सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 496 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

( २६ )
अध्यात्म या दर्शन से अभिप्रेत है तो हमें वह सौन्दर्य, शील, शक्ति, मैत्रीधर्म
आदि की सभी सूक्ष्मभावनाओं में फैला है । अनेक अव्यक्त, किन्तु यथार्थ
सम्बन्धी धारणाओं में अंकुरित, इन्द्रियानुभूत प्रत्यक्ष की पूर्णता से उत्पन्न,
उसी की परोक्षरूप भावना में छिपा हुआ और अपनी ऊर्ध्वगामी वृत्तियों से
निर्मित मैत्रीधर्म, मानवधर्म आदि के ऊँचे आदर्शों से अनुप्राणित मिलेगा ।
अश्वघोष की कृतियों में ऐसी दार्शनिक अनुभूतियाँ तो भरी पड़ी मिलेगी । एक
चित्र अश्वघोष का कितना नैतिक है, सार्वजनीन एवं मानवधर्मी हैं—इसे देखने
से ही पता चल जाता है । मनुष्य को सभी अवस्थाओं में दृष्टि, घ्राण, श्रवण,
आस्वाद और स्पर्श—इन बुराई करनेवाले शत्रुओं का नियंत्रण करने में सदैव
सावधान रहना चाहिए । इस विषय में क्षणभर के लिए भी प्रमाद या आलस्य
घातक सिद्ध हो सकता है—
'तस्मादेषामकुशलकराणामरीणां चक्षुर्घाणश्रवणरसनस्पर्शनानाम् ।
सर्वावस्थं भव विनियमादप्रमत्तो मास्मिन्नर्थे क्षणमपि कृथास्त्वं प्रमादम् ।।'
—सौन्दरनन्द १३।५६
यदि अश्वघोष के इस कथन को परम्परागत धार्मिक रूढ़ि या अध्यात्म की
संज्ञा देते हैं तो उस रूप में इस काव्य में इसका वह महत्त्व नहीं रह जाता, जो
कवि को अभिप्रेत है । इस कथन में अध्यात्म या दर्शन को बलात् प्रचारवादी
रूप देने का या उसकी मानवीय अतिचेतना की एकान्तिक अनुभूति को अस्वी-
कार करने के आग्रह का औचित्य प्रतीत नहीं होता है । अवश्य ही वह अपने
एकान्तिक रूप में भी सफल है, किन्तु इस मानवीय नैतिकता की अभिव्यक्ति
लौकिक रूपकों में ही तो संभव है ।
अश्वघोष की मुक्तिजन्य परोक्षानुभूति चाहे जितनी एकान्तिक रही हो,
परन्तु उनका शील, इन्द्रिय-संयम, मारजय, आर्यसत्य या वितर्कप्रहाण प्रभृति
की मर्मस्पशिनी अभिव्यञ्जना क्या किसी लोकोत्तर लोक से रूपक लाई है ?
हम भले ही अश्वघोष के आध्यात्मिक एवं दार्शनिक संकेतों से अपरिचित हों,
किन्तु उनकी लौकिक कलात्मक दृष्टिकोण की सप्राणता से हमारा पूर्ण परिचय
है । जहाँ तक धर्मगत रूढ़िग्रस्त प्रचार या उपदेशात्मक काव्य का प्रश्न है तो
वह तो केवल विधिनिषेधमय सिद्धान्तों का संग्रहमात्र है, जो अपने प्रायोगिक
स्वरूप को खोकर इसके वास्तविक स्वरूप के निर्माण में बाधक सिद्ध हुए हैं ।
बौद्ध धार्मिक दृष्टिकोण ने ही उनकी काव्यात्मक व्यापक दृष्टि को रोक दिया
है, जो व्यापक जीवन-दृष्टि कालिदास में पाई जाती है—यह अभाव अवश्य
खटकता है ।
(५) अश्वघोष की काव्य-प्रतिभा तथा उनके काव्यों का सौन्दर्य
भारतीय संस्कृत साहित्य की विशाल काव्य-परम्परा के प्रारंभ में ही
मानवीय चेतना की एक निश्चित दिशा निर्धारित कर दी गई है । यह परम्परा