सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४ )
'बाधात्मकं दुःखमिदं प्रसक्तं दुःखस्य हेतुः प्रभवात्मकोऽयम् ।
दुःखक्षयो निःशरणात्मकोऽयं, त्राणात्मकोऽयं प्रशमस्य मार्गः ॥'
—सौ० न० १६।४
शील, संयम और ब्रह्मचर्य के माध्यम से जीवन्मुक्त होने का उपाय,
प्रदर्शन ही बौद्धदर्शन के जीवन्त तत्त्व हैं। इसमें अहिंसा, सत्य, मैत्रीधर्म,
काम-विजय, इन्द्रिय-नियन्त्रण, आहार और आचारशुद्धि को महत्त्वपूर्ण स्थान
दिया गया है। सर्वप्राणियों पर मित्रचक्षु ही इस दर्शन का सर्वस्व है। इसका
स्वरूप ही प्राणिकल्याण या-सीमित अर्थ में आत्ममुक्ति है। अश्वघोष का दर्शन
उनकी कृतियों में इसी विचार से अनुप्राणित है।
( ४ ) अश्वघोष की कलात्मक मान्यता
अश्वघोष का कलात्मक दृष्टिकोण निश्चित रूप से उपदेशवादी या प्रचार-
वादी है। वे काव्यानन्द को रस का साधन मानते हैं, कालिदास की तरह
साध्य नहीं। इनकी कलात्मक मान्यता पर सोचते ही ध्यान आता है कि कविता
मानव-मन की तरह ही अतिपुरातन है। आजतक इस कलात्मकता की कोई
परिभाषा नहीं बन पाई, जिसमें तर्क-वितर्क की कोई संभावना न रहे। आदि-
युग से 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' से लेकर आजतक शुष्कवादी युग तक जो कुछ
काव्यकला के रूप में और उसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में कहा जा चुका है,
वह परिणाम में कम नहीं हैं, किन्तु इससे न तो मनुष्य के मन का परितोष हो
सका और न ही उसकी तार्किक बुद्धि का समाधान। कवि अपने युग का प्रतिनिधि
होता है और युग अपनी समस्याएँ लेकर समाधान खोजता है। युग ही किसी
कवि की कलात्मक मान्यता को एक विशिष्ट रूपरेखा देता है। ऐसी स्थिति में
किसी कवि से किसी अन्य कवि की तुलना आलोचक के लिए कठिन काम बन
जाता है। फिर भी इनके अध्ययन-मनन से आलोचक को किसी निष्कर्ष पर तो
आना ही पड़ता है। इस दृष्टि से देश-विदेश के समानधर्मी कवियों के दृष्टि-
कोण की समता-विषमता पर स्थिर दृष्टि से किसी निष्कर्ष पर तो आना ही
पड़ेगा। कोटि-निर्धारण में इनके परवर्त्ती कवि कालिदास, भारवि, माघ और
श्रीहर्ष के समूह में इन्हें किसी भी स्थिति में डाला नहीं जा सकता। कालिदास
यदि विशुद्ध रसवादी कवि हैं तो भारवि अपनी अर्थगुरुता के कारण अल-
ङ्कार और रसवादी कवि हैं तथा कलाबाज पण्डित कवि हैं। जहाँ तक श्रीहर्ष
का प्रश्न है तो वे मूलतः विशुद्ध रसवादी कवि हैं। इनके बीच अश्वघोष कवि
होने के नाते दो व्यक्तित्व को अपनाकर चलते नजर आते हैं। बुद्धचरित का
कवि अपने पाठकों को परमशान्ति के मन्दिर तक कभी-कभी रमणीय,
अन्यथा अधिकतर शुष्क पार्वत्य प्रदेश से ले जाना चाहता है, परन्तु ठीक
उसके विपरीत सौन्दरनन्द का कवि अपने पाठकों को सीधे राजमार्ग से ले