सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३ )
होना, इन तथ्यों का सत्यस्वरूप यही है । बौद्धदर्शन में इसी को 'मज्झिमा-
पटिपदा' अर्थात् 'मध्यम मार्ग' कहा गया है ।
पश्चाद्वर्त्ती नागार्जुन ने इसी विचार को आगे बढाया और माध्यमिक दर्शन
या शून्यता दर्शन की स्थापना की, जिसका पर्याप्त विकास नालन्दा विश्व-
विद्यालय में हुआ । मध्यमकारिका में नागार्जुन ने लिखा है—
'न सतो नाऽपि परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुतः ।
उत्पन्ना जातु विद्यन्ते भावाः क्वचन केचन ।।'
—नागार्जुन ।
मोक्षकामी दार्शनिक काम यानि मार को संसार का अधिपति समझता
है । अतः सर्वप्रथम उसे जीतकर शान्ति या परम शान्ति प्राप्त कर सकता है ।
यही कारण है कि वह काम को जीतने के लिए बद्धपरिकर रहता है । बुद्ध-
चरित का ग्यारहवां सर्ग इसका उदाहरण है । इस संसार में शत्रु हत्या करना
चाहते हैं, पर वे तो समय पर शत्रुभाव छोड़कर मित्र भी बन जाते हैं, किन्तु
काम इस संसार में या परलोक में प्रतिक्षण दुःख के हेतु हैं—
'इहैव भूत्वा रिपवो वधात्मकाः प्रयान्ति काले पुरुषस्य मित्रताम् ।
परत्र चैवेह च दुःखहेतवो भवन्ति कामाः न तु कस्यचिच्छिवाः ।।'
—सौ० न० ९।४७
यदि तुम्हें शक्तिशाली होने का घमंड है, अपने बल को महान् समझते हो
तो इसकी परीक्षा के लिए काम से युद्ध करो, अगर तुम इन्हें पराजित किये तो
निश्चय ही तुम बलवान् हो, अन्यथा तुम्हारा बल बेकार है । यही मारविजय
बौद्धदर्शन की कामना है ।
यह 'काम' क्या है ? साधारणतः जिसे काम कहते हैं—वह राग है, विष-
योपभोग की आसक्ति है और उसमें अपने आपको भुलाने का एक उपाय है,
एक युक्ति है । मनुष्य प्रतिपल दुःख में है, अपने आपको भूलना चाहता है ।
तथाकथित विषयोपभोग से वह यथार्थ जीवन से बहुत दूर चला जाता है । वह
आसक्ति में डूबकर अपने आपको भुला देता है । केवल दुःखों के प्रति मूर्च्छा
ला देता है । साधारणः काम नाम से जाने जानेवाले 'मार' ऐसे ही मूर्च्छा और
विस्मरण की चित्तस्थिति है । यह कामोपभोग सुख अति क्षणिक है । वह
दुःख से ही उत्पन्न होता है, दुःख को भुलाने के उपाय से ज्यादा नहीं है ।
जगत् के जाल से छुटकारा पाये नन्द की फिर से उसमें फँसने की इच्छा
की दयनीय दशा का एक मार्मिक चित्र दर्शनीय है—
'कृपणं बत यूथलालसो महतो व्याधभयाद्विनिःसृतः ।
प्रविविक्षति वागुरां मृगश्चपलो गीतरवेण वञ्चितः ।।'—सौ० न० ८।१५
इसी तरह बौद्धधर्म के चार आर्यसत्यों का वर्णन बौद्धदर्शन का ही एक
निदर्शन है—