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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

५० सर्वार्थसिद्धि
विदित होता है कि यह वाक्य आचार्य पूज्यपादने कात्यायनके वार्तिक 'त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्' । ४, २,
१०४ ।' को ध्यानमें रखकर कहा है। आचार्य अभयनन्दिने अपनी वृत्तिमें अवश्य ही 'नेर्ध्रुवम् इति वक्तव्यम् ।'
यह वार्तिक बनाया है । किन्तु वह बादकी रचना है ।
इन तथ्योंके प्रकाशमें यह स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य पूज्यपादने अपनी सर्वार्थसिद्धि टीकामें जैनेन्द्र-
व्याकरणके समान पाणिनीय व्याकरणका भी उपयोग किया है और यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जैनेन्द्रव्याकरण
की रचना होनेके अनन्तर ही उन्होंने सर्वार्थसिद्धि • टीका लिखी थी । अध्याय १० सूत्र ४ की सर्वार्थसिद्धि
टीकामें आचार्य पूज्यपादने पंचमी विभक्तिके लिए 'का' संज्ञाका प्रयोग किया है। आचार्य पूज्यपादने अपने
जैनेन्द्रव्याकरणमें 'विभक्ती' शब्दके व्यंजन अक्षरोंमें 'आ' और स्वरोंमें 'प्' जोड़कर क्रमसे विभक्तियोंको वा,
इप्, भा, अप्, का, ता, ईप् ये सात संज्ञाएँ निश्चित की हैं। इस हिसाबसे 'का' यह पंचमी विभक्तिका संकेत
है। यह भी एक ऐसा प्रमाण है जो इस बातको सूचित करता है कि सर्वार्थसिद्धि लिखे जानेके पहले जैनेन्द्र-
व्याकरणकी रचना हो गयी थी ।
कात्यायनवार्तिक—पाणिनीयके व्याकरण सूत्रोंपर कात्यायन महर्षिने वार्तिक लिखे हैं। अध्याय ७
सूत्र १६ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें आचार्य पूज्यपाद ने शास्त्र कहकर उनके 'अश्ववृषमयोगैर्मुनेच्छायाम् ।'
इस वार्तिकको उद्धृत किया है। यह पाणिनिके ७, १, ५१ पर कात्यायनका पहला वार्तिक है ।
पातंजल महाभाष्य — वैदिक परम्परामें पतंजलि ऋषि एक महान् विद्वान् हो गये हैं। इस समय
पाणिनीय व्याकरणपर जो पातंजल महाभाष्य उपलब्ध होता है वह इन्हीं की अमर कृति है। योगदर्शनके
लेखक भी यही हैं। यह इससे स्पष्ट है—
'योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ।
योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ।'
जिन्होंने योगके द्वारा चित्तके मलको, व्याकरण के द्वारा वचनोंके मलको और वैद्यकद्वारा शरीरके
मलको दूर किया है उन मुनियोंमें श्रेष्ठ पतंजलि ऋषिके समक्ष मैं नतमस्तक होता हूँ ।
पतंजलि ऋषिके अवस्थिति कालके विषयमें मतभेद है। तथापि ये विक्रमपूर्व द्वितीय शताब्दीसे पहले
नहीं हुए हैं इतना निश्चित है। इस समय हमारे सामने पातंजल महाभाष्य और सर्वार्थसिद्धि उपस्थित हैं।
इन दोनोंका तुलनात्मक अध्ययन करनेसे विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादके साहित्यपर और खासकर
सर्वार्थसिद्धिपर पातंजल महाभाष्य की गहरी छाप पड़ी है। दोनोंका अवलोकन करनेसे विदित होता है कि
सर्वार्थसिद्धिके ऐसे अनेक स्थल हैं जो पातंजल महाभाष्यके आश्रयसे सजाये गये हैं। इस बातको स्पष्ट करनेके
लिए आगेकी तुलनापर दृष्टि डालिए—

पातंजल महाभाष्यसर्वार्थसिद्धि
अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वेति ।अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा ।
बहवो हि शब्दाः, एकार्था भवन्ति । तद्यथा इन्द्रः,सत्यपि प्रकृतिभेदे रूढिबललाभात् पर्यायशब्द-
शक्रः, पुरुहूतः, पुरन्दरः ।त्वम् । यथा—इन्द्रः, शक्रः, पुरन्दर इति ।
अनुदरा कन्येतियथा, अनुदरा कन्या इति ।
अस्त्येव संख्यावाची । तद्यथा, एको द्वौ बहवसंख्यावाची यथा—एको द्वौ बहव इति ।
इति ।
बहुरोदनो बहुः सूप इति ।बहुरोदनो बहुः सूप इति ।
सिद्धे विधिरारभ्यमाणो ज्ञापकार्थो भवति ।सिद्धे विधिरारभ्यमाणे नियमार्थः ।
हि मन्यै रथेन यास्यसीतिएहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यति यातस्ते
पितेति ।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

प्रस्तावना ५१
पातञ्जल महाभाष्य | सर्वार्थसिद्धि
भाविकृत्यमासीत् । पुत्रो जनिष्यमाण आसीत् । | विश्वदृश्वाऽस्य पुत्रो जनिता । भाविकृत्य-
| मासीदिति ।
अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः । अर्थं संप्रत्याययिष्या- | अथवा अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः तत्रैकस्यार्थस्यैकेन
मीति शब्दः प्रयुज्यते तत्रैकेनोक्तत्वात्तस्यार्थस्य द्विती- | गतार्थत्वात्पर्यायशब्दप्रयोगोनर्थकः ।
यस्य च तृतीयस्य च प्रयोगेण न भवितव्यं उक्तार्था- |
नामप्रयोगः । |
एकश्च तन्तुस्त्वक्त्राणेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च | भवति हि कश्चित्प्रत्येकं तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः ।
कम्बलः समर्थः । एकश्च बल्वजो बन्धनेऽसमर्थस्त- |
त्समुदायश्च रज्जुः समर्था भवति । |
इमानीन्द्रियाणि कदाचित्स्वातन्त्र्येण विवक्षितानि | स्वातन्त्र्यविवक्षा च दृश्यते । इदं मे अक्षि सुष्ठु
भवन्ति । तद्यथा इदं मे अक्षि सुष्ठु पश्यति, अयं मे | पश्यति । अयं मे कर्णः सुष्ठु शृणोति ।
कर्णः सुष्ठु शृणोतीति । |
कदाचित् पारतन्त्र्ये विवक्षितानि भवन्ति— | लोके इन्द्रियाणां पारतन्त्र्यविवक्षा दृश्यते ।
अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि । अनेन कर्णेन सुष्ठु | अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि । अनेन कर्णेन सुष्ठु शृणो-
शृणोमि । | मीति ।
द्रुतायां तपरकरणे मध्यमविलम्बितयोरुपसंख्यानं | द्रुतायां तपरकरणे मध्यमविलम्बितयोरुपसंख्यानम् ।
कालभेदात् । |
अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः । | अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः ।
हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे भिक्षादिषु दर्शनात् । | निमित्तमात्रेऽपि हेतुकर्तृव्यपदेशो दृष्टः । यथा
हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे द्रष्टव्यः । यावद् ब्रूयान्निमित्तं | कारीषोऽग्निरध्यापयति ।
कारणमिति तावद्धेतुरिति । किं प्रयोजनम् । भिक्षादिषु |
दर्शनात् । भिक्षादिष्वपि णिज् दृश्यते भिक्षा वासयन्ति |
कारीषोऽग्निरध्यापयति इति । |
स बुद्ध्या निवर्तते । य एष मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी | ''''स बुद्ध्या सम्प्राप्य निवर्तते । एवमिहापि य
भवति स पश्यति । | एष मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी स पश्यति ।
तद्यथा संगतं घृतं संगतं तैलमित्युच्यते । एकी- | तद्यथा संगतं घृतं संगतं तैलमित्युच्यते । एकी-
भूतमिति गम्यते । | भूतमिति गम्यते ।
कल्प्यो हि वाक्यशेषो वाक्यं च वक्तर्यधीनं हि । | कल्प्यो हि वाक्यशेषो वाक्यं च वक्तर्यधीनम् ।
रत्नकरण्डक—यह दिगम्बर परम्पराका एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसमें धर्मके स्वरूपका व्याख्यान कर
व धर्मको सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रस्वरूप बतला कर पाँच अध्यायोंमें इन तीनों रत्नोंका
क्रमसे विवेचन किया गया है इसलिए इसको रत्नकरण्डक कहते हैं। किन्तु सम्यक् चारित्रका प्रतिपादन करते
समय सकल चारित्रका उल्लेखमात्र करके इसमें मुख्यतया विकलचारित्र (श्रावकाचार) का ही विस्तारके
साथ निरूपण किया गया है, इसलिए इसे रत्नकरण्डकश्रावकाचार भी कहते हैं। साधारणतः इसके कर्तृके
सम्बन्धमें प्रसिद्धि है कि यह दिगम्बर परम्पराके प्रसिद्ध आचार्य समन्तभद्र स्वामीकी अमर कृति है। अभी
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

५२ सर्वार्थसिद्धि
तक जितने प्राचीन उल्लेख मिलते हैं उनसे इसी तथ्यकी पुष्टि होती है¹ । स्वयं प्रभाचन्द्र आचार्य जिन्होंने कि
इस पर विस्तृत संस्कृत टीका लिखी है, इसे स्वामी समन्तभद्रकी ही कृति मानते हैं। जैसा कि इसके प्रत्येक
अध्यायके अन्तमें पायी जानेवाली पुष्पिकासे विदित होता है² । ऐसी अवस्थामें आचार्य पूज्यपादके सामने
सर्वार्थसिद्धि लिखते समय रत्नकरण्डक अवश्य होना चाहिए। आगे हम इन दोनों ग्रन्थोंके कुछ ऐसे उल्लेख
उपस्थित करते हैं जिससे इस विषयके अनुमान करनेमें सहायता मिलती है। उल्लेख इस प्रकार हैं:—
१ रत्नकरण्डकमें व्रतका स्वरूप इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
‘अमिसन्धिक्कृता विरतिर्विषयाद्योगाद् व्रतं भवति ॥३,१०॥’
इसी बातको सर्वार्थसिद्धिमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
व्रतमभिसन्धिक्कृतो नियमः । ७-१।
रत्नकरण्डकमें अनर्थदण्डके ये पांच नाम दिये हैं—पापोपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुःश्रुति और
प्रमादचर्या । सर्वार्थसिद्धिमें भी ये ही पांच नाम परिलक्षित होते हैं। इतना ही नहीं इनके कुछ लक्षणोंके
विषयमें भी अपूर्व शब्दसाम्य दृष्टिगोचर होता है। यथा—
‘तिर्यक्क्लेशवाणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् ।
कथाप्रसंगप्रसवः स्मर्त्तव्यः पाप उपदेशः ॥’ रत्न० ३ ।।
‘तिर्यक्क्लेशवाणिज्यप्राणिवधकारम्भादिषु पापसंयुक्तं वचनं पापोपदेशः ।’ सर्वा० ७, २१ ।
‘क्षितिसलिलदहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदम् ।
सरणं सारणमपि च प्रमादचर्यां प्रभाषन्ते ॥’ रत्न ३, ३४ ।
‘प्रयोजनमन्तरेण वृक्षादिच्छेदनभूमिकुट्टनसलिलसेचनाद्यवद्यकर्म प्रमादाचरितम् ।’ सर्वा० २१ ।
इन दोनों ग्रन्थोंमें भोगोपभोगव्रत या उपभोगपरिभोगव्रतके निरूपणमें जो अर्थ और शब्दसाम्य दृष्टि-
गोचर होता है वह तो और भी विलक्षण है। दोनोंमें भोग और उपभोगके प्रकार दिखलाकर त्रसघात,
बहुघात और अनिष्टके त्यागका उपदेश दिया गया है। मात्र रत्नकरण्डकमें इनके सिवा अनुपसेव्यके त्यागका
निर्देश विशेषरूपसे किया गया है। रत्नकरण्डकके उल्लेख इस प्रकार हैं—
‘त्रसहतिपरिहरणार्थं क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहृतये ।
मद्यं च वर्जनीयं जिनचरणौ शरणमुपयातैः ॥’ ३, ३८ ॥
‘अल्पफलबहुविघातान्मूलकमाद्राणि शृङ्गवेराणि ।
नवनीतनिम्बकुसुमं कैतकमित्येवमवहेयम् ॥ ३, ३९ ॥
यदनिष्टं तद् व्रतयेद्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् ॥३, ४० ॥’
इसी विषयको सर्वार्थसिद्धिमें देखिए—
‘मधु मांसं मद्यं च सदा परिहर्त्तव्यं त्रसघातानिवृत्तचेतसा । केतक्यर्जुनपुष्पादीनि शृङ्गवेरमूलकादीनि
बहुजन्तुयोनिस्यानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि परिहर्त्तव्यानि बहुघाताल्पफलत्वात् । यानवाहनाभरणादिष्वे-
तावदेवेष्टमतोऽन्यदनिष्टमित्यनिष्टान्निवर्त्तनं कर्तव्यम्•••••••• ।’ ७, २२ ।
इतने विलक्षण साम्यके होते हुए भी इन दोनों ग्रन्थोंमें कुछ विशेषता है। प्रथम विशेषता तो यह है
कि रत्नकरण्डकमें ‘प्रोषध’ शब्दका अर्थ ‘सत्कृद्भुक्ति’ किया है और सर्वार्थसिद्धि में ‘पर्व’ । तथा दूसरी
विशेषता यह है कि रत्नकरण्डकमें आठ मूलगुणोंका स्वतन्त्र रूपसे उल्लेख किया है जब कि सर्वार्थसिद्धिमें
इनकी यत्किंचित् भी चर्चा नहीं की है। इसलिए शंका होती है कि यदि सर्वार्थसिद्धि रत्नकरण्डकके बादकी
१. देखो पं० जुगलकिशोरजी द्वारा सम्पादित और श्रीमाणिकचन्द्र ग्रन्थमाला बम्बईसे प्रकाशित रत्नकरण्ड
श्रावकाचारकी प्रस्तावना, पृ० ५ से पृ० १५ तक । २. इति प्रभाचन्द्र विरचितायां समन्तभद्रस्वामिविरचितो-
पासकाध्ययनटीकायां प्रथमः परिच्छेदः ।

रचना मानी जाय तो उसमें यह अन्तर नहीं दिखाई देना चाहिए । 'प्रोषध' शब्दके अर्थको हम छोड़ सकते
हैं, तब भी आठ मूलगुणोंके निर्देश और अनिर्देशका प्रश्न बहुत ही महत्त्व रखता है । पाठक जितने भी
प्राचीनकालकी ओर जायेंगे देखेंगे कि पूर्वकालमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख श्रावकके कर्तव्योंमें अलगसे नहीं
किया जाता था । सर्वप्रथम यह उल्लेख रत्नकरण्डकमें ही दिखलाई देता है ।
श्रीमान् डॉ० हीरालालजी रत्नकरण्डकको श्री स्वामी समन्तभद्रकी कृति माननेमें सन्देह करते हैं ।
उनका यह विचार बननेका मुख्य कारण यह है कि वादिराजसूरिने अपने पार्श्वनाथचरितमें देवागमके कर्ता
स्वामी समन्तभद्रका उल्लेख करनेके बाद पहले 'देव' पद द्वारा जैनेन्द्र व्याकरणके कर्ता आचार्य पूज्यपादका
उल्लेख किया है और इसके बाद रत्नकरण्डकके कर्ताका स्मरण करते हुए उन्हें 'योगीन्द्र' नामसे सम्बोधित किया
है । डॉ० साहब का ख्याल है कि ये 'योगीन्द्र' स्वामी समन्तभद्रसे भिन्न होने चाहिए जो कि आचार्य पूज्य-
पादके बादके प्रतीत होते हैं । यही कारण है कि वादिराजसूरिने अपने पार्श्वनाथचरितमें आचार्य पूज्यपादके
बाद आचार्य योगीन्द्रका स्मरण किया है और उन्हें रत्नकरण्डकका निर्माता कहा है । इसकी पुष्टिमें उन्होंने
और भी कई प्रमाण दिये हैं, पर उनमें मुख्य प्रमाण यही है ।
श्रीमान् पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारने माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित होनेवाले सटीक रत्नकरण्ड-
श्रावकाचारकी प्रस्तावनामें रत्नकरण्डककी अन्तःपरीक्षा करके यह सम्भावना प्रकट की है कि जिस रूपमें
इस समय वह उपलब्ध होता है वह उसका मूलरूप नहीं है । लिपिकारों और टिप्पणकारोंकी असावधानी वश
कई प्रक्षिप्त श्लोक मूलके अंग बन गये हैं² । हमारा अनुमान है कि अष्ट मूलगुणोंका प्रतिपादक यह श्लोक भी
इसी प्रकार मूलका अंग बना है । यद्यपि मुख्तार साहब. आठ मूलगुणोंके प्रतिपादक श्लोकको प्रक्षिप्त नहीं
मानते । उन्होंने इसका कोई खास कारण तो नहीं दिया । केवल उपसंहार करते हुए इतना ही कहा है कि
'इसके न रहनेसे अथवा यों कहिए कि श्रावकाचार विषयक ग्रन्थमें श्रावकोंके मूलगुणोंका उल्लेख न होनेसे,
ग्रन्थमें एक प्रकारकी भारी त्रुटि रह जाती जिसकी स्वामी समन्तभद्र जैसे अनुभवी ग्रन्थकारोंसे कभी आशा
नहीं की जा सकती थी³ ।'
हम यह तो मानते हैं कि केवल वादिराज सूरिके उल्लेखके आधारसे यह तो नहीं माना जा सकता
कि रत्नकरण्डक स्वामी समन्तभद्रकी कृति नहीं है, क्योंकि उन्होंने आचार्योंका उल्लेख सर्वथा कालक्रमके
आधारसे नहीं किया हैं । यथा—वे अध्याय १ श्लोक २० में अकलंकका उल्लेख करनेके बाद २२वें श्लोकमें
सम्मतितर्कके कर्ताका स्मरण करते हैं । यह भी सम्भव है कि किसी लिपिकारकी असावधानीवश रत्नकरण्डक
का उल्लेख करनेवाला पार्श्वनाथचरितका 'त्यागी स एव योगीन्द्रः' श्लोक 'अचिन्त्यमहिमा देवः' इस
श्लोकके बाद लिपिबद्ध हो गया हो । मुद्रित प्रतिमें ये श्लोक इस रूपमें पाये जाते हैं ।
स्वामिनश्चरितं तस्य कस्य नो विस्मयावहम् ।
देवागमेन सर्वज्ञो येनाद्यापि प्रदर्श्यते ॥१, १७॥
अचिन्त्यमहिमा देवः सोऽभिवन्द्यो हितैषिणा ।
शब्दाश्च येन सिद्धयन्ति साधुत्वं प्रतिलम्भिताः ॥१, १८॥
त्यागी स एव योगीन्द्रो येनाक्षय्यसुखावहः ।
अर्थिने भव्यसार्थाय दिष्टो रत्नकरण्डकः ॥१, १९॥
किन्तु इनमेंसे १९ संख्यांकवाले श्लोकको १७ संख्यांकवाले श्लोकके बाद पढ़ने पर 'त्यागी स एव
योगीन्द्रो' इस पद द्वारा स्वामी समन्तभद्रका ही बोध होता हैं और सम्भव है कि वादिराज सूरिने रत्नकरण्डक
का कर्तृत्व प्रकट करनेके अभिप्रायसे पुनः यह श्लोक कहा हो । किन्तु दूसरे प्रमाणोंके प्रकाशमें इसे सम्भावना
द्वारा रत्नकरण्डकको स्वामी . समन्तभद्रकर्तृक मान लेनेपर भी उसमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख अवश्य ही
१. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित पार्श्वनाथचरित, सर्ग १, श्लोक १७, १८ और १९ । २. देखो,
प्रस्तावना पृष्ठ १५ से पृष्ठ ५३ तक । ३. देखो प्रस्तावना पृ० ३२ ।

विचारणीय हो जाता है। इस विषयमें हमारा तो खयाल है कि जिस कालमें श्रावकके पाक्षिक, नैष्ठिक और
साधक ये तीन भेद किये गये और इस आधारसे श्रावकाचार के प्रतिपादन करनेका प्रारम्भ हुआ उसी कालसे
आठ मूलगुणोंका वर्गीकरण हो कर उन्हें श्रावकाचारोंमें स्थान मिला है। रत्नकरण्डकमें कुछ ऐसे बीज हैं
जिनसे उसका संकलन दूसरे श्रावकाचारोंमें हुए विकास क्रमके बहुत पहलेका माना जा सकता है। अतएव
सम्भव है कि रत्नकरण्डकमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख प्रक्षिप्त हो। रत्नकरण्डकमें जिस स्थानपर यह आठ
मूलगुणोंका प्रतिपादक श्लोक संकलित है उसे देखते हुए तो यह सम्भावना और भी अधिक बढ़ जाती है।
इसके पहले स्वामी समन्तभद्र अतीचारोंके साथ पाँच अणुव्रतोंका कथन कर आये हैं और आगे वे सात शील-
व्रतोंका अतीचारोंके साथ कथन करनेवाले हैं। इनके बीचमें यह श्लोक आया है जो अप्रासंगिक है।
युक्त्यनुशासन—स्वामी समन्तभद्रकी रत्नकरण्डके समान अन्यतम अमर कृति उनका युक्त्यनुशासन
है। इसमें वीर जिनकी स्तुति करते हुए युक्तिपूर्वक उनके शासनकी स्थापना की गयी है। इसके एक स्थलपर
वे कहते हैं कि जो शीर्षोपहार आदिके द्वारा देवकी आराधना कर सुख चाहते हैं और सिद्धि मानते हैं उनके
आप गुरु नहीं हो। श्लोक इस प्रकार है—
'शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखैर्देवान् किलाराध्य सुखाभिगृद्धाः।
सिद्धयन्ति दोषापचयानपेक्षा युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥'
अब इसके प्रकाशमें सर्वार्थसिद्धिके इस स्थलको पढ़िए—
तेन तीर्थाभिषेकर्दाक्षाशीर्षोपहारदेवताराधनादयो निवर्तिता भवन्ति। अ० ९, सू० २ की टीका।
इस तुलनासे विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादके समक्ष युक्त्यनुशासनका उक्त वचन उपस्थित था।
द्वात्रिंशत्का—आचार्य पूज्यपादके पूर्व और स्वामी समन्तभद्रके बाद विक्रमकी पाँचवीं छठीवीं शताब्दीके
मध्यमें¹ सिद्धसेन दिवाकर एक बहुत बड़े आचार्य हो गये हैं जिनका उल्लेख दिगम्बर आचार्योंने बड़े आदरके
साथ किया है²। इनके द्वारा रचित सन्मतितर्क ग्रन्थ प्रसिद्ध है। अनेक द्वात्रिंशत्काओंके रचयिता भी यही
माने जाते हैं³। आचार्य पूज्यपादने अध्याय ७ सूत्र १३ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें 'वियोजयति चासुभिः' यह
पद उद्धृत किया है जो इनकी सिद्धद्वात्रिंशत्कासे लिया गया जान पड़ता है।
इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धिमें कुछ ऐसी गाथाएँ, पद्य और वाक्य उद्धृत हैं जिनमेंसे कुछके स्रोतका हम
अभी तक ठीक तरहसे निर्णय नहीं कर सके हैं और कुछ ऐसे हैं जो सर्वार्थसिद्धिके बादमें संकलित हुए या
रचे गये ग्रन्थोंमें उपलब्ध होते हैं। यहाँ हमने उन्हीं ग्रन्थोंका परिचय दिया है जो निश्चयतः आचार्य पूज्यपाद
के सामने रहे होंगे।
मंगलाचरण—सर्वार्थसिद्धिके प्रारम्भमें यह मंगल श्लोक आता है—
'मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥'
यहाँ विचार इस बातका करना है कि यह मंगल श्लोक तत्त्वार्थसूत्रका अंग है या सर्वार्थसिद्धिका ।
कुछ विद्वानोंका मत इसे तत्त्वार्थसूत्रका अंग माननेके पक्षमें है। वे इसके समर्थनमें इन हेतुओंको उपस्थित
करते हैं—
एक तो तत्त्वार्थसूत्रकी हस्तलिखित अधिकतर जो प्राचीन प्रतियां उपलब्ध होती हैं उनके प्रारम्भमें
यह मंगल श्लोक उपलब्ध होता है और दूसरे आचार्य विद्यानन्दने अपनी आप्तपरीक्षामें इसे सूत्रकारका कहकर
इसका उल्लेख किया है। यथा—
'किं पुनस्तत्परमेष्ठिनो गुणस्तोत्रं शास्त्रादौ सूत्रकाराः प्राहुरिति निगद्यते ।'
१. देखो भारतीय विद्या भाग ३, पृष्ठ ११। २. देखो जिनसेनका महापुराण । ३. देखो पुरातन जैन वाक्य-
सूची, प्रस्तावना पृ० १३२ ।

प्रस्तावना ५५
आचार्य विद्यानन्द इतना ही कहकर नहीं रह गये । वे आप्तपरीक्षा का उपसंहार करते हुए पुनः
कहते हैं—
'श्रीमत्तत्त्वार्थशास्त्रादद्भुतसलिलनिधेरुद्रत्नोद्भवस्य,
प्रोत्थानारम्भकाले सकलमलभिदे शास्त्रकारैः कृतं यत् ।
स्तोत्रं तीर्थोपमानं प्रथितपृथुपथं स्वामिमीमांसितं तत्,
विद्यानन्दैः स्वशक्त्या कथमपि कथितं सत्यवाक्यार्थसिद्धयै ॥१२३॥'
प्रकृष्ट रत्नोंके उद्भवके स्थानभूत श्रीमत्तत्त्वार्थशास्त्ररूपी अद्भुत समुद्रकी रचनाके आरम्भ कालमें
महान् मोक्षपथको प्रसिद्ध करनेवाले और तीर्थोपमस्वरूप जिस स्तोत्रको शास्त्रकारोंने समस्त कर्ममलके भेदन
करनेके अभिप्रायसे रचा है और जिसकी स्वामीने मीमांसा की है उसी स्तोत्रका सत्य वाक्यार्थकी सिद्धिके
लिए विद्यानन्दने अपनी शक्तिके अनुसार किसी प्रकार निरूपण किया है ।
इसी बातको उन्होंने इन शब्दोंमें पुनः दुहराया है—
'इति तत्त्वार्थशास्त्रादौ मुनीन्द्रस्तोत्रगोचरा ।
[L14

५६ सर्वार्थसिद्धि
अवश्य ही टीका लिखते। अभी तो केवल इतना ही कहा जा सकता है कि आचार्य विद्यानन्द इसे तत्त्वार्थ-
सूत्रके कर्ताका मंगलाचरण मानते रहे हैं।'
३. तत्त्वार्थसूत्रकार
पुरानी परम्परा — शास्त्रकी प्रमाणता और अप्रमाणताका प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय है। प्राचीन-
कालमें सभी शास्त्रकार शास्त्रके प्रारम्भमें या अन्तमें अपने नाम, कुल, जाति, वास्तव्यस्थान आदिका उल्लेख
नहीं करते थे, क्योंकि वे उस शास्त्रका अपनेको प्रणेता नहीं मानते थे। उनका मुख्य कार्य परम्परासे प्राप्त
भगवान्‌की द्वादशांग वाणीको संक्षिप्त, विस्तृत या भाषान्तरित कर संकलित कर देना मात्र होता था। वे यह
अच्छी तरहसे जानते थे कि किसी शास्त्रके साथ अपना नाम आदि देनेसे उसकी सर्वग्राह्यता या प्रामाणिकता
नहीं बढ़ती। अधिकतर शास्त्रोंमें स्थल-स्थलपर जिनेन्द्रदेवने ऐसा कहा है१, यह जिनदेवका उपदेश है२, सर्वज्ञ-
देवने जिस प्रकार कहा है उस प्रकार हम कहते हैं३, इन वचनोंके उल्लेखके साथ उनका प्रतिपाद्य विषय चर्चित
होता है। यह क्यों ? इसलिए कि जिससे यह बोध हो कि यह किसी व्यक्तिविशेषका अभिप्राय न होकर
सर्वज्ञदेवकी वाणी या उसका सार है। वस्तुतः किसी शास्त्रके अर्थोपदेष्टा छद्मस्थ न होकर वीतराग सर्वज्ञ
होते हैं। छद्मस्थ गणधर तो उनके अर्थोपदेशको सुनकर उनकी वाणीका ग्रन्थरूपमें संकलनमात्र करते हैं४।
यही संकलन परम्परासे आकर नाना आचार्योंके ज्ञानका विषय होकर अनेक प्रकीर्णक शास्त्रोंको जन्म देता है५।
पूर्वकालीन आचार्य इस तथ्यको उत्तम रीतिसे समझते थे और इसलिए वे नाम रूपके व्यामोहसे मुक्त रहकर
द्वादशांगवाणीके संकलनमें लगे रहते थे। आचार्य पुष्पदन्त, आचार्य भूतबलि, आचार्य गुणधर, आचार्य यति-
वृषभ, आचार्य कुन्दकुन्द, स्वामी समन्तभद्र, आचार्य सिद्धसेन दिवाकर और आचार्य पूज्यपाद प्रभृति ऐसे अनेक
आचार्य हुए हैं जिन्होंने इस मार्गका अनुसरण किया है और भगवान् तीर्थंकरकी वाणीका संकलन कर उसे लोक-
कल्याणके हेतु अर्पित किया है। इतना ही क्यों आचार्य गृद्धपिच्छ भी उन्हींमें से एक हैं जिन्होंने तत्त्वार्थसूत्र जैसे
ग्रन्थरत्नको अवशिष्ट समग्र श्रुतके आधारसे संकलन कर नाम प्रख्यापनके व्यामोहसे अपनेको मुक्त रखा है।
प्राचीन कालमें यह परिपाटी जितनी अधिक व्यापक थी, श्रुतधर आचार्योंका उसके प्रति उतना ही अधिक
आदर था।
इस समय श्रुतधर अनेक आचार्योंके जीवन परिचय और उनके कार्योंके तथ्यपूर्ण इतिहासको संकलित
करनेमें जो कठिनाई आती है उसका कारण यही है। इसे हम कठिनाई शब्दसे इस अर्थमें पुकारते हैं, क्योंकि
यह काल ऐतिहासिक तथ्योंके संकलनका होनेसे इस बातपर अधिक बल दिया जाता है कि कौन आचार्य किस
कालमें हुए हैं, उनका गार्हस्थ्यिक जीवन क्या था और उनके उल्लेखनीय कार्य कौन-कौनसे हैं आदि।
प्रकृतमें हमें तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताके सम्बन्धमें विचार करना है। तत्त्वार्थसूत्रका संकलन आगमिक
दृष्टिसे जितना अधिक सुन्दर और आकर्षक हुआ है उसके रचयिताके विषयमें उतना ही अधिक विवाद है।
जैनसंघकी कालान्तरमें हुई दोनों परम्पराओंके कारण इस विवादको और भी अधिक प्रोत्साहन मिला है।
पहला विवाद तो रचयिताके नामादिके विषयमें है और दूसरा विवाद उनके अस्तित्व कालके विषयमें है।
यहाँ हम सर्वप्रथम उन अभ्रान्त प्रमाणोंको उपस्थित करेंगे जिनसे तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताके निर्णय करनेमें
सहायता मिलती है और इसके बाद विवादके कारणभूत तथ्योंपर प्रकाश डालेंगे।
तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य गृद्धपिच्छ — यह तो हम आगे चल कर देखेंगे कि आचार्य पूज्यपादने विविध
विषयोंपर विशाल साहित्य लिखा है। फिर भी उन्होंने कहीं भी अपने नामका उल्लेख नहीं किया है। इतना
१. 'भणियो खलु सव्वदरसीहिं' समयप्राभूत, गाथा ७० । २. 'एसो जिणोवदेसो' समयप्राभूत, गाथा १५० ।
३. 'सद्दवियारो हूओ भासासुत्तेसु जं जिणे कहियं । सो तह कहियं णायंसीसेण य भद्दबाहुस्स ॥' बोधपाहुड़,
गाथा ६१ । ४. 'तित्थयरभासियत्थं गणहरदेवेहिं गुंथियं सम्मं ।' भावपाहुड, गाथा ९२ । ५. देखो सर्वा०,
अ० १, सू० २० ।

प्रस्तावना ५७
ही नहीं वे तत्त्वार्थसूत्रपर अपनी सर्वार्थसिद्धि टीका लिखते समय भी इसी मार्गका अनुसरण करते हैं ।
वे इसकी उत्थानिकामें यहाँ तक तो निर्देश करते हैं कि कोई भव्य किसी आश्रममें मुनियोंकी सभामें बैठे हुए
आचार्यवर्यके समीप जाकर विनय सहित प्रश्न करता है और उसीके फलस्वरूप तत्त्वार्थसूत्रकी रचना होती है ।
फिर भी वे उन आचार्य आदिके नामादिकके विषयमें मौन रहते हैं । क्यों ? हमें तो इस उपाख्यानसे यही
विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादको परम्परासे तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता आदिके विषयकी इत्थम्भूत जानकारी
होते हुए भी स्वकर्तृत्वकी भावनाका परिहार करनेके अभिप्रायसे वे नामादिकके उल्लेखके पचड़ेमें नहीं पड़े।
भट्ट अकलंकदेवने भी इसी मार्गका अनुसरण किया है । वे भी तत्त्वार्थवार्तिकके प्रारम्भमें उसी उत्थानिकाको
स्वीकार करते हैं जिसका उल्लेख सर्वार्थसिद्धिके प्रारम्भमें आचार्य पूज्यपादने किया है । इसलिए इन
उल्लेखोंसे इस तथ्यपर पहुँचने पर भी कि इन आचार्योंको तत्त्वार्थसूत्रके कतर्कि नामादिककी कुछ-कुछ
जानकारी अवश्य रही है, इससे इस बातका पता नहीं लगता कि आखिर वे आचार्य कौन थे जिन्होंने
भव्य जीवोंके कल्याणार्थ यह महान् प्रयास किया है ।
हम समझते हैं कि भारतीय परम्परामें मुख्यतः जैन परम्परामें नामादिकके उल्लेख न करनेकी यह
परिपाटी विक्रम ४ थी, ५वीं शताब्दी तक बराबर चलती रही है । और कुछ आचार्योंने इसे इसके बाद भी
अपनाया है । इसके बाद कई कारणोंसे इस नीतिमें परिवर्तन होने लगता है और शास्त्रकार शास्त्रके प्रारम्भमें
या अन्तमें अपने नामादिका उल्लेख करने लगते हैं । इतना ही नहीं वे अन्य प्रकारसे अपने पूर्ववर्ती शास्त्र-
कारोंका भी उल्लेख करने लगते हैं। अतएव हमें तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताका ठीक तरहसे निर्णय करनेके लिए
उत्तरकालवर्ती साहित्यका ही आलोडन करना होगा । अतः आइए पहले उत्तरकालवर्ती उन अभ्रान्त प्रमाणों-
को देखें जो इस विषयपर प्रकाश डालते हैं-
१—श्रुतधर आचार्योंकी परम्परामें आचार्य वीरसेन महान् टीकाकार हो गये हैं । इन्होंने षट्खण्डा-
गमपर प्रसिद्ध धवला टीका शक संवत् ७३८ में पूरी की थी । उनकी यह टीका अनेक उल्लेखों और ऐति-
हासिक तथ्योंको लिये हुए है । तत्त्वार्थसूत्रके अनेक सूत्रोंको उन्होंने इस टीकामें उद्धृत किया है । इतना ही
नहीं जीवस्थान काल अनुयोगद्वारमें तो तत्त्वार्थसूत्रकारके नामोल्लेखके साथ भी तत्त्वार्थसूत्रके एक सूत्रको वे
उद्धृत करते हैं । वे कहते हैं-
'तह गिद्धपिंच्छाइरियप्पयासिदतच्चत्थसुत्ते वि वत्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य इदि
दव्वकालो परूविदो ।' मुद्रित पृष्ठ ३१६ ।
इस उल्लेखमें तत्त्वार्थसूत्रको स्पष्टतः गृद्धपिच्छाचार्यके द्वारा प्रकाशित कहा गया है ।
२-आचार्य विद्यानन्द भी महान् श्रुतधर आचार्य थे । इन्होंने अष्टसहस्री, विद्यानन्द महोदय, आप्त-
परीक्षा, प्रमाणपरीक्षा, पत्रपरीक्षा, सत्यशासनपरीक्षा और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आदि अनेक शास्त्रोंका प्रणयन
कर जैन श्रुतकी श्रीवृद्धि की है । इनका वास्तव काल ई० सन् ७७५ ( शक सं० ६९७ ) से ई० सन् ८४०
( शक सं० ७६२ ) तक माना जाता है १। ये तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक मुद्रित पृष्ठ ६ में लिखते हैं-
'एतेन गृद्धपिच्छाचार्यपर्यन्तमुनिश्रेण व्यभिचारता निरस्ता ।'
इस द्वारा आचार्य विद्यानन्द यह सूचित करते हैं कि भगवान् महावीरके शासनमें जो सूत्रकार हुए हैं
उनमें अन्तिम सूत्रकार गृद्धपिच्छ आचार्य थे ।
यद्यपि यह उल्लेख तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य गृद्धपिच्छको ही सूचित करता है फिर भी पं० सुख-
लालजी इस विषयमें सन्देह करते हैं और उन्होंने यह सन्देह स्वलिखित तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृष्ठ १०६-
१०७ में प्रकट किया है । उनका यह सन्देह विशेषतः तर्काश्रित है इसलिए यहाँ हमें प्रथमतः इसपर इसी
दृष्टिसे विचार करना है ।
१. देखो न्यायाचार्य पं० दरबारीलालजी द्वारा सम्पादित और वीरसेवामन्दिरसे प्रकाशित आप्तपरीक्षाकी
प्रस्तावना पृष्ठ ५० ।
८

