयोगी रस के रूप में या विरोधी रस के परिवेश में शान्तरस के अतिरिक्त
वीर, वीभत्स, करुण तथा शृंगार रस का निबन्धन बड़ी कुशलता एवं दक्षता
के साथ किया है। 'बुद्धचरित' के तृतीय, चतुर्थ और पंचम सर्ग में तथा
सौन्दरनन्द के चौथे और दसवें सर्ग में जो उदात्त शृंगार का वर्णन है; उसे
पढ़कर कोई यह सोच भी नहीं सकता कि यह कृति किसी बौद्ध संन्यासी की
है। अश्वघोष के कवि की परिनिष्ठित इस इमानदारी को कोई अस्वीकार नहीं
कर सकता। यह बात अलग है कि अपने चरितनायक बुद्ध की तरह इनका मन
भी शृङ्गार में अधिक नहीं रमता। फिर भी, इनके शृङ्गार की यह विशेषता है
कि वे नायिका की चेष्टा-वर्णन में उपमा को माध्यम के रूप में लेकर एक
ओर उनके दर्शन करते हैं, तो दूसरी ओर उनका गुण-वर्णन कर ये शान्त हो
जाते हैं। अपने शृङ्गार के भव्य एवं मर्यादित स्वरूप को इन्होंने बड़े संयत
एवं मूर्त्त रूप में ही व्यक्त किया है। इन्होंने नारी-सौन्दर्य को शान्त, वैराग्य-
शील एक भिक्षु की दृष्टि से नहीं देखा है। वस्तुस्थिति यह है कि इन्हें जहाँ
कहीं भी नारी के रूप-सौन्दर्य के वर्णन का अवसर मिला है, बाह्य-सौन्दर्य
वर्णन की अपेक्षा अन्तःसौन्दर्य के रहस्य का उद्घाटन करने में ही अत्यधिक
आत्मतोष का अनुभव करते हैं। नारी-सौन्दर्य की रुचिर अभिव्यक्ति में निरी-
क्षण की सूक्ष्मता, नवीनता, हृदय की सरलता और कल्पना की कमनीयता
सर्वत्र पायी जाती है। यद्यपि अश्वघोष स्वयं शान्त, विरक्त एक बौद्धभिक्षु
हैं, फिर भी उन्होंने इस नारी-सौन्दर्य को वैराग्यशील की दृष्टि से देखने की
अपेक्षा सरस लौकिक दृष्टि से ही देखा है। किन्तु जहाँ वे शान्तरस के प्रवाह
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