सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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श्रृंगार के उद्दीपन के लिए नारी-सौन्दर्य एक महत्त्वपूर्ण अङ्ग है। क्योंकि
रस के विभावादि समस्त अवयवों का ही साधारणीकरण होता है और विभा-
वादि के साधारणीकरण के फलस्वरूप ही स्थायी का साधारणीकरण होता
है, जिसमें सहृदय की चेतना व्यक्ति-संसर्गों से मुक्त हो जाती है। इस निर्मुक्ति
के विभाव पक्ष में नारी-सौन्दर्य का वर्णन अश्वघोष के काव्य में कई स्थलों पर
आकर्षक रूप से वर्णित है। सौन्दरनन्द के दशम सर्ग में अप्सराओं का वर्णन
इसी शृङ्गारिक कोटि का है। एक दृश्य द्रष्टव्य है—
'तासां जगुर्धीरमुदात्तमन्याः पद्मानि काश्चिल्ललितं बभञ्जुः ।
अन्योन्यहर्षान्निनृतुस्तथान्याश्चित्राङ्गहाराः स्तनभिन्नहाराः ॥'
—सौ० न० १०।३७
कुछ ने लीलापूर्वक कमल के फूल तोड़े और कुछ ने धैर्यपूर्वक उदात्त गीत
गाये । पारस्परिक आनन्द में डूबे कुछ ने नृत्य किया । कुछ ने अनेक हाव-भाव
प्रकट किये, नृत्य करते समय उनके कठोर स्तनों के कारण हार टूट-टूट कर
गिर गये । कितना उदात्त शृंगार है ?
वस्तुतः कल्पना जितनी स्फीत होगी, वर्णन उतना ही स्पष्ट होगा । कल्पना,
अनुभूति और अभिव्यक्ति—ये तीनों ही गुण इस प्रतिभाशाली संन्यासी वरेण्य
कवि में उपस्थित हैं—
'दरीचरीणामतिसुन्दरीणां मनोहरश्रोणिकुचोदरीणाम् ।
वृन्दानि रेजुर्दिशि किन्नरीणां पुष्पोत्कचानामिव वल्लरीणाम् ॥'
—सौ० न० १०।१३
हिमालय की तलहटियों में विचरण करती किन्नरियों का कितना अनुभूत
और सरस सौन्दर्य वर्णन है ? ये सुन्दर किन्नरियां, जिनके नितम्ब, स्तन और
उदर मनोहर थे, वहाँ हर दिशाओं में ऐसे शोभायमान हो रही थीं जैसे फूलों
से भरी लताएँ हों । सौन्दरनन्द एवं बुद्धचरित दोनों ही महाकाव्यों के सौन्दर्य
वर्णन में अश्वघोष ने पर्याप्त अलङ्कृत शैली का प्रयोग किया है, किन्तु उनकी
अप्रस्तुत योजना स्वाभाविक है, दुरारूढ़ नहीं—
'कासाञ्चिदासां वदनानि रेजुर्वनान्तरेभ्यश्चलकुण्डलानि ।
व्याविद्धपर्णेभ्य इवाकरेभ्यः पद्मानि कारण्डविघट्टितानि ॥'
—सौ० न० १०।३८
इनमें से कुछ अप्सराओं के चंचल कुण्डल वाले मुख वन के बीच इसी
तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे घने पत्तों वाले तालाबों के बीच हंसों के द्वारा
हिलाये गये कमल हों ।
वैसे अश्वघोष ने सुन्दरी के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त सरलता के साथ
बड़े ही प्रभावपूर्ण ढंग से किया है । आदर्श अनुराग के चित्रों में तो इसने
सजीवता ही उत्पन्न कर दी है ।