५८ सर्वार्थसिद्धि
पण्डितजीका तर्क है कि पूर्वोक्त दूसरा कथन तत्त्वार्थाधिगम शास्त्रका मोक्षमार्गविषयक सूत्र सर्वज्ञ
वीतरागप्रणीत है इस वस्तुको सिद्ध करनेवाली अनुमान चर्चामें आया है। इस अनुमान चर्चामें मोक्षमार्ग-
विषयक सूत्र पक्ष है, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीतत्व यह साध्य है और सूत्रत्व यह हेतु है। इस हेतुमें व्यभिचार
दोषका निरसन करते हुए विद्यानन्दने 'एतेन' इत्यादि कथन किया है। व्यभिचार दोष पक्षसे भिन्न स्थलमें
सम्भवित होता है। पक्ष तो मोक्षमार्गविषयक प्रस्तुत तत्त्वार्थसूत्र ही है इससे व्यभिचारका विषयभूत माना
जानेवाला गृद्धपिच्छाचार्यपर्यन्त मुनियोंका सूत्र यह विद्यानन्दकी दृष्टिमें उमास्वातिके पक्षभूत मोक्षमार्गविषयक
प्रथम सूत्रसे भिन्न ही होना चाहिए, यह बात न्यायविद्याके अभ्यासीको शायद ही समझानी पड़े ऐसी है।
पण्डितजीके इस तर्काश्रित वक्तव्यका सार इतना ही है कि, आचार्य विद्यानन्दने यहाँपर जिस गृद्ध-
पिच्छाचार्यपर्यन्त मुनिसूत्रका उल्लेख किया है। वह उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रसे भिन्न ही है।
जहाँ तक पण्डितजीका यह वक्तव्य है उसमें हमें अप्रामाणिकताका दोषारोप नहीं करना है किन्तु
पण्डितजी यदि उक्त अनुमान प्रसंगसे आचार्य विद्यानन्दके द्वारा उठाये गये अवान्तर प्रसंग पर दृष्टिपात करते
तो हमारा विश्वास है कि वे गृद्धपिच्छ आचार्यके सूत्रसे तथाकथित उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रको भिन्न सिद्ध
करनेका प्रयत्न नहीं करते।
आचार्य विद्यानन्द द्वारा उठाया गया वह अवान्तर प्रसंग है गणाधिप, प्रत्येकबुद्ध, श्रुतकेवली और
अभिन्नदशपूर्वीके सूत्र वचनको स्वरचित मानकर व्यभिचारदोषका उद्भावन । स्पष्ट है कि इसमें इस अभिप्रायसे
गृद्धपिच्छाचार्यका तत्त्वार्थसूत्र भी गर्भित है, क्योंकि यहाँपर वह स्वकर्तृकरूपसे सर्वज्ञ वीतरागप्रणीत सूत्रसे
कथञ्चित् ( कर्ता गृद्धपिच्छाचार्य हैं इस दृष्टिसे ) भिन्न मान लिया गया है। प्रकृतमें इस विषयको इन शब्दों
द्वारा स्पष्ट करना विशेष उपयुक्त होगा । प्रस्तुत अनुमानमें प्रकृत सूत्र पक्ष है, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीतत्व
साध्य है, सूत्रत्व हेतु है, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत शेष सूत्र सपक्ष है और बृहस्पति आदिका सूत्र विपक्ष है।
इस अनुमान द्वारा तत्त्वार्थसूत्रको सूत्रत्व हेतु द्वारा सर्वज्ञ वीतराग कर्तृक सिद्ध किया गया है। इससे सिद्ध
है कि यहाँ आचार्य विद्यानन्द तत्त्वार्थसूत्रको गृद्धपिच्छाचार्यकर्तृक मानकर सूत्र सिद्ध नहीं कर रहे हैं।
सूत्रत्वकी दृष्टिसे, यह गृद्धपिच्छाचार्य रचित है इस बातको, वे भूल जाते हैं। वे कहते हैं कि यह सर्वज्ञ
वीतराग प्रणीत है, इसलिए सूत्र है।
फिर भी यदि कोई यह कहे कि यह तत्त्वार्थसूत्र सर्वज्ञ वीतरागप्रणीत न होकर गृद्धपिच्छाचार्य रचित
है तो ऐसी अवस्थामें सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत तत्त्वार्थसूत्रसे कथञ्चित् भिन्न गृद्धपिच्छाचार्य प्रणीत तत्त्वार्थसूत्र
पूर्वके अनुमानमें सपक्षभूत गणधरादि रचित सूत्रोंके समान विपक्ष कोटिमें चला जायेगा और इसमें सूत्रत्व
हेतुके स्वीकार करनेसे हेतु व्यभिचरित हो जायेगा । आचार्य विद्यानन्दने इसी व्यभिचार दोषका उपस्थापन
कर उसका वारण करते हुए फलितांशके साथ यह समग्र वचन कहा है—
'गणाधिपप्रत्येकबुद्धश्रुतकेवल्यभिन्नदशपूर्वधरसूत्रेण स्वयंसंमतेन व्यभिचार इति चेत् ? न,
तस्याप्यर्थतः सर्वज्ञवीतरागप्रणेतृकत्वसिद्धेरर्हद्भाषितार्थं गणधरदेवैर्ग्रथितमिति वचनात् । एतेन गृद्धपिच्छा-
चार्यपर्यन्तमुनिसूत्रेण व्यभिचारता निरस्ता ।'
यहाँ स्वनिर्मित मानकर गणाधिप प्रत्येकबुद्ध, श्रुतकेवली और अभिन्नदशपूर्वीके सूत्रके साथ व्यभिचार
दिखाया गया है । तत्त्वार्थसूत्रको गृद्धपिच्छाचार्य प्रणीत माननेपर भी यह व्यभिचार दोष आता है, क्योंकि
पूर्वोक्त अनुमानमें साध्य गृद्धपिच्छाचार्यका तत्त्वार्थसूत्र न होकर सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत तत्त्वार्थसूत्र साध्य है ।
इसलिए गृद्धपिच्छाचार्यका तत्त्वार्थसूत्र साध्यविरुद्ध होनेसे विपक्ष ठहरता है । हम यह तो मानते हैं कि
तत्त्वार्थसूत्र एक है, दो नहीं पर कर्ताके भेदसे वे दो उपचरित कर लिये गये हैं । एक वह जो सर्वज्ञ वीतराग-
प्रणीत है और दूसरा वह जो गृद्धपिच्छाचार्यप्रणीत है। इसलिए जिस प्रकार गणाधिप आदिके सूत्रके साथ
आनेवाले व्यभिचार दोषका वारण करना इष्ट था उसी प्रकार केवल गृद्धपिच्छाचार्य प्रणीत माननेसे जो
व्यभिचार दोष आता था उसका वारण करना भी आवश्यक था और इसीलिए 'एतेन' इत्यादि वाक्य द्वारा
उस दोषका वारण किया गया है ।
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इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य विद्यानन्द भी वीरसेनस्वामीके समान इसी मतके अनुसर्ता प्रतीत
होते हैं कि तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता आचार्य गृद्धपिच्छाचार्य ही हैं। थोड़ी देरको यदि इस तर्काश्रित पद्धतिको
छोड़ भी दिया जाये और पण्डितजीके मतको ही मुख्यता दी जाये तब भी आचार्य विद्यानन्द 'एतेन' इत्यादि
वाक्य द्वारा तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता गृद्धपिच्छको ही सूचित कर रहे हैं इस मतके माननेमें कोई बाधा नहीं आती,
क्योंकि आचार्य विद्यानन्दने पूर्वोक्त अनुमान द्वारा गृद्धपिच्छाचार्यके तत्त्वार्थसूत्रको तो सूत्र सिद्ध कर ही दिया
था किन्तु इससे पूर्ववर्ती अन्य आचार्योंकी रचनाको सूत्र सिद्ध करना फिर भी शेष था जिसे उन्होंने गृद्ध-
पिच्छाचार्यपर्यन्त अर्थात् गृद्धपिच्छाचार्य हैं अन्तमें जिनके ऐसे अन्य गणाधिप आदि मुनिसूत्रके साथ आनेवाले
व्यभिचारका वारण कर सूत्र सिद्ध कर दिया है। यहाँ अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समासके स्वीकार कर
लेनेसे यह अभिप्राय फलित हो जाता है।

तात्पर्य यह है कि गृद्धपिच्छाचार्यका कोई सूत्रग्रन्थ है इसे तो पं० सुखलालजी भी स्वीकार करते हैं।
उन्हें केवल प्रस्तुत तत्त्वार्थसूत्रको उनका माननेमें विवाद है। किन्तु अन्य ऐतिहासिक तथ्योंसे जब वे तत्त्वार्थ-
सूत्रके कर्ता सिद्ध होते हैं ऐसी अवस्थामें आचार्य विद्यानन्दके उक्त वाक्यका वही अर्थ संगत प्रतीत होता है
जो हमने किया है।

३—आचार्य गृद्धपिच्छका बहुमानके साथ उल्लेख वादिराजसूरिने भी अपने पार्श्वनाथचरितमें किया
है। सम्भवतः ये वही वादिराज सूरि हैं जिन्होंने एकीभावस्तोत्र, यशोधरचरित, काकुस्थचरित और न्याय-
विनिश्चयविवरण लिखा है। इनके विषयमें कहा जाता है—

'वादिराजमनु शाब्दिकलोको वादिराजमनु तार्किकसिंहः ।
वादिराजमनु काव्यकृतस्ते वादिराजमनु भव्यसहायः ।'

वे पार्श्वनाथचरितमें आचार्य गृद्धपिच्छका इन शब्दों द्वारा उल्लेख करते हैं—
“अतुच्छगुणसंघातं गृद्धपिच्छं नतोऽस्मि तम् ।
पक्षीकुर्वन्ति यं भव्या निर्वाणायोत्पतिष्णवः ।”

उन महान् गुणोंके आकर गृद्धपिच्छको मैं नमस्कार करता हूँ जो निर्वाणको उड़कर पहुँचनेकी इच्छा
रखनेवाले भव्योंके लिए पंखोंका काम देते हैं।
यद्यपि वादिराजसूरिने यहाँपर आचार्य गृद्धपिच्छके किसी ग्रन्थका नामोल्लेख नहीं किया है तथापि
यहाँ वे उन्हीं शास्त्रकारोंका स्मरण कर रहे हैं जिन्होंने मोक्षमार्गोपयोगी साहित्यकी सृष्टि कर संसारका हित
किया है। वादिराजसूरिकी दृष्टिमें आचार्य गृद्धपिच्छ उनमें सर्व प्रथम हैं।

इनमेंसे प्रथम दो उल्लेख विक्रमकी नौंवी शताब्दीके और अन्तिम उल्लेख ग्यारहवीं शताब्दीका है।
इससे मालूम पड़ता है कि इस काल तक जैन परम्परामें तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता आचार्य गृद्धपिच्छ हैं एकमात्र
यही मान्यता प्रचलित थी।

अन्य मत—किन्तु इस मतके विरुद्ध तीन चार मत और मिलते हैं जिनकी यहाँ चर्चा कर लेना
प्रासंगिक है।

१—श्वेताम्बर तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें एक प्रशस्ति उपलब्ध होती है। उनमें कहा गया है कि
'जिनके दीक्षागुरु ग्यारह अंग के धारक घोषनन्दि श्रमण थे और प्रगुरु वाचकमुख्य शिवश्री थे, वाचनाकी
अपेक्षा जिनके गुरु मूल नामक वाचकाचार्य और प्रगुरु महावाचक मुण्डपाद थे, जो गोत्रसे कौभीषणि थे और
जो स्वाति पिता और वात्सी माताके पुत्र थे, जिनका जन्म न्यग्रोधिका में हुआ था और जो उच्चानागर शाखाके
थे, उन उमास्वाति वाचकने गुरुपरम्परासे प्राप्त हुए श्रेष्ठ अर्हद्वचनको भली प्रकार धारण करके तथा दुरागम
द्वारा हतबुद्धि दुःखित लोकको देखकर प्राणियोंकी अनुकम्पावश यह तत्त्वार्थाधिगम नामका शास्त्र विहार करते

६० सर्वार्थसिद्धि
हुए कुसुमपुर नामके महानगरमें रचा है। जो इस तत्त्वार्थाधिगमको जानेगा और उसमें कथित मार्गका
अनुसरण करेगा वह अव्याबाध सुख नामके परमार्थको शीघ्र ही प्राप्त करेगा¹।'
इसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्यके प्रारम्भमें जो ३१ उत्थानिका कारिकाएँ उपलब्ध होती हैं उनमेंसे २२वीं
कारिकामें कहा गया है कि 'अर्हद्वचनके एकदेशके संग्रह रूप और बहुत अर्थवाले इस तत्त्वार्थाधिगम नामवाले
लघु ग्रन्थको मैं शिष्योंके हितार्थ कहता हूँ।'
प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी उत्थानिकाकी इस कारिका और अन्तिम प्रशस्तिको विशेष महत्त्व देते
हैं²। वे इन्हें मूल सूत्रकारकी मानकर चलते हैं।
इसके सिवा उन्होंने तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार इनको अभिन्न सिद्ध करनेके लिए दो
युक्तियाँ और दी हैं—
क. 'प्रारम्भिक कारिकाओंमें और कुछ स्थानोंपर भाष्यमें भी 'वक्ष्यामि', 'वक्ष्यामः' आदि प्रथम
पुरुषका निर्देश है और इस निर्देशमें की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार ही बादमें सूत्रमें कथन किया गया है; इससे
सूत्र और भाष्य दोनोंको एककी कृति माननेमें सन्देह नहीं रहता।
ख. शुरूसे अन्ततक भाष्यको देख जानेपर एक बात मनमें बैठती है और वह यह है कि किसी
भी स्थलपर सूत्रका अर्थ करनेमें शब्दोंकी खींचातानी नहीं हुई, कहीं भी सूत्रका अर्थ करनेमें सन्देह या विकल्प
करने में नहीं आया, इसी प्रकार सूत्रकी किसी दूसरी व्याख्याको मनमें रखकर सूत्रका अर्थ नहीं किया गया
और न कहीं सूत्रके पाठभेदका ही अवलम्बन लिया गया है।³
पं० नाथूरामजी प्रेमीका लगभग यही मत है। इस विषयका उनका अन्तिम लेख भारतीय विद्याके
तृतीय भागमें प्रकाशित हुआ है। इन्होंने तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्यको अभिन्नकर्तृक सिद्ध करते समय
पं० सुखलालजीकी उक्त तीनों युक्तियोंको ही कुछ शब्दोंके हेरफेरके साथ उपस्थित किया है। मात्र इन दोनों
विद्वानोंके मतोंमें यदि कुछ अन्तर प्रतीत होता है तो इतना ही कि पं० सुखलालजी वाचक उमास्वातिको
सवस्त्र श्वेताम्बरपरम्पराका और प्रेमीजी यापनीय परम्पराका मानते हैं।
२. श्रवणवेल्गोलाके चन्द्रगिरि पर्वतपर कुछ ऐसे शिलालेख पाये जाते हैं जिनमें गृद्धपिच्छ उमास्वाति-
को तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता कहा गया है। इन शिलालेखोंमेंसे ४०, ४२, ४३, ४७ और ५० वें शिलालेखोंमें गृद्ध-
पिच्छ विशेषणके साथ मात्र उमास्वातिको उल्लेख है और १०५ व १०८ वें शिलालेखोंमें उन्हें तत्त्वार्थसूत्रका
कर्ता कहा गया है। ये दोनों शिलालेख डॉ० हीरालालजीके मतानुसार⁴ क्रमशः शक सं० १३२० और शक
सं० १३५५ के माने जाते हैं। शिलालेख १५५ का उद्धरण इस प्रकार है—
'श्रीमानुमास्वातिरथं यतीशस्तत्त्वार्थसूत्रं प्रकटीचकार।
यन्मुक्तिमार्गाचरणोद्यतानां पाथेयमर्घ्यं भवति प्रजानाम् ॥१५॥
तस्यैव शिष्योऽजनि गृद्धपिच्छद्वितीयसंज्ञस्य बलाकपिच्छः।
यत्सूक्तिरत्नानि भवन्ति लोके मुक्त्यंगनामोहनमण्डनानि ॥१६॥'
यतियोंके अधिपति श्रीमान् उमास्वातिने तत्त्वार्थसूत्रको प्रकट किया जो मोक्षमार्गके आचरणमें उद्यत
हुए प्रजा जनोंके लिए उत्कृष्ट पाथेयका काम देता है। गृद्धपिच्छ है दूसरा नाम जिनका ऐसे उन्हीं उमास्वाति-
के एक शिष्य बलाकपिच्छ थे। जिनके सूक्तिरत्न मुक्त्यंगनाके मोहन करनेके लिए आभूषणोंका काम देते हैं।
१. देखो तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति। २. देखो उनके द्वारा लिखित तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रस्तावना । ३. पं० सुखलालजीके तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना, पृष्ठ २१ । ४. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे
प्रकाशित शिला-लेख संग्रह, भाग १ ।

प्रस्तावना ६१
शिलालेख १०८ में इसी बातको इस प्रकार लिपिबद्ध किया गया है—
‘अभूदुमास्वातिमुनिः पवित्र वंशे तदीये सकलार्थवेदी।
सूत्रीकृतं येन जिनप्रणीतं शास्त्रार्थजातं मुनिपुङ्गवेन ॥११॥’
‘स प्राणिसंरक्षणसावधानो बभार योगी किल गृद्धपक्षान्।
तदा प्रभृत्येव बुधा यमाहुराचार्यशब्दोत्तरगृद्धपिच्छम् ॥२२॥’
तत्त्वार्थसूत्रपर विभिन्न समयोंमें छोटी-बड़ी टीकाएँ तो अनेक लिखी गयी हैं पर उनमेंसे विक्रमकी
१३वीं शतीके विद्वान् बालचंद$^१$ मुनिकी बनायी हुई एक ही कनडी टीका है जिसमें उमास्वाति नामके साथ
गृद्धपिच्छाचार्य नाम भी दिया है।
पं० जुगुलकिशोरजी मुख्तार कर्ता विषयक इसी मतको प्रमाण मानकर चलते हैं। उन्होंने गृद्धपिच्छ-
को उमास्वातिको ही नामान्तर कहा है।$^२$
३. दिगम्बर परम्परामें मूल तत्त्वार्थसूत्रकी जो प्रतियाँ उपलब्ध होती हैं, उनके अन्तमें एक श्लोक
आया है—
'तत्त्वार्थसूत्रकर्तारं गृद्धपिच्छोपलक्षितम्।
वन्दे गणीन्द्रसंजातमुमास्वामिमुनीश्वरम् ॥’
इसमें गृद्धपिच्छसे उपलक्षित उमास्वामी मुनीश्वरको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता बतलाकर उन्हें गणीन्द्र
कहा गया है।
४. नगर ताल्लुकेके एक शिलालेखमें यह उल्लेख उपलब्ध होता है—
‘तत्त्वार्थसूत्रकर्तारमुमास्वातिमुनीश्वरम्।
श्रुतकेवलिदेशीयं वन्देऽहं गुणमन्दिरम् ॥’
इसमें तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताका नाम उमास्वाति बतलाया है और उन्हें श्रुतकेवलिदेशीय तथा गुणमन्दिर
कहा गया है।
५. आचार्य कुन्दकुन्दने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की है ऐसा भी उल्लेख देखनेमें आता है जो तत्त्वार्थसूत्र-
की अन्यतम टीका अर्हत्सूत्रवृत्तिका है। तत्त्वार्थसूत्रके एक श्वेताम्बर टिप्पणकार भी इस मतसे परिचित थे,
उन्होंने अपने टिप्पणमें इस मतका उल्लेख कर अपने सम्प्रदायको सावधान करनेका प्रयत्न किया है।$^३$
समीक्षा— इस प्रकार ये पाँच अन्य मत हैं जिनमें तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता कौन हैं इस बातका विचार
किया गया है। इनमेंसे प्रारम्भके तत्त्वार्थभाष्यके उल्लेखको छोड़कर शेष सब उल्लेख लगभग १३वीं
शताब्दीसे पूर्वके नहीं हैं और मुख्यतया वे गृद्धपिच्छ और उमास्वाति इन दो नामोंकी ओर ही किसी रूपमें
संकेत करते हैं।$^४$ एक अन्तिम मत कि आचार्य कुन्दकुन्द तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता हैं अवश्य ही विलक्षण
लगता है किन्तु आचार्य कुन्दकुन्दकी गृद्धपिच्छ इस नामसे ख्याति होनेके कारण ही यह मत प्रसिद्धिमें आया है
ऐसा प्रतीत होता है।$^५$ मुख्य मत दो ही हैं जो यहाँ विचारणीय हैं। प्रथम यह कि आचार्य गृद्धपिच्छ तत्त्वार्थ-
सूत्रके रचयिता हैं और दूसरा यह कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की है।
साधारणतः हम पहले 'तत्त्वार्थसूत्र' इस नामके विषयमें विचार करते हुए 'सूत्रपाठोंमें मतभेद' प्रकरण-
को लिखते हुए और 'पौर्वापर्यविचार' प्रकरण द्वारा सर्वार्थसिद्धि व तत्त्वार्थभाष्य की तुलना करते हुए कई
महत्त्वपूर्ण बातोंपर प्रकाश डाल आये हैं जिनका सारांश इस प्रकार है—
१. वाचक उमास्वातिने तत्त्वाथाधिगम शास्त्रकी रचना की थी। किन्तु यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न
हो कर तत्त्वार्थभाष्यका है।
१. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीका तत्त्वार्थसूत्र, प्रस्तावना पृ० १६। २. देखो मा० ग्र० से प्रकाशित रत्नकरण्डक
की प्रस्तावना, पृष्ठ १४५। ३. पं० कैलाशचन्द्रजीका तत्त्वार्थसूत्र, प्रस्तावना पृ० १७। ४. इसके लिए देखो
हमारे द्वारा लिखे गये तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना। ५. देखो प्रवचनसारकी डॉ० ए० एन० उपाध्येकी भूमिका।

६२ सर्वार्थसिद्धि
२. सूत्रपाठोंमें मतभेदका उल्लेख करते समय यह सिद्ध करके बतलाया गया है कि यदि तत्त्वार्थसूत्र
और तत्त्वार्थभाष्यके कर्ता एक ही व्यक्ति होते और श्वेताम्बर आचार्य इस तथ्यको समझते होते तो श्वेताम्बर
सूत्रपाठमें जितना अधिक मतभेद उपलब्ध होता है वह नहीं होना चाहिए था ।
३. सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यके पौर्वापर्यका विचार करते समय हम बतला आये हैं कि वाचक
उमास्वातिके तत्त्वार्थभाष्य लिखे जानेके पहले ही तत्त्वार्थसूत्रपर अनेक टीका-टिप्पणियाँ प्रचलित हो गयी थीं।
वहाँ हमने एक ऐसे सूत्रका भी उल्लेख किया है जो सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठसे सम्बन्ध रखता है और जिसे
वाचक उमास्वातिने अपने तत्त्वार्थभाष्यमें उद्धृत किया है। अर्थविकासकी दृष्टिसे विचार करते हुए इसी
प्रकरणमें यह भी बतलाया गया है कि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यको सामने रख कर विचार करनेपर यह
स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसे कई प्रसंग हैं जो तत्त्वार्थभाष्यको सर्वार्थसिद्धिके बादकी रचना ठहराते हैं।
और यह सिद्ध करते समय हमने एक उदाहरण यह भी दिया है कि कालके उपकार प्रकरणमें परत्वा-
परत्वके सर्वार्थसिद्धिमें केवल दो भेद किये गये हैं जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें वे तीन उपलब्ध होते हैं।
इसलिए इन व दूसरे तथ्योंसे यह स्पष्ट हो जानेपर भी कि वाचक उमास्वाति आद्य सूत्रकार नहीं
होने चाहिए, इस विषयके अन्तिम निर्णयके लिए कुछ अन्य बातोंपर भी दृष्टिपात करना है।
किसी भी रचयिताके सम्प्रदाय आदिका निर्णय करनेके लिए उस द्वारा रचित शास्त्र ही मुख्य प्रमाण
होता है। किसी भी शास्त्रमें कुछ ऐसे बीज होते हैं जो उस शास्त्रके रचनाकाल व शास्त्रकारके सम्प्रदाय
आदिपर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। तत्त्वार्थसूत्रकारके समयादिकका विचार करते समय प्रज्ञाचक्षु पं० सुख-
लालजीने भी इस सरणिको¹ अपनाया है। किन्तु वहाँ उन्होंने तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इन दोनोंको
एककर्तृक मानकर इस बातका विचार करनेका प्रयत्न किया है। इससे बहुत बड़ा घोटाला हुआ है। वस्तुतः
इस बातका विचार केवल तत्त्वार्थसूत्रको और उसमें भी तत्त्वार्थसूत्रके उन सूत्रोंको सामने रखकर ही होना
चाहिए जो तत्त्वार्थसूत्रमें दोनों सम्प्रदायोंको मान्य हों। इससे निष्पक्ष समीक्षा द्वारा किसी एक निर्णयपर
पहुँचनेमें बहुत बड़ी सहायता मिलती है।
चार सूत्र—यह तो स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रके दो सूत्रपाठ हो जानेपर भी अधिकतर सूत्र ऐसे हैं जो
दोनों सम्प्रदायोंको मान्य हैं और उनमें भी कुछ ऐसे सूत्र अपने मूलरूपमें रहे आये हैं जिनसे रचयिताकी स्थिति
आदिपर प्रकाश पड़ता है। यहाँ हम इस विचारणामें ऐसे सूत्रोंमेंसे मुख्य चार सूत्रोंको उपस्थित करते हैं—
प्रथम तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धके कारणोंका प्रतिपादक सूत्र, दूसरा बाईस परीषहोंका प्रतिपादक सूत्र, तीसरा
केवली जिनके ग्यारह परीषहोंके सद्भावका प्रतिपादक सूत्र और चौथा एक जीवके एक साथ कितने परीषह
होते हैं इसका प्रतिपादक सूत्र।
१. तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धके कितने कारण हैं इसका उल्लेख दोनों परम्पराओंके मूल आगम करते
हैं। दिगम्बर परम्पराके बंधसामित्तविचयंमें वे ही सोलह कारण उल्लिखित हैं जो लगभग तत्त्वार्थसूत्रमें उसी
रूपमें स्वीकार किये गये हैं। तुलनाके लिए देखिए—
दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ भक्तितस्त्यागतपसो
साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिमार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति
तीर्थंकरत्वस्य ॥ —तत्त्वार्थसूत्र ७,२४ ।
दंसणविसुज्झिदाए विणयसंपण्णदाए सीलव्वदेसु णिरदिचारदाए आवासेसु अपरिहीणदाए खण-
लवपडिवुज्झणदाए लद्धिसंवेगसंपण्णदाए जधा थामे तथा तवे साहूणं पासुअपरिचागदाए साहूणं समाहि-
संधारणाए साहूणं वेज्जावच्चजोगजुत्तदाए अरहंतभत्तीए बहुसुदमत्तीए पवयणमत्तीए पवयणवच्छलदाए
पवयणप्पभावणदाए अमिक्खणं अमिक्खणं णाणोवजोगजुत्तदाए इच्छेदेहि सोलसेहि कारणेहिं जीवा
तित्थयरणामगोदं कम्मं बंधंति । —बंधसामित्तविचय ७ सु० ४१ ।
१. देखो पं० सुखलालजी द्वारा लिखित तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना, पृ० ८ आदि ।

