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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 558 में से

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पृष्ठ 67

किन्तु श्वेताम्बर परम्परा १६ के स्थानोंमें २० कारण स्वीकार करती है। वहां ज्ञातृधर्मकथा नामक
अंगके आठवें अध्यायमें इन कारणोंका निर्देश इन शब्दोंमें किया है—
'अरहंत-सिद्धि-पवयण गुरु-थेर-बहुस्सुए तवस्सीसुं।
वच्छलया य तेसिं अमिक्खं णाणोवओगे य ॥ १ ॥
दंसणविणए आवस्सए य सीलव्वए निरह्यारं।
खणलुव तवच्चिच्चाए वेयावच्चे समाही य ॥ २ ॥
अपुव्वणाणगहणे सुयमत्ती पवयणे पभावणया।
एएहिं कारणेहिं तित्थयरत्तं लहइ जीवो ॥ ३ ॥'
यहाँ तत्त्वार्थसूत्रकी दो बातें ध्यान देने योग्य हैं—प्रथम बात तो १६ संख्याका निर्देश और दूसरी बात
शब्दसाम्य। इस विषयमें तत्त्वार्थसूत्रका उक्त सूत्र दिगम्बर परम्पराके जितने अधिक नजदीक है उतना
श्वेताम्बर परम्पराके नजदीक नहीं है।
२. दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराएं २२ परीषहोंको स्वीकार करती हैं। तत्त्वार्थसूत्रमें
इनका प्रतिपादन करनेवाला जो सूत्र है¹ उसमें एक परीषहका नाम 'नाग्न्य' है। देखना यह है कि यहाँ तत्त्वार्थ-
सूत्रकारने नाग्न्य शब्दको ही क्यों स्वीकार किया है। क्या इस शब्दका स्वीकार श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार
आगम सम्मत हो सकता है। श्वेताम्बर परम्पराके आगममें 'नाग्न्य' परीषहके स्थानमें सर्वत्र 'अचेल' परी-
षहका उल्लेख मिलता है² जो उस सम्प्रदायके अनुरूप है; क्योंकि अचेल शब्दमें 'नञ्' समास होनेसे उस
सम्प्रदायके अनुसार इस शब्दके 'वस्त्रका अभाव और अल्प वस्त्र' ये दोनों ही अर्थ फलित हो जाते हैं। परन्तु
इस प्रकार 'नाग्न्य' शब्दसे इन दोनों अर्थोंको फलित नहीं किया जा सकता है। नग्न यह स्वतन्त्र शब्द है
और इस शब्दका 'वस्त्रके आवरणसे रहित' एकमात्र यही अर्थ होता है। स्पष्ट है कि यह २२ परीषहोंका
प्रतिपादन करनेवाला सूत्र भी जितना अधिक दिगम्बर परम्पराके नजदीक है उतना श्वेताम्बर परम्पराके
नजदीक नहीं है।
३. बाईस परीषहोंमेंसे एक साथ एक जीवके कितने परीषह हो सकते हैं इसका विचार करते हुए
श्वेताम्बर आगम साहित्य (व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ८)¹ में बतलाया है कि सात और आठ प्रकारके कर्मोंका बन्ध
करनेवाले जीवके २२ परीषह होते हैं। परन्तु ऐसा जीव एक साथ बीस परीषहोंका ही वेदन करता है।
दो कौनसे परीषह कम हो जाते हैं इस बातका उल्लेख करते हुए वहाँ बतलाया है कि जिस समय वह जीव
शीत परीषहका वेदन करता है उस समय वह उष्ण परीषहका वेदन नहीं करता और जिस समय उष्ण परी-
षहका वेदन करता है उस समय वह शीत परीषहका वेदन नहीं करता। इस प्रकार एक परीषह तो यह कम
हो जाता है। तथा जिस समय चर्या परीषहका वेदन करता है उस समय निषद्यापरीषहका वेदन नहीं करता
और जिस समय निषद्या परीषहका वेदन करता है उस समय चर्या परीषहका वेदन नहीं करता। इस प्रकार
एक परीषह यह कम हो जाता है। कुल बीस परीषह रहते हैं जिनका वेदन यह जीव एक साथ करता है।
किन्तु तत्त्वार्थसूत्रमें परीषहोंके एक साथ वेदन करनेकी अधिकसे अधिक संख्या १९ निश्चित की गयी
है³। यहाँ हमें युक्तिसंगत क्या है इसका विचार नहीं करना है। बतलाना केवल इतना ही है कि तत्त्वार्थ-
सूत्रकारका इस प्रकारका निर्देश भी श्वेताम्बर आगम परम्पराका अनुसरण नहीं करता।
४. 'जिनके ग्यारह परीषहं होते हैं' इस सूत्रका विस्तारके साथ विचार हम 'पाठभेद और अर्थान्तर-
न्यास' प्रकरणमें⁴ कर आये हैं। वहाँ हमने तत्त्वार्थसूत्रकारकी दृष्टिको स्पष्ट करते हुए बतलाया है कि परीषहों
के प्रसंगसे सूत्रकारकी दृष्टि मुख्यतया अन्तरंग कारणोंके विवेचन करनेकी रही है। वे किस कर्मके उदयमें
कितने परीषह होते हैं इतना कहकर अधिकारी भेदसे अलग-अलग परीषहोंकी संख्याका निर्देश करते हैं। पर
१. देखो, अ० ९ सू० ९ । २. समवायांग समवाय २२ व भगवती सूत्र ८, ८ । ३. तत्त्वार्थसूत्र अ० ९,
सू० १७ । ४. देखो, पृ० २५ आदि ।