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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 496 में से

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भीतर से बाहर निकल आती है। उसका सच्चा ऐश्वर्य यही मानसिक चिन्तन
होता है, भौतिक नहीं। स्वतंत्रचेता अश्वघोष इसी दृष्टि से अन्य लौकिक
कवियों से भिन्न हैं। शैली की दृष्टि से भी अश्वघोष आदिकवि महर्षि
वाल्मीकि के समीपवर्त्ती ही प्रतीत होते हैं। उसी तरह कुछ स्थलों को छोड़ कर
इनकी भाषा भावानुसारिणी सरस, सरल और तरल है। आदिकवि की ही
तरह अनेक छन्दों का प्रयोग करते हुए भी अश्वघोष ने अधिकतर अनुष्टुप् का
ही प्रयोग किया है।
अश्वघोष की कथावस्तु बौद्ध अवदानों पर आधारित है। वस्तु को ऊर्ज-
स्वित एवं काव्यमयता के लिए उन्होंने जातक-कथाओं में वर्णित कथाओं के
मूल रूप में यत्र-तत्र अपेक्षित परिवर्तन एवं परिष्कार भी किया है। जातक-
कथा में एक बन्दरी का वर्णन है, जिसे बौद्ध ग्रन्थों में भगवान् बुद्ध ने नन्द को
दिखलाकर उसके प्रियासक्त मन को सुस्थिर करना चाहते हैं। उस बन्दरी को
न नाक है और न कान ही, उसे आँख भी नहीं है! पर उसी कथा को अश्व-
घोष ने अपने काव्यगंगाजल से धो-पोंछ कर कितना सुन्दर बना दिया है, वह
दर्शनीय है—
'तस्मात्तु यूथादपसार्यमाणां निष्पीडितालक्तरक्तवक्त्राम्।
शाखामृगीमेकविपन्नदृष्टिं दृष्ट्वा मुनिर्नन्दमिदं बभाषे॥'
—सौ० न० १०।१५
× × ×
का नन्द रूपेण च चेष्टया च सम्पश्यतश्चारुतरा मता मे।
एषा मृगी वैकविपन्नदृष्टिः स वा जनो यत्र गता तवेष्टिः॥'
—सौन्दरनन्द १०।१६
बौद्ध अवदान के इस रूखे प्रसंग को अश्वघोष ने कितना आकर्षक बना
डाला है। 'ओ नन्द ! जरा इस कानी बंदरी को तो देखो, जो अपने दल से भटक
कर इधर आ गई है, इसका मुँह तो देखो, लगता है किसी ने महावर निचोड़
कर डाल दिया हो। इसे देखकर अब तुम्ही बतलाओ कि तुम्हारी समझ में
रूप और हावभाव में कौन अधिक खूबसूरत है—यह बंदरी या वह सुन्दरी,
जिसमें तुम्हारा जी रमा है ?' कितना तीखा कटाक्ष है। दिल को बेंधने वाला
कितना दिलकस व्यंग्य मुस्कुरा रहा है ?
अश्वघोष के प्रथम महाकाव्य बुद्धचरित का कथा-प्रवाह वर्ण्य विषय के
हाथों में हाथ डालकर चलते नजर आता है, किन्तु जहाँ दार्शनिक चिन्तन
अधिक तीव्र हो गया है वहाँ कथा-प्रवाह प्रायः पारिभाषिक शब्द-चट्टानों के
नीचे सूखता नजर आता है। ठीक यही स्थिति सौन्दरनन्द की भी है। जहाँ
दार्शनिकता का भार हल्का हुआ वहाँ बौद्ध संन्यासी अश्वघोष का कवित्व जाग
गया है। प्रसंग चाहे रत्यात्मक हो या वैराग्यात्मक—कथा-प्रवाह की प्राञ्जल