किन्तु श्वेताम्बर परम्परा १६ के स्थानोंमें २० कारण स्वीकार करती है। वहां ज्ञातृधर्मकथा नामक
अंगके आठवें अध्यायमें इन कारणोंका निर्देश इन शब्दोंमें किया है—
'अरहंत-सिद्धि-पवयण गुरु-थेर-बहुस्सुए तवस्सीसुं।
वच्छलया य तेसिं अमिक्खं णाणोवओगे य ॥ १ ॥
दंसणविणए आवस्सए य सीलव्वए निरह्यारं।
खणलुव तवच्चिच्चाए वेयावच्चे समाही य ॥ २ ॥
अपुव्वणाणगहणे सुयमत्ती पवयणे पभावणया।
एएहिं कारणेहिं तित्थयरत्तं लहइ जीवो ॥ ३ ॥'
यहाँ तत्त्वार्थसूत्रकी दो बातें ध्यान देने योग्य हैं—प्रथम बात तो १६ संख्याका निर्देश और दूसरी बात
शब्दसाम्य। इस विषयमें तत्त्वार्थसूत्रका उक्त सूत्र दिगम्बर परम्पराके जितने अधिक नजदीक है उतना
श्वेताम्बर परम्पराके नजदीक नहीं है।
२. दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराएं २२ परीषहोंको स्वीकार करती हैं। तत्त्वार्थसूत्रमें
इनका प्रतिपादन करनेवाला जो सूत्र है¹ उसमें एक परीषहका नाम 'नाग्न्य' है। देखना यह है कि यहाँ तत्त्वार्थ-
सूत्रकारने नाग्न्य शब्दको ही क्यों स्वीकार किया है। क्या इस शब्दका स्वीकार श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार
आगम सम्मत हो सकता है। श्वेताम्बर परम्पराके आगममें 'नाग्न्य' परीषहके स्थानमें सर्वत्र 'अचेल' परी-
षहका उल्लेख मिलता है² जो उस सम्प्रदायके अनुरूप है; क्योंकि अचेल शब्दमें 'नञ्' समास होनेसे उस
सम्प्रदायके अनुसार इस शब्दके 'वस्त्रका अभाव और अल्प वस्त्र' ये दोनों ही अर्थ फलित हो जाते हैं। परन्तु
इस प्रकार 'नाग्न्य' शब्दसे इन दोनों अर्थोंको फलित नहीं किया जा सकता है। नग्न यह स्वतन्त्र शब्द है
और इस शब्दका 'वस्त्रके आवरणसे रहित' एकमात्र यही अर्थ होता है। स्पष्ट है कि यह २२ परीषहोंका
प्रतिपादन करनेवाला सूत्र भी जितना अधिक दिगम्बर परम्पराके नजदीक है उतना श्वेताम्बर परम्पराके
नजदीक नहीं है।
३. बाईस परीषहोंमेंसे एक साथ एक जीवके कितने परीषह हो सकते हैं इसका विचार करते हुए
श्वेताम्बर आगम साहित्य (व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ८)¹ में बतलाया है कि सात और आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध
करनेवाले जीवके २२ परीषह होते हैं। परन्तु ऐसा जीव एक साथ बीस परीषहोंका ही वेदन करता है।
दो कौनसे परीषह कम हो जाते हैं इस बातका उल्लेख करते हुए वहाँ बतलाया है कि जिस समय वह जीव
शीत परीषहका वेदन करता है उस समय वह उष्ण परीषहका वेदन नहीं करता और जिस समय उष्ण परी-
षहका वेदन करता है उस समय वह शीत परीषहका वेदन नहीं करता। इस प्रकार एक परीषह तो यह कम
हो जाता है। तथा जिस समय चर्या परीषहका वेदन करता है उस समय निषद्यापरीषहका वेदन नहीं करता
और जिस समय निषद्या परीषहका वेदन करता है उस समय चर्या परीषहका वेदन नहीं करता। इस प्रकार
एक परीषह यह कम हो जाता है। कुल बीस परीषह रहते हैं जिनका वेदन यह जीव एक साथ करता है।
किन्तु तत्त्वार्थसूत्रमें परीषहोंके एक साथ वेदन करनेकी अधिकसे अधिक संख्या १९ निश्चित की गयी
है³। यहाँ हमें युक्तिसंगत क्या है इसका विचार नहीं करना है। बतलाना केवल इतना ही है कि तत्त्वार्थ-
सूत्रकारका इस प्रकारका निर्देश भी श्वेताम्बर आगम परम्पराका अनुसरण नहीं करता।
४. 'जिनके ग्यारह परीषहं होते हैं' इस सूत्रका विस्तारके साथ विचार हम 'पाठभेद और अर्थान्तर-
न्यास' प्रकरणमें⁴ कर आये हैं। वहाँ हमने तत्त्वार्थसूत्रकारकी दृष्टिको स्पष्ट करते हुए बतलाया है कि परीषहों
के प्रसंगसे सूत्रकारकी दृष्टि मुख्यतया अन्तरंग कारणोंके विवेचन करनेकी रही है। वे किस कर्मके उदयमें
कितने परीषह होते हैं इतना कहकर अधिकारी भेदसे अलग-अलग परीषहोंकी संख्याका निर्देश करते हैं। पर
१. देखो, अ० ९ सू० ९ । २. समवायांग समवाय २२ व भगवती सूत्र ८, ८ । ३. तत्त्वार्थसूत्र अ० ९,
सू० १७ । ४. देखो, पृ० २५ आदि ।

६४ सर्वार्थसिद्धि
इसका यह अर्थ नहीं कि अन्तरंग कारणोंके अनुसार जहाँ जितने परीषहोंका उल्लेख उन्होंने किया है वहाँ
उतने परीषहोंका सद्भाव वे नियमसे मानते ही हैं। उन्होंने परीषह प्रकरणके अन्तिम सूत्रमें परीषहोंका कार्यके
अनुसार भी अलगसे विधान किया है। वे कहते हैं कि यद्यपि कुल परीषह बाईस हैं तथापि एक जीवके एक
साथ एकसे लेकर उन्नीस तक परीषह हो सकते हैं। स्पष्ट है कि इस अन्तिम सूत्रके प्रकाशमें यह अर्थ नही
फलित किया जा सकता है कि जिस प्रकार तत्त्वार्थसूत्रकारने अधिकारी भेदसे कहाँ कितने परीषह होते हैं
इस बातका विधान किया है उसी प्रकार उन्हें सर्वत्र उनका कार्य भी इष्ट है। इसका तो केवल इतना ही
अर्थ है कि अन्तरंग कारणोंके अनुसार सर्वत्र परीषहोंकी सम्भावना स्वीकार कर लेने पर भी यदि उन
परीषहोंके जो अन्य बाह्य निमित्त हैं वे नहीं मिलते तो एक भी परीषह नहीं होते। तभी तो सूत्रकार १ परी-
षहसे लेकर १९ परीषह तक होने रूप विकल्पका कथन करते हैं। यथा किसी प्रमत्तसंयत साधुके सब कर्मोंका
उदय होनेसे सब परीषह सम्भव हैं पर उनके परषहोंके बाह्य निमित्त एक भी नहीं हैं तब उन्हें एक भी
परीषहका वेदन न होगा। यदि एक परीषहका बाह्य निमित्त है तो एक परीषहका वेदन होगा और अधिक
परीषहोंके बाह्य निमित्त उपस्थित हैं तो अधिक परीषहोंका वेदन होगा। तात्पर्य यह है कि केवल अन्तरंग
कारणोंके सद्भावसे परीषहोंका वेदन कार्य नहीं माना जा सकता। स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रकारकी दृष्टि केवल
अन्तरंग कारणोंके सद्भावमें उनके कार्यको स्वीकार करनेकी नहीं है। उन्होंने तो मात्र अन्तरंग कारणोंकी
दृष्टिसे सर्वत्र उनका उल्लेखमात्र किया है।
इस दृष्टिसे हमने श्वेताम्बर आगम साहित्यका आलोडन किया है। किन्तु वहाँ तत्त्वार्थसूत्रकारकी
दृष्टिसे सर्वथा भिन्न दृष्टि अपनायी गयी प्रतीत होती है। वहाँ जहाँ जितने परीषह सम्भव हैं उनमेंसे विरोधी
परीषहोंको छोड़कर सबके वेदनकी बात स्वीकार की गयी है। वहाँ यह स्वीकार ही नहीं किया गया है कि
कोई एकका वेदन करता है, कोई दो का और कोई अधिकसे अधिक इतनेका वेदन करता है। वहाँ तो एक
मात्र यही बतलाया गया है कि 'जो सात या आठ कर्मोंका बन्ध करते हैं उनके सब परोषह सम्भव हैं परन्तु
वे एक साथ वेदन मात्र बीसका करते हैं। जो छह कर्मका बन्ध करते हैं उनके चौदह परीषह सम्भव हैं
परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका करते हैं। जो वीतराग छद्मस्थ एक कर्मका बन्ध करते हैं उनके भी
चौदह परीषह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका ही करते हैं। जो एक कर्मका बन्ध करनेवाले
सयोगी जिन हैं उनके परीषह तो ग्यारह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र नौका करते हैं। तथा जो
अबन्धक अयोगी जिन हैं उनके भी परीषह तो सयोगी जिनके समान ग्यारह ही सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ
वेदन मात्र नौका करते हैं ।¹
इसलिए यहाँ भी तत्त्वार्थसूत्र और श्वेताम्बर आगम साहित्यके तुलनात्मक अध्ययनसे हम इसी
निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'एकादश जिने' सूत्रका विधान करते हुए भी तत्त्वार्थसूत्रकार जितने अधिक दिगम्बर
परम्पराके नजदीक हैं उतने श्वेताम्बर परम्पराके नजदीक नहीं।
यह है तत्त्वार्थसूत्रके कुछ सूत्रोंका परीक्षण जिससे भी हमें इस बातके निर्णय करनेमें सहायता मिलती
है कि तत्त्वार्थसूत्रकार वाचक उमास्वातिसे भिन्न होने चाहिए।
किन्तु दिगम्बर परम्परामें उमास्वाति या उमास्वामी नामके कोई आचार्य हुए हैं इस बातका सूचक
कोई प्राचीन उल्लेख नहीं मिलता। श्रवणवेलगोलाके शिलालेख या दूसरे जितने भी प्रमाण मिलते हैं वे सब
उन उल्लेखोंसे जो तत्त्वार्थसूत्रको आचार्य गृद्धपिच्छकी कृति प्रकट करते हैं, बादके हैं, अतएव इस मामलेमें
उनका उतना विश्वास नहीं किया जा सकता ।
सिद्धसेनीय टीका—पं० सुखलालजीने अपने तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावनामें सिद्धसेन गणि और हरि-
भद्रसूरिकी टीकासे एक दो उल्लेख उपस्थित कर² यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि तत्त्वार्थसूत्रकार
और उनके भाष्यकार एक ही व्यक्ति हैं किन्तु वे उल्लेख सन्देहास्पद हैं। उदाहरणार्थ सिद्धसेन गणिकी टीकामें
१. व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ८ । २. देखो उनके तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृष्ठ १७ की टिप्पणी १ ।

सातवें अध्यायके अन्तमें जो पुष्पिका उपलब्ध होती है उसमें आये हुए 'उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये'
पदको पण्डितजी भाष्यकार और सूत्रकार एक व्यक्ति हैं इस पक्षमें लगाने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इस पदका
सीधा अर्थ है—उमास्वाति वाचक द्वारा बनाया हुआ सूत्रभाष्य । यहाँ उमास्वातिवाचकोपज्ञ पदका सम्बन्ध
सूत्रसे न होकर उसके भाष्यसे है। दूसरा प्रमाण पण्डितजीने ९वें अध्यायके २२वें सूत्रकी सिद्धसेनीय टीकाको
उपस्थित किया है। किन्तु यह प्रमाण भी सन्देहास्पद है, क्योंकि सिद्धसेन गणिकी टीकाकी जो प्राचीन प्रतियाँ
उपलब्ध होती हैं उनमें 'स्वकृतसूत्रसन्निवेशमाश्रित्योक्तम्' पाठके स्थानमें 'कृतस्तत्र सूत्रसन्निवेशमाश्रित्यो-
क्तम्' पाठ भी उपलब्ध होता है¹। बहुत सम्भव है कि किसी लिपिकारने तत्त्वार्थसूत्रका वाचक उमास्वाति
कर्तृत्व दिखलानेके अभिप्रायसे 'कृतस्तत्र'का संशोधन कर 'स्वकृत' पाठ बनाया हो और बादमें यह पाठ
चल पड़ा हो ।
साधारणतः हमने स्वतन्त्र भावसे सिद्धसेन गणिकी टीकाका आलोडन किया है, इसलिए इस आधारसे
हम यह तो मान लेते हैं कि उसमें कुछ ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जो तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इनको
एककर्तृक सिद्ध करते हैं। उनमेंसे प्रथम उल्लेख प्रथम अध्यायके 'आद्ये परोक्षम्' सूत्रकी सिद्धसेनीय टीका है।
यहाँ पर सिद्धसेन गणि तत्त्वार्थभाष्यके 'सूत्रक्रमप्रामाण्यात् प्रथमद्वितीये शास्ति' अंशकी व्याख्या करते हुए
कहते हैं ।
'ग्रन्थकार एव द्विधा आत्मानं विभज्य सूत्रकारभाष्यकारेणेवमाह—शास्तीति सूत्रकार इति शेषः ।'
अथवा पर्यायभेदात् पर्यायिणो भेद इत्यन्यः सूत्रकारपर्यायोऽन्यश्च भाष्यकारपर्याय इत्यतः सूत्रकारपर्यायः
शास्तीति ।'
इसमें बतलाया गया कि 'ग्रन्थकारने अपनेको सूत्रकार और भाष्यकार इस तरह दो भागोंमें विभक्त कर
'शास्ति' ऐसा कहा है। इसलिए यहाँपर 'शास्ति' क्रियाके साथ उसके कर्त्ताका बोध करानेके लिए 'सूत्रकारः'
पद जोड़ लेना चाहिए। अथवा पर्यायोके भेदसे पर्यायिको भिन्न मान लेना चाहिए। अतः एक ही ग्रन्थकारकी
सूत्रकार पर्याय भिन्न है और भाष्यकार पर्याय भिन्न है, अतः सूत्रकार पर्याय कहती है ऐसा सम्बन्ध कर
लेना चाहिए।
ऐसा ही एक दूसरा उल्लेख अध्याय दोके 'निरुपभोगमन्त्यम्' सूत्रकी सिद्धसेनीय टीकामें मिलता है।
इसमें सूत्रकारसे भाष्यकारको अभिन्न बतलाया गया है। उल्लेख इस प्रकार है—
'सूत्रकारादविभक्तोऽपि हिं भाष्यकारो विभागमदर्शयति व्युच्छित्ति- (पर्याय ) नयसमाश्रयणात् ।'
इस प्रकार यद्यपि इन उल्लेखोंसे यह विदित होता है कि सिद्धसेन गणि तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थ-
भाष्यकार इन दोनों व्यक्तियोंको एक मानते रहे हैं पर इतने मात्रसे यह नहीं माना जा सकता कि यह उनका
निश्चित मत था। उन्होंने अपनी टीकामें कुछ ऐसा भी अभिप्राय व्यक्त किया है जिसके आधारसे विचार
करने पर सूत्रकारसे भाष्यकार भिन्न सिद्ध होते हैं। इसके लिए अध्याय आठके 'मत्यादीनाम्' सूत्रकी टीका
देखना चाहिए ।
यहाँ पर सिद्धसेन गणिके सामने यह प्रश्न है कि जब अन्य आचार्य 'मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम्'
सूत्र मानते हैं तब सूत्रका वास्तविक रूप 'मत्यादीनाम्' माना जाय या अन्य आचार्य जिस प्रकार उसका पाठ
पढ़ते हैं वैसा माना जाय । इस शंकाका समाधान करते हुए पहले तो उन्होंने हेतुओंका आश्रय लिया है किन्तु
इतने मात्रसे स्वयं सन्तोष होता न देख वे कहते हैं कि यतः भाष्यकारने भी इस सूत्रका इसी प्रकार अर्थ
किया अतः 'मत्यादीनाम्' ही सूत्र होना चाहिए। उनका समस्त प्रसंगको व्यक्त करनेवाला टीकावचन इस
प्रकार है—
'अपरे तु प्रतिपदं पञ्चापि पठन्ति - मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानामिति । एवं चापार्थकः पाठो
१. देखो सिद्धसेनीय टीका अ० ९, सू० २२, पृ० २५३ की टिप्पणी ।
९

लक्ष्यते । ततोऽनन्तरसूत्रे पञ्चादिभेदा ज्ञानावरणादय इत्यवधृतमेव । निर्ज्ञाताश्च स्वरूपतः प्रथमाध्याये
व्याख्यातत्वात् । अतः आदिशब्द एव च युक्तः । भाष्यकारोऽप्येवमेव सूत्रार्थमावेदयते ।'
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य 'भाष्यकारो-' इत्यादि वचन है । इस वचनमें भाष्यकारका सम्बन्ध सीधा
'मत्यादीनाम्' सूत्रकी रचनाके साथ स्थापित न कर उसके अर्थके साथ स्थापित किया गया है । इससे सिद्ध
होता है कि यहाँपर सिद्धसेन गणि सूत्रकारको भाष्यकारसे भिन्न मान रहे हैं, अन्यथा वे किसी अपेक्षासे सूत्र-
कार और भाष्यकारमें अभिन्नता स्थापित कर ऐसी भाषाद्वारा समर्थन करते जिससे भाष्यकारसे अभिन्न सूत्र-
कारने ही 'मत्यादीनाम्' सूत्र रचा है इस बातका दृढ़ताके साथ समर्थन होता ।
जहाँ तक हमारा मत है इन पूर्वोक्त उल्लेखोंके आधारसे हम एक मात्र इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
कि मूल तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार अभिन्न व्यक्ति हैं इस विषयमें सिद्धसेन गणिकी स्थिति संशया-
पन्न रही है, क्योंकि कहीं वे तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार इनको एक व्यक्ति मान लेते हैं और कहीं
दो । इस स्थितिको देखते हुए मालूम ऐसा देता है कि सिद्धसेन गणिके काल तक तत्त्वार्थभाष्यकार ही मूल
तत्त्वार्थसूत्रकार हैं यह मान्यता दृढ़मूल नहीं हो पायी थी । यही कारण है कि सिद्धसेन गणि किसी एक मतका
निश्चयपूर्वक प्रतिपादन करनेमें असमर्थ रहे ।
पण्डितजी—इस प्रकार सिद्धसेन गणिकी टीकाके आधारसे वाचक उमास्वाति तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता
हैं इस बातके अनिर्णीत हो जाने पर भी यहाँ हमें प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीके एतद्विषयक प्रमाणोंका अलगसे
परामर्श कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है । इस विषयमें उन्होंने जिन तीन प्रमाणोंको उपस्थित किया है
उनका हम पहले पृष्ठ ६२ में निर्देश कर आये हैं । उनमेंसे पहला प्रमाण उत्थानिकाकी २२वीं कारिका और
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति है । इन दोनों स्थलोंमेंसे उत्थानिका कारिकामें तत्त्वार्थाधिगम
नामक लघुग्रन्थके कहनेकी प्रतिज्ञा की गयी है और अन्तिम प्रशस्तिमें वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थाधिगम शास्त्र
रचा यह कहा गया है । पण्डितजी इस आधारसे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता वाचक
उमास्वाति ही हैं । किन्तु हम यह पहले ( पृष्ठ १७ में ) ही सिद्ध करके बतला आये हैं कि तत्त्वार्थाधिगम
यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न होकर तत्त्वार्थभाष्यका है । स्वयं वाचक उमास्वाति तत्त्वार्थाधिगमको सूत्र न कह-
कर उसे ग्रन्थ या शास्त्र¹ शब्द द्वारा सम्बोधित करते हैं और आगे तत्त्वार्थाधिगमके रचनेका प्रयोजन बतलाते
हुए २२वीं उत्थानिका कारिकामें कहते हैं कि जिन वचन महोदधि दुर्गमग्रन्थभाष्यपार² होनेसे उसका
समझना कठिन है । ऐतिहासिकोंसे यह छिपी हुई बात नहीं है कि यहाँ वाचक उमास्वातिने आगम ग्रन्थोंके
जिन भाष्योंका उल्लेख किया है वे विक्रमकी ७वीं शताब्दीकी रचना हैं³ । जब कि इनके भी पूर्व तत्त्वार्थसूत्र
पर सर्वार्थसिद्धि प्रभृति अनेक टीकाएँ लिखी जा चुकी थीं । ऐसी अवस्थामें २१वीं उत्थानिका कारिका और
अन्तिम प्रशस्तिके आधारसे वाचक उमास्वातिको मूल तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता सिद्ध करना तो कोई अर्थ
नहीं रखता ।
पण्डितजी की दूसरो युक्तिमें कहा गया है कि तत्त्वार्थभाष्यके आलोडनसे ऐसा लगता है कि
तत्त्वार्थभाष्यमें सूत्रका अर्थ करनेमें कहीं भी खीचातानी नहीं की गयी है आदि । यहाँ विचार इस बातका
करना है कि क्या तत्त्वार्थभाष्यकी वैसी स्थिति है जैसी कि पण्डितजी उसके विषयमें उद्घोषणा करते हैं । इस
दृष्टिसे हमने भी तत्त्वार्थभाष्यका आलोडन किया है किन्तु हमें उसमें ऐसे अनेक स्थल दिखाई देते हैं जिनके
कारण इस दृष्टिसे तत्त्वार्थभाष्यकी स्थिति सन्देहास्पद प्रतीत होती है । यथा—
१ तत्त्वार्थसूत्रमें सम्यग्दर्शनीसे सम्यग्दृष्टिको भिन्न नहीं माना गया है । वहाँ अध्याय ७ सूत्र २३ में
ऐसे सम्यग्दर्शनवालेको भी सम्यग्दृष्टि कहा गया है जिसके शंका आदि दोष सम्भव होते हैं । किन्तु इसके
१. देखो उत्थानिका कारिका २१ व अन्तिम प्रशस्ति तत्त्वार्थभाष्य । २. महतोऽतिमहाविषयस्य दुर्गमग्रन्थ-
भाष्यपारस्य । कः शक्तो प्रत्यासं जिनवचनमहोदधेः कर्तुम् ।। ३. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीके तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रस्तावना पृ० १२ ।

प्रस्तावना ६७
विपरीत तत्त्वार्थभाष्यमें सम्यग्दर्शनी और सम्यग्दृष्टि इन दोनों पदोंकी स्वतन्त्र व्याख्या करके सम्यग्दर्शनीसे
सम्यग्दृष्टिको भिन्न बतलाया गया है । वहाँ कहा गया है कि जिसके आभिनिबोधिक ज्ञान होता है वह सम्य-
ग्दर्शनी कहलाता है और जिसके केवलज्ञान होता है वह सम्यग्दृष्टि कहलाता है ।$^१$ स्पष्ट है कि यहाँ पर
तत्त्वार्थभाष्यकार तत्त्वार्थसूत्रका अनुसरण नहीं करते और सम्यग्दृष्टिपदकी तत्त्वार्थसूत्रके विरुद्ध अपनी दो
व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं । एक स्थल ( अ० १ सू० ८) में वे जिस बातको स्वीकार करते हैं दूसरे (अ०
७ सू० २३ ) में वे उसे छोड़ देते हैं ।
२. तत्त्वार्थसूत्रमें मति, स्मृति और संज्ञा आदि मतिज्ञानके पर्यायवाची नाम हैं । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यकार
इन्हें पर्यायवाची नाम न मानकर 'मतिः स्मृतिः' इत्यादि सूत्रके आधारसे मतिज्ञान, स्मृतिज्ञान आदिको
स्वतन्त्र ज्ञान मानते हैं$^२$ । सिद्धसेन गणिने भी तत्त्वार्थभाष्यके आधारसे इनको स्वतन्त्र ज्ञान मानकर उनकी
व्याख्या की है । यह कहना कि सामान्य मतिज्ञान व्यापक है और विशेष मतिज्ञान, स्मृतिज्ञान आदि उसके
व्याप्य हैं कुछ सयुक्तिक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि मतिज्ञान वर्तमान अर्थको विषय करता है । इस तथ्यको जब
स्वयं तत्त्वार्थभाष्यकार स्वीकार करते हैं ऐसी अवस्थामें मति, स्मृति आदि नाम मतिज्ञानके पर्यायवाची ही
हो सकते हैं ज्ञानान्तर नहीं । तथा दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्पराके आगमोंमें इन्हें मतिज्ञानके पर्यायवाची
ही कहा है । स्पष्ट है कि यहाँ पर भी तत्त्वार्थभाष्यकारकी व्याख्या मूल सूत्रका अनुसरण नहीं करती ।
३. तत्त्वार्थभाष्यकारने अध्याय १० सूत्र 'क्षेत्रकालंगति' इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए$^३$ शब्द,
समभिरूढ और एवंभूत इन तीनको मूल नय मान लिया है जब कि वे ही प्रथम अध्यायमें उस सूत्र पाठको
स्वीकार करते हैं जिसमें मूल नयोंमें केवल एक शब्दनय स्वीकार किया गया है । स्पष्टतः उनका १०वें
अध्यायमें शब्दादिक तीन नयोंको मूलरूपसे स्वीकार करना और प्रथम अध्यायमें एक शब्दनयको मूल मानना
परस्पर विरुद्ध है ।
४. श्वेताम्बर तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ सूत्र ५२ में 'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ स्वीकार किया गया है ।
तत्त्वार्थभाष्यकारने प्रारम्भमें इस पदको मानकर ही उसकी व्याख्या की है । किन्तु बादमें वे 'उत्तमपुरुष'
पदका त्याग कर देते हैं और मात्र 'चरमदेह' पदको स्वीकार कर उसका उपसंहार करते हैं । इससे विदित
होता है कि तत्त्वार्थभाष्यकारको इस सूत्रके कुछ हेरफेरके साथ दो पाठ मिले होंगे । जिनमेंसे एक पाठको
उन्होंने मुख्य मानकर उसका प्रथम व्याख्यान किया । किन्तु उसको स्वीकार करनेपर जो आपत्ति आती है
उसे देखकर उपसंहारके समय उन्होंने दूसरे पाठको स्वीकार कर लिया । स्पष्ट है कि इससे तत्त्वार्थभाष्यकार
ही तत्त्वार्थसूत्रकार हैं इस मान्यताको बड़ा धक्का लगता है ।
५. तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ४ सूत्र ४ में प्रत्येक देवनिकायके इन्द्रादिक १० भेद गिनाये हैं । किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकार इन दस भेदोंके उल्लेखके साथ अनीकाधिपति नामका ग्यारहवां भेद और स्वीकार करते
हैं । इसी प्रकार इसी अध्यायके २६वें सूत्रमें लौकान्तिक देवोंके सारस्वत आदिक नौ भेद गिनाये हैं किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकार अपने भाष्यमें यहाँ नौके स्थानमें आठ भेद ही स्वीकार करते हैं । वे कहते हैं--'एते
सारस्वतादयोऽष्टविधा देवा ब्रह्मलोकस्य पूर्वोत्तरादिषु, दिक्षु प्रदक्षिणं भवन्ति यथासंख्यम् ।'
वे ऐसे प्रमाण हैं जो पण्डितजी की पूर्वोक्त मान्यताके विरुद्ध जाते हैं । स्पष्ट है कि पण्डितजीकी उक्त
मान्यताके आधारसे भी तत्त्वार्थभाष्यकारको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता नहीं माना जा सकता ।$^४$
पं० सुखलालजीकी तीसरी मान्यता है कि प्रारम्भिक कारिकाओंमें और कुछ स्थानोंपर भाष्यमें
'वक्ष्यामि, वक्ष्यामः' आदि प्रथम पुरुषकी क्रियाओंका निर्देश है आदि इसलिए तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थ-
१. देखो तत्त्वार्थसूत्र अ० १ सू० ८ का तत्त्वार्थभाष्य । २. देखो अध्याय १ सूत्र १३ का तत्त्वार्थभाष्य ।
३. शब्दादयश्च त्रयः । ४. श्री पं० लालबहादुरजी शास्त्रीने जैन सिद्धान्तभास्कर भाग १३ किरण १ में
'क्या भाष्य स्वोपज्ञ और उसके कर्ता यापनीय हैं' इस शीर्षकसे एक लेख मुद्रित कराया है । उससे भी इस
विषयपर सुन्दर प्रकाश पड़ता है ।

६८ सर्वार्थसिद्धि
भाष्यकार एक ही व्यक्ति हैं। किन्तु पण्डितजी की यह कोई पुष्ट दलील नहीं है। अक्सर टीकाकार मूलकारसे
तादात्म्य स्थापित कर इस प्रकारकी क्रियाओंका प्रयोग करते हैं। उदाहरणके लिए देखो अध्याय १ सूत्र १ की
सर्वार्थसिद्धि टीका$^{१}$, अध्याय ८ सूत्र १ की उत्थानिका तत्त्वार्थवार्तिक$^{२}$, अध्याय ८ सूत्र १ की उत्थानिका
हरिभद्रकी टीका$^{३}$ व अध्याय १० सूत्र १ की उत्थानिका सिद्धसेन गणिकी टीका। यहाँ सिद्धसेन गणि कहते
हैं 'सम्प्रति तत्फलं मोक्षः, तं वक्ष्यामः ।' स च केवलज्ञानोत्पत्तिमन्तरेण न जातुचिदभूद् भवति भविष्यति
अतः केवल्योत्पत्तिमेव तावद् वक्ष्यामः । इसलिए इस आधारसे भी तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वाति
तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता नहीं सिद्ध होते ।
श्वेताम्बर पट्टावलियाँ- श्वेताम्बर पट्टावलियोंके देखनेसे भी इस स्थितिकी पुष्टि होती है । इनमें
सबसे पुरानी कल्पसूत्र स्थविरावली और नन्दिसूत्रकी पट्टावलि है । किन्तु इनमें समय नहीं दिया है। समय
गणना बहुत पीछेकी पट्टावलियोंमें है। कहा जाता है कि नन्दिसूत्र पट्टावली वि० सं० ५१० में संकलित हुई
थी। इनमें उमास्वाति व उनके गुरुओंके नाम नहीं हैं।
पिछले कालकी रची गयी पट्टावलियोंमेंसे धर्मघोषसूरिकृत दुःषमाकाल श्रमणसंघ स्तव एक है । इसकी
रचना विक्रमकी तेरहवीं सदीमें हुई अनुमानित की जाती है । इसमें उमास्वातिक नाम हरिभद्र और जिन-
भद्रके बाद आता है पर हरिभद्रने उमास्वातिके तत्त्वार्थभाष्य पर टीका लिखी है। ये विक्रमकी ८वीं-९वीं
सदीके विद्वान् हैं अतएव आचार्योंकी क्रम-परम्पराकी दृष्टिसे इस पट्टावलीको विशेष प्रमाण नहीं माना जा
सकता । इसमें वि० सं० ७२० में वाचक उमास्वातिकी अवस्थिति स्वीकार की गयी है ।
धर्मसागर गणिकृत तपागच्छ पट्टावली वि० सं० १६४६ में लिखी गयी थी। इसमें जिनभद्रके बाद
विबुधप्रभ, जयानन्द और रविप्रभका उल्लेख करनेके बाद उमास्वार्तिका नाम निर्देश किया है और इनका
समय वि० सं० ७२० बतलाया है। यद्यपि इन्होंने आर्यमहागिरिके बहुल और बलिसह नामक दो शिष्योंमें-
से बलिसहके शिष्य उमास्वातिक उल्लेख कर इन प्रथम उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता होनेकी सम्भा-
वना की है। किन्तु उनकी यह सम्भावना भ्रमजन्य है। कारण कि नन्दिसूत्र पट्टावलीकी २६वीं गाथामें
'हारियगुत्तं साइं च वंदे ।' पद आता है। जिसमें हारितगोत्रीय स्वातिका उल्लेख है। मालूम पड़ता है धर्म-
सागर गणिने नामकी आंशिक समता देखकर द्वितीयके स्थानमें भ्रमसे इन्हें ही तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता होनेकी
आशंका की है। पं० सुखलालजीने भी इस आशंकाको भ्रममूलक बतलाया है।$^{४}$
विनयविजय गणिने अपना लोकप्रकाश वि० सं० १७०८ में पूरा किया था। वे उमास्वातिको युग-
प्रधान आचार्य बतलाते हैं और जिनभद्र तथा पुष्पमित्रके बीच उनकी अवस्थिति स्वीकार करते हैं। इन्होंने
अपनी पट्टावलिमें उमास्वातिके समयका निर्देश नहीं किया है ।
रविवर्धन गणि (वि० सं० १७३९ ) ने भी पट्टावलीसारोद्धारमें उमास्वात्तिका उल्लेख किया है।
इसमें समयका निर्देश करते हुए वास्तव्वकाल वीर नि० सं० ११९० (वि० सं० ७२०) स्वीकार किया है ।$^{५}$
श्वेताम्बर परम्पराकी ये पट्टावलियाँ हैं जिनमें उमास्वातिक निर्देश किया है। यद्यपि ये पट्टावलियाँ
अपेक्षाकृत अर्वाचीन हैं और इनमें कुछ मतभेद है तथापि इनको सर्वथा निराधार मानना उचित नहीं है।
इनमें निर्दिष्ट वस्तुके आधारसे निम्नलिखित तथ्य फलित होते हैं-
१. वाचक उमास्वाति युगप्रधान आचार्य थे। वे वि० सं० ७२० के आसपास हुए हैं। बहुत सम्भव
है कि इसी कारणसे नन्दिसूत्र पट्टावली और कल्पसूत्र स्थविरावलिमें इनकी परम्पराका किसी भी प्रकारका
उल्लेख नहीं किया है।
२. यद्यपि रविवर्धन गणिने जिनभद्र गणिके पूर्व वाचक उमास्वात्तिका उल्लेख किया है परन्तु
१. एतेषां स्वरूपं लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्देश्यामः । २. अवसरप्राप्तं बन्धं व्याख्यास्महे ।
३. बन्ध इति वर्तते । एतच्चोपरिष्टाद्दर्शयिष्यामः । ४. देखो उनका तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृष्ठ २। ५ ये चारों
पट्टावलियाँ मुनिदर्शनविजय द्वारा सम्पादित श्री पट्टावलीसमुच्चय प्रथम भागमें मुद्रित हुई हैं।

प्रस्तावना ६९
समयकी दृष्टिसे रविवर्धन गणिने उन्हें जिनभद्रगणिके बादका ही बतलाया है, अतः उक्त सब पट्टावलियोंमें
एकमत होकर स्वीकार किये गये वास्तव कालका विचार करते हुए अन्य प्रमाणोंके प्रकाशमें अधिक सम्भव
यही दिखाई देता है कि ये जिनभद्र गणिके बाद ही हुए हैं।
३. एक प्रशस्ति तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें भी उपलब्ध होती है जिसमें वाचक उमास्वातिने स्वयंको
तत्त्वार्थाधिगम शास्त्रका रचयिता कहा है। किन्तु इसमें समयादिका कुछ निर्देश न होनेसे यह प्रशस्ति समय
सम्बन्धी पूर्वोक्त तथ्यकी पूरक ही प्रतीत होती है।
यह तो हम अनेक प्रमाणोंके आधारसे पहले ही स्वीकार कर आये हैं कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थ-
भाष्यकी रचना की और तत्त्वार्थभाष्यमें स्वीकृत तत्त्वार्थसूत्रके पाठको संस्कारित कर अन्तिम रूप दिया, इस-
लिए इस रूपमें इन तथ्योंको स्वीकार कर लेने पर भी वाचक उमास्वाति मूल तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता नहीं ठहरते,
और हमारा ऐसा मानना अनुचित भी नहीं है क्योंकि विक्रमकी आठवीं शताब्दीके पूर्व ६वीं शताब्दीके
प्रारम्भमें या इसके कुछ काल पूर्व तत्त्वार्थसूत्र पर सर्वार्थसिद्धि टीका लिखी जा चुकी थी तथा अनेक टीका-
टिप्पणियाँ प्रचलित हो चुकी थीं।
यद्यपि धर्मसागर गणी, बलिसहके शिष्य स्वातिने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की, ऐसी शंका करते हैं,
किन्तु यह उनका निश्चित मत नहीं है। केवल सम्भावना मात्र है। जैसा कि उनके इन शब्दोंसे प्रकट है।
यथा—'तस्य बलिसहस्य शिष्यः स्वातिः तत्त्वार्थादयो ग्रन्थास्तु तत्कृता एव सम्भाव्यन्ते ।' अतएव इसे
विशेष महत्त्व नहीं दिया जा सकता ।
यहाँ तक हमने पाँच मतोंकी समीक्षा की। मात्र एक प्रमुख मत शेष रहता है जिस पर यहाँ तीन
दृष्टियोंसे विचार करना है—नाम, परम्परा और समय ।
नाम—यह हम प्रारम्भमें ही उद्धरणोंके साथ लिख आये हैं कि आचार्य वीरसेन और आचार्य
विद्यानन्द तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताका नाम आचार्य गृद्धपिच्छ घोषित करते हैं और ये उल्लेख अपेक्षाकृत प्राचीन
हैं। किन्तु इन उल्लेखों को छोड़कर दिगम्बर परम्परामें अन्य जितने उल्लेख मिलते हैं उनमें गृद्धपिच्छको
उपपद या दूसरा नाम मान कर नानारूपता दिखाई देती है। इनमेंसे कुछ प्रमुख उल्लेखोंका निर्देश हम 'अन्य
मत' शीर्षकके अन्तर्गत कर आये हैं। इसी तरहका एक प्रमुख मत नन्दिसंघकी पट्टावलीका है। नन्दिसंघकी
दो पट्टावलियाँ उपलब्ध होती हैं—एक संस्कृत पट्टावली और दूसरी प्राकृत पट्टावली। इनमेंसे संस्कृत पट्टा-
वलिमें आचार्य उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता कहा गया है।
यहाँ देखना यह है कि तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताके नामके विषयमें इतना मतभेद होनेका कारण क्या है और
उनका ठीक नाम क्या है ?
पहले हम श्रवणवेलगोलमें पाये जानेवाले शिलालेख १०५ और १०८ के उद्धरण उपस्थित कर आये
हैं। वे शिलालेख क्रमशः शक सं० १३२० और १३५५ के अनुमानित किये गये हैं। शक सं० १०३७ और
१०८५ के भी दो शिलालेख वहाँ उपलब्ध होते हैं जो जैन शिलालेख संग्रह भाग १ में क्रमशः ४७ और ४०
नम्बर पर दर्ज हैं। ४७ नं० के शिलालेखमें कहा गया है—
'श्री गौतम गणधरके अन्वयमें नन्दिसंघके प्रमुख आचार्य पद्मनन्दी हुए जिनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द
था। फिर उनके अन्वयमें गृद्धपिच्छ अपर नामवाले उमास्वाति आचार्य हुए । इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे और
बलाकपिच्छके शिष्य गुणनन्दि थे ।'
नं० ४० के शिलालेखमें कहा गया है कि 'गौतम गणधरके बाद पांचवें श्रुतकेवली भद्रबाहु और
उनके शिष्य चन्द्रगुप्त हुए। इसके बाद उनके अन्वयमें पद्मनन्दी हुए। इनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द था।
फिर इनके अन्वयमें गृद्धपिच्छ उमास्वाति आचार्य हुए। इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे। इस प्रकार महान्
आचार्योंकी परम्परामें क्रमशः आचार्य समन्तभद्र हुए ।'
नं० १०५ और १०८ के शिलालेखोंमें, जिनका उल्लेख हम पहले कर आये हैं, लगभग यही बात