सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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में बहते हैं, वहां नारी का मूल्य उनकी दृष्टि में एक 'कानी बंदरी' से अधिक
नहीं है, उसे वे जर्जर भाण्ड की तरह 'मल-मूत्र-धरा' से अधिक महत्त्व नहीं
देते । फिर भी अपने इस शान्तरस के लिए कहीं भी उन्होंने शृङ्गार की
आत्मा को कुचला नहीं है । शृङ्गार के सारे चित्र सरस, भावमय और
प्रभावोत्पादक हैं । इनके वर्णन में सरसता तो है परन्तु ऐन्द्रिय विलासजन्य
कुत्सा नहीं है । कुछ उदाहरण दर्शनीय है—
'स चेद्भवेस्त्वं खलु दीर्घसूत्रो दण्डं महान्तं त्वयि पातयेयम् ।
मुहुर्मुहुस्त्वां शयितं कुचाभ्यां विबोधयेयं च न चापलेयम् ॥'
—सौन्दरनन्द ४।३५
अगर लौटने में तुमने देर की तो जब तुम सोओगे तो अपने कठोर कुचों
की लगातार ठोकरों से तुम्हें सोने न दूँगी, परन्तु तुमसे बात बिल्कुल ही नहीं
करूँगी । शृङ्गार की यह तरलता रसिक पाठकों के दिल को छू लेती है । कवि
के रूप-सौन्दर्य का एक और हृदय संवेद्य उदाहरण—
'छातोदरीं पीनपयोधरोरुं स सुन्दरीं रुक्मदरीमिवाद्रेः ।
काक्षेण पश्यन्न ततर्प नन्दः पिबन्निवैकेन जलं करेण ॥'
—सौन्दरनन्द ४।४१
सुनहले पर्वत-गुफा की तरह क्षीण उदर वाली, पीन पयोधर और मोटी-मोटी
जांघों वाली उस सुन्दरी को कनखी आंखों से देखता हुआ नन्द उसी तरह तृप्त
नहीं हुआ, जैसे अतिप्यासा व्यक्ति चुल्लू से पानी पीकर नहीं अघाता । शृङ्गार
के सरस-सरल एक और चित्र—
'मुहुर्मुहुंमंदव्याजसुस्तनीलांशुकापरा ।
आलक्ष्यदशना रेजे स्फुरद्विद्युदिव क्षपा ॥'
—बु० च० ४।३३
नारी-सौन्दर्य का उद्दाम, परन्तु कितना मर्यादित यह रूप है। वह नारी
नहीं बिजली से कौंधती रात है। नशे के बहाने वह बार-बार अपने नीले आँचल
को नीचे सरका देती है, जिससे उसकी करधनी चमक उठती है।
अश्वघोष केवल बौद्धभिक्षु या पण्डित कवि ही न थे, अपितु ये प्रचण्ड
साधक और समुन्नत योगी भी थे । इनकी अमूर्त्त कल्पना से गृहीत नारी-
सौन्दर्य का एक और चित्र—
पणव युवतिर्भुजांसदेशादवविस्रंसितचारुपाशमन्या ।
सविलासरतान्ततान्तमूर्वोर्विवरेकान्तमिवाभिनीय शिश्ये ॥
—बु० च० ५।५६
वाह रे खूबसूरती ? कन्धे से हार नीचे खिसक गये हैं, सविलास सुरत के
अन्त में थके प्रिय के पणव को जांघों के बीच दबाकर सो गई है । अन्योक्ति के
कैसे सजीव चित्रण हैं ।