सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 496 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७ )
आदिकवि की अमर कृति रामायण तथा व्यास के महाभारत के रूप में विद्य-
मान थी। अपना अस्तित्व बनाये रखना, आत्मा की निर्मलता को स्थिर रखना
ही मानव-जीवन का लक्ष्य है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक ये महाकाव्य हैं। इनमें
आत्मपरकता का सिद्धान्त कार्यरत है, जो बाहरी प्रभावों के दबावों से नितान्त
मुक्त हैं। इन आर्षकाव्यों.के अतिरिक्त लौकिक संस्कृत-काव्य-परम्परा भी रही
हो। पाणिनि ने 'जाम्बवती-परिणय' तथा 'पाताल-विजय' नामक दो महा-
काव्यों की रचना की थी। इनके अतिरिक्त कई सुभाषितग्रंथ भी उपलब्ध हैं।
साधारणतः मनुष्य एक स्वचालित यंत्र है; उसके कथन और कार्य,
मानसिक स्थितियाँ और भावनाएँ, विचार और अभिप्राय सभी वाह्य शक्तियों
द्वारा उत्पन्न होते हैं। किन्तु उसे किसी अन्य आधार पर कार्यरत होना
चाहिए। एक पृथक् अस्तित्व बनाना उसके लिए आवश्यक है। जो कुछ वह
है, उतने से ही उसे संतुष्ट नहीं होना चाहिए। वह जो कुछ हो सकता है वहाँ
तक उसे जाना चाहिए। अपनी चेतना में उसका पुनर्जन्म या कायाकल्प
होना चाहिए। आमोद-प्रमोद या विलासमय जीवन बिताने वाला व्यक्ति,
अनिवार्यतः आन्तरिक पथ के पथिक, भीतर से बढने और नई-नई शक्तियाँ
एवं गुण प्राप्त करने वाले व्यक्ति से ऊँचे स्तर पर कदापि नहीं होते। मानव
केवल भौतिक सम्पत्ति—यहाँ तक कि ज्ञानार्जन—से ही संतुष्ट नहीं हो सकता।
उसका ध्येय कुछ और है—आत्मसाक्षात्कार। और इसी सिद्धान्त के प्रति-
पादक संस्कृत साहित्य की काव्य-परम्परा है।
संस्कृत साहित्य आध्यात्मिक जगत् में प्रमुख स्थान ग्रहण किया है और
इस तथ्य का प्रतीक है कि आत्मविजय, साहस, पवित्रता, जीवन में एकता
और मैत्रीभाव से ही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। यही आदर्श हमें मोक्षमार्ग
के चिन्तन में लीन बौद्ध दार्शनिकों में, अज्ञान, ईर्ष्या और 'मार' को पराजित
करने वाले शान्त एवं सौम्य बुद्ध में आत्मचिन्तन के पश्चात् तपःपूत काया में
सार्वभौम प्रेम में एकाकार हो जाने, मैत्रीभाव से सराबोर, आत्मलीन लाल-
साओं से ऊपर उठकर, परमपिता की इच्छा का पालन इस पार्थिव जगत् में
सदैव करने वाले साधु के आनन्दातिरेक अश्वघोष के साहित्य में मिलता है।
सृजनात्मक जीवन केवल ऐसे कवि के लिए संभव है, जो एकाग्र और
पवित्र रह सकते हैं और जिनमें एकान्त चिन्तन का साहस है। एकान्त के
क्षणों में ही, चित्त की एकाग्रता की स्थिति में, शील, संयम और आहार
नियंत्रण से आत्मोपलब्धि होती है, मुक्तिमार्ग के दर्शन होते हैं और उस
चिन्तन को कोई कवि काव्य-धरातल पर लाता है। फिर उसे अपनी भावनाओं
का परिधान पहनाता है, उसे शब्दों में व्यक्त करता है, गतिमयता प्रदान
करता है अथवा दर्शन के रूप में आंक देता है। मस्तिष्क को आत्मा का वाहन
बनाने के लिए एकान्त चिन्तन और काव्य का सृजन करता है। सम्पूर्ण सिद्धि