सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य विद्यानन्द भी वीरसेनस्वामीके समान इसी मतके अनुसर्ता प्रतीत
होते हैं कि तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता आचार्य गृद्धपिच्छाचार्य ही हैं। थोड़ी देरको यदि इस तर्काश्रित पद्धतिको
छोड़ भी दिया जाये और पण्डितजीके मतको ही मुख्यता दी जाये तब भी आचार्य विद्यानन्द 'एतेन' इत्यादि
वाक्य द्वारा तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता गृद्धपिच्छको ही सूचित कर रहे हैं इस मतके माननेमें कोई बाधा नहीं आती,
क्योंकि आचार्य विद्यानन्दने पूर्वोक्त अनुमान द्वारा गृद्धपिच्छाचार्यके तत्त्वार्थसूत्रको तो सूत्र सिद्ध कर ही दिया
था किन्तु इससे पूर्ववर्ती अन्य आचार्योंकी रचनाको सूत्र सिद्ध करना फिर भी शेष था जिसे उन्होंने गृद्ध-
पिच्छाचार्यपर्यन्त अर्थात् गृद्धपिच्छाचार्य हैं अन्तमें जिनके ऐसे अन्य गणाधिप आदि मुनिसूत्रके साथ आनेवाले
व्यभिचारका वारण कर सूत्र सिद्ध कर दिया है। यहाँ अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समासके स्वीकार कर
लेनेसे यह अभिप्राय फलित हो जाता है।
तात्पर्य यह है कि गृद्धपिच्छाचार्यका कोई सूत्रग्रन्थ है इसे तो पं० सुखलालजी भी स्वीकार करते हैं।
उन्हें केवल प्रस्तुत तत्त्वार्थसूत्रको उनका माननेमें विवाद है। किन्तु अन्य ऐतिहासिक तथ्योंसे जब वे तत्त्वार्थ-
सूत्रके कर्ता सिद्ध होते हैं ऐसी अवस्थामें आचार्य विद्यानन्दके उक्त वाक्यका वही अर्थ संगत प्रतीत होता है
जो हमने किया है।
३—आचार्य गृद्धपिच्छका बहुमानके साथ उल्लेख वादिराजसूरिने भी अपने पार्श्वनाथचरितमें किया
है। सम्भवतः ये वही वादिराज सूरि हैं जिन्होंने एकीभावस्तोत्र, यशोधरचरित, काकुस्थचरित और न्याय-
विनिश्चयविवरण लिखा है। इनके विषयमें कहा जाता है—
'वादिराजमनु शाब्दिकलोको वादिराजमनु तार्किकसिंहः ।
वादिराजमनु काव्यकृतस्ते वादिराजमनु भव्यसहायः ।'
वे पार्श्वनाथचरितमें आचार्य गृद्धपिच्छका इन शब्दों द्वारा उल्लेख करते हैं—
“अतुच्छगुणसंघातं गृद्धपिच्छं नतोऽस्मि तम् ।
पक्षीकुर्वन्ति यं भव्या निर्वाणायोत्पतिष्णवः ।”
उन महान् गुणोंके आकर गृद्धपिच्छको मैं नमस्कार करता हूँ जो निर्वाणको उड़कर पहुँचनेकी इच्छा
रखनेवाले भव्योंके लिए पंखोंका काम देते हैं।
यद्यपि वादिराजसूरिने यहाँपर आचार्य गृद्धपिच्छके किसी ग्रन्थका नामोल्लेख नहीं किया है तथापि
यहाँ वे उन्हीं शास्त्रकारोंका स्मरण कर रहे हैं जिन्होंने मोक्षमार्गोपयोगी साहित्यकी सृष्टि कर संसारका हित
किया है। वादिराजसूरिकी दृष्टिमें आचार्य गृद्धपिच्छ उनमें सर्व प्रथम हैं।
इनमेंसे प्रथम दो उल्लेख विक्रमकी नौंवी शताब्दीके और अन्तिम उल्लेख ग्यारहवीं शताब्दीका है।
इससे मालूम पड़ता है कