सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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चलता है। जहाँ मार्ग के दोनों ओर शीतल सुरभित सुखद पेड़ों की छाया
पथिक को शान्ति का अनुभव नहीं होने देती है। मार्ग की मनोहरता.पथिक
के पैरों को आगे बढ़ने की स्वतः प्रेरणा देती है। इनके काव्य का लक्ष्य 'रतये'
नहीं 'व्युपशान्तये' है। इसी तरह विदेशी कवियों के बीच अश्वघोष दान्ते या
मिल्टन के समीपवर्त्ती प्रतीत होते हैं। लेकिन सिद्धान्त को अगर छोड़ दिया
जाय तो शैली की दृष्टि से ये फिर उन दोनों से भी अलग पड़ जाते हैं। शैली
की दृष्टि से मिल्टन कलावादी है, दान्ते थोड़ा-बहुत अश्वघोष से मिलते
हैं। अश्वघोष की एक स्वगतोक्ति इस सन्दर्भ में दर्शनीय है—
'इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भाकृतिः,
श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसः काव्योपचारात् कृता।
यन्मोक्षात्कृतमन्यदत्र हि मया तत्काव्यधर्मात् कृतम्,
पातुं तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृद्यं कथं स्यादिति ॥'—सौ० न० १८।६३
मुक्तिधर्म की व्याख्या से परिपूर्ण यह कृति शान्ति प्रदान करने के लिए है,
न कि आनन्द देने के लिए; अन्यमनस्क श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए
यह कृति काव्यशैली में रची गयी है। इसमें मुक्तिधर्म के अतिरिक्त मैंने जो कुछ
भी लिखा है, सो इसे काव्यधर्म के अनुसार सरस बनाने के लिए ही; जैसे कि
कड़वी औषधि को पीने लायक बनाने के लिए उसमें मधु मिलाया जाता है।
अश्वघोष कालिदास के इस कथन—'किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्'
से पूर्ण सहमत प्रतीत होते हैं। नीतिपरक होने के नाते अव्युपदेशवादी कवियों
के काव्य की परिणति जिस तरह अतिदयनीय होती है; इस दुःखद परिणति से
अश्वघोष उपदेशवादी होने के बावजूद बचे हैं। इससे भी यह प्रतीत होता है कि
अश्वघोष के पास निश्चय ही एक कवि का सच्चा हृदय था। पाश्चात्य आलोचक
और कवि 'मैथ्यू आर्नल्ड' ने उदात्त काव्य की एक पहचान स्थिर की है। तद-
नुसार साहित्य में वही काव्य स्थायित्व प्राप्त कर सकता है, जो नीतिपरक है।
जीवन का उदात्त दृष्टिकोण, जो निश्चितरूप से नैतिक मर्यादा पर स्थिर रहता
है, उसी से काव्य में स्थायी मूल आंका जा सकता है। जीवन की समष्टि में सूक्ष्म
स्थूल से बाहर कहीं अपना अस्तित्व नहीं रखता। नैतिक मर्यादा के व्यक्ति-
परक, दार्शनिक तथ्य की सौन्दर्यानुभूति पर आश्रित अश्वघोष के महाकाव्य
अपने लौकिक रूपों में इतना परिचित और मर्मस्पर्शी बन गया है कि उसके
प्रवाह में युगों से प्रचलित सस्ती भावुकतामूलक वासना के विकृत चित्र देने-
वाले काव्य सहज ही बह गये हैं। जीवन और कला के क्षेत्र में अश्वघोष ने
जो परिष्कार किया है, वह अविस्मरणीय है।
किसी भी काव्य के लिए आध्यात्मिक या दार्शनिक पृष्ठभूमि उचित है
अथवा अनुचित—इसका निर्णय व्यक्तिगत चेतना ही कर सकेगी। दुःख, स्मृति,
मुक्ति, चैतन्य, प्रवाह स्थूल, व्यक्त, प्रत्यक्ष या यथार्थ जो कुछ, यदि केवल यही