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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 558 में से

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पृष्ठ 61

प्रस्तावना ५७
ही नहीं वे तत्त्वार्थसूत्रपर अपनी सर्वार्थसिद्धि टीका लिखते समय भी इसी मार्गका अनुसरण करते हैं ।
वे इसकी उत्थानिकामें यहाँ तक तो निर्देश करते हैं कि कोई भव्य किसी आश्रममें मुनियोंकी सभामें बैठे हुए
आचार्यवर्यके समीप जाकर विनय सहित प्रश्न करता है और उसीके फलस्वरूप तत्त्वार्थसूत्रकी रचना होती है ।
फिर भी वे उन आचार्य आदिके नामादिकके विषयमें मौन रहते हैं । क्यों ? हमें तो इस उपाख्यानसे यही
विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादको परम्परासे तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता आदिके विषयकी इत्थम्भूत जानकारी
होते हुए भी स्वकर्तृत्वकी भावनाका परिहार करनेके अभिप्रायसे वे नामादिकके उल्लेखके पचड़ेमें नहीं पड़े।
भट्ट अकलंकदेवने भी इसी मार्गका अनुसरण किया है । वे भी तत्त्वार्थवार्तिकके प्रारम्भमें उसी उत्थानिकाको
स्वीकार करते हैं जिसका उल्लेख सर्वार्थसिद्धिके प्रारम्भमें आचार्य पूज्यपादने किया है । इसलिए इन
उल्लेखोंसे इस तथ्यपर पहुँचने पर भी कि इन आचार्योंको तत्त्वार्थसूत्रके कतर्कि नामादिककी कुछ-कुछ
जानकारी अवश्य रही है, इससे इस बातका पता नहीं लगता कि आखिर वे आचार्य कौन थे जिन्होंने
भव्य जीवोंके कल्याणार्थ यह महान् प्रयास किया है ।
हम समझते हैं कि भारतीय परम्परामें मुख्यतः जैन परम्परामें नामादिकके उल्लेख न करनेकी यह
परिपाटी विक्रम ४ थी, ५वीं शताब्दी तक बराबर चलती रही है । और कुछ आचार्योंने इसे इसके बाद भी
अपनाया है । इसके बाद कई कारणोंसे इस नीतिमें परिवर्तन होने लगता है और शास्त्रकार शास्त्रके प्रारम्भमें
या अन्तमें अपने नामादिका उल्लेख करने लगते हैं । इतना ही नहीं वे अन्य प्रकारसे अपने पूर्ववर्ती शास्त्र-
कारोंका भी उल्लेख करने लगते हैं। अतएव हमें तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताका ठीक तरहसे निर्णय करनेके लिए
उत्तरकालवर्ती साहित्यका ही आलोडन करना होगा । अतः आइए पहले उत्तरकालवर्ती उन अभ्रान्त प्रमाणों-
को देखें जो इस विषयपर प्रकाश डालते हैं-
१—श्रुतधर आचार्योंकी परम्परामें आचार्य वीरसेन महान् टीकाकार हो गये हैं । इन्होंने षट्खण्डा-
गमपर प्रसिद्ध धवला टीका शक संवत् ७३८ में पूरी की थी । उनकी यह टीका अनेक उल्लेखों और ऐति-
हासिक तथ्योंको लिये हुए है । तत्त्वार्थसूत्रके अनेक सूत्रोंको उन्होंने इस टीकामें उद्धृत किया है । इतना ही
नहीं जीवस्थान काल अनुयोगद्वारमें तो तत्त्वार्थसूत्रकारके नामोल्लेखके साथ भी तत्त्वार्थसूत्रके एक सूत्रको वे
उद्धृत करते हैं । वे कहते हैं-
'तह गिद्धपिंच्छाइरियप्पयासिदतच्चत्थसुत्ते वि वत्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य इदि
दव्वकालो परूविदो ।' मुद्रित पृष्ठ ३१६ ।
इस उल्लेखमें तत्त्वार्थसूत्रको स्पष्टतः गृद्धपिच्छाचार्यके द्वारा प्रकाशित कहा गया है ।
२-आचार्य विद्यानन्द भी महान् श्रुतधर आचार्य थे । इन्होंने अष्टसहस्री, विद्यानन्द महोदय, आप्त-
परीक्षा, प्रमाणपरीक्षा, पत्रपरीक्षा, सत्यशासनपरीक्षा और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आदि अनेक शास्त्रोंका प्रणयन
कर जैन श्रुतकी श्रीवृद्धि की है । इनका वास्तव काल ई० सन् ७७५ ( शक सं० ६९७ ) से ई० सन् ८४०
( शक सं० ७६२ ) तक माना जाता है १। ये तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक मुद्रित पृष्ठ ६ में लिखते हैं-
'एतेन गृद्धपिच्छाचार्यपर्यन्तमुनिश्रेण व्यभिचारता निरस्ता ।'
इस द्वारा आचार्य विद्यानन्द यह सूचित करते हैं कि भगवान् महावीरके शासनमें जो सूत्रकार हुए हैं
उनमें अन्तिम सूत्रकार गृद्धपिच्छ आचार्य थे ।
यद्यपि यह उल्लेख तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य गृद्धपिच्छको ही सूचित करता है फिर भी पं० सुख-
लालजी इस विषयमें सन्देह करते हैं और उन्होंने यह सन्देह स्वलिखित तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृष्ठ १०६-
१०७ में प्रकट किया है । उनका यह सन्देह विशेषतः तर्काश्रित है इसलिए यहाँ हमें प्रथमतः इसपर इसी
दृष्टिसे विचार करना है ।
१. देखो न्यायाचार्य पं० दरबारीलालजी द्वारा सम्पादित और वीरसेवामन्दिरसे प्रकाशित आप्तपरीक्षाकी
प्रस्तावना पृष्ठ ५० ।
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