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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 558 में से

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पृष्ठ 62

५८ सर्वार्थसिद्धि
पण्डितजीका तर्क है कि पूर्वोक्त दूसरा कथन तत्त्वार्थाधिगम शास्त्रका मोक्षमार्गविषयक सूत्र सर्वज्ञ
वीतरागप्रणीत है इस वस्तुको सिद्ध करनेवाली अनुमान चर्चामें आया है। इस अनुमान चर्चामें मोक्षमार्ग-
विषयक सूत्र पक्ष है, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीतत्व यह साध्य है और सूत्रत्व यह हेतु है। इस हेतुमें व्यभिचार
दोषका निरसन करते हुए विद्यानन्दने 'एतेन' इत्यादि कथन किया है। व्यभिचार दोष पक्षसे भिन्न स्थलमें
सम्भवित होता है। पक्ष तो मोक्षमार्गविषयक प्रस्तुत तत्त्वार्थसूत्र ही है इससे व्यभिचारका विषयभूत माना
जानेवाला गृद्धपिच्छाचार्यपर्यन्त मुनियोंका सूत्र यह विद्यानन्दकी दृष्टिमें उमास्वातिके पक्षभूत मोक्षमार्गविषयक
प्रथम सूत्रसे भिन्न ही होना चाहिए, यह बात न्यायविद्याके अभ्यासीको शायद ही समझानी पड़े ऐसी है।
पण्डितजीके इस तर्काश्रित वक्तव्यका सार इतना ही है कि, आचार्य विद्यानन्दने यहाँपर जिस गृद्ध-
पिच्छाचार्यपर्यन्त मुनिसूत्रका उल्लेख किया है। वह उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रसे भिन्न ही है।
जहाँ तक पण्डितजीका यह वक्तव्य है उसमें हमें अप्रामाणिकताका दोषारोप नहीं करना है किन्तु
पण्डितजी यदि उक्त अनुमान प्रसंगसे आचार्य विद्यानन्दके द्वारा उठाये गये अवान्तर प्रसंग पर दृष्टिपात करते
तो हमारा विश्वास है कि वे गृद्धपिच्छ आचार्यके सूत्रसे तथाकथित उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रको भिन्न सिद्ध
करनेका प्रयत्न नहीं करते।
आचार्य विद्यानन्द द्वारा उठाया गया वह अवान्तर प्रसंग है गणाधिप, प्रत्येकबुद्ध, श्रुतकेवली और
अभिन्नदशपूर्वीके सूत्र वचनको स्वरचित मानकर व्यभिचारदोषका उद्भावन । स्पष्ट है कि इसमें इस अभिप्रायसे
गृद्धपिच्छाचार्यका तत्त्वार्थसूत्र भी गर्भित है, क्योंकि यहाँपर वह स्वकर्तृकरूपसे सर्वज्ञ वीतरागप्रणीत सूत्रसे
कथञ्चित् ( कर्ता गृद्धपिच्छाचार्य हैं इस दृष्टिसे ) भिन्न मान लिया गया है। प्रकृतमें इस विषयको इन शब्दों
द्वारा स्पष्ट करना विशेष उपयुक्त होगा । प्रस्तुत अनुमानमें प्रकृत सूत्र पक्ष है, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीतत्व
साध्य है, सूत्रत्व हेतु है, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत शेष सूत्र सपक्ष है और बृहस्पति आदिका सूत्र विपक्ष है।
इस अनुमान द्वारा तत्त्वार्थसूत्रको सूत्रत्व हेतु द्वारा सर्वज्ञ वीतराग कर्तृक सिद्ध किया गया है। इससे सिद्ध
है कि यहाँ आचार्य विद्यानन्द तत्त्वार्थसूत्रको गृद्धपिच्छाचार्यकर्तृक मानकर सूत्र सिद्ध नहीं कर रहे हैं।
सूत्रत्वकी दृष्टिसे, यह गृद्धपिच्छाचार्य रचित है इस बातको, वे भूल जाते हैं। वे कहते हैं कि यह सर्वज्ञ
वीतराग प्रणीत है, इसलिए सूत्र है।
फिर भी यदि कोई यह कहे कि यह तत्त्वार्थसूत्र सर्वज्ञ वीतरागप्रणीत न होकर गृद्धपिच्छाचार्य रचित
है तो ऐसी अवस्थामें सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत तत्त्वार्थसूत्रसे कथञ्चित् भिन्न गृद्धपिच्छाचार्य प्रणीत तत्त्वार्थसूत्र
पूर्वके अनुमानमें सपक्षभूत गणधरादि रचित सूत्रोंके समान विपक्ष कोटिमें चला जायेगा और इसमें सूत्रत्व
हेतुके स्वीकार करनेसे हेतु व्यभिचरित हो जायेगा । आचार्य विद्यानन्दने इसी व्यभिचार दोषका उपस्थापन
कर उसका वारण करते हुए फलितांशके साथ यह समग्र वचन कहा है—
'गणाधिपप्रत्येकबुद्धश्रुतकेवल्यभिन्नदशपूर्वधरसूत्रेण स्वयंसंमतेन व्यभिचार इति चेत् ? न,
तस्याप्यर्थतः सर्वज्ञवीतरागप्रणेतृकत्वसिद्धेरर्हद्भाषितार्थं गणधरदेवैर्ग्रथितमिति वचनात् । एतेन गृद्धपिच्छा-
चार्यपर्यन्तमुनिसूत्रेण व्यभिचारता निरस्ता ।'
यहाँ स्वनिर्मित मानकर गणाधिप प्रत्येकबुद्ध, श्रुतकेवली और अभिन्नदशपूर्वीके सूत्रके साथ व्यभिचार
दिखाया गया है । तत्त्वार्थसूत्रको गृद्धपिच्छाचार्य प्रणीत माननेपर भी यह व्यभिचार दोष आता है, क्योंकि
पूर्वोक्त अनुमानमें साध्य गृद्धपिच्छाचार्यका तत्त्वार्थसूत्र न होकर सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत तत्त्वार्थसूत्र साध्य है ।
इसलिए गृद्धपिच्छाचार्यका तत्त्वार्थसूत्र साध्यविरुद्ध होनेसे विपक्ष ठहरता है । हम यह तो मानते हैं कि
तत्त्वार्थसूत्र एक है, दो नहीं पर कर्ताके भेदसे वे दो उपचरित कर लिये गये हैं । एक वह जो सर्वज्ञ वीतराग-
प्रणीत है और दूसरा वह जो गृद्धपिच्छाचार्यप्रणीत है। इसलिए जिस प्रकार गणाधिप आदिके सूत्रके साथ
आनेवाले व्यभिचार दोषका वारण करना इष्ट था उसी प्रकार केवल गृद्धपिच्छाचार्य प्रणीत माननेसे जो
व्यभिचार दोष आता था उसका वारण करना भी आवश्यक था और इसीलिए 'एतेन' इत्यादि वाक्य द्वारा
उस दोषका वारण किया गया है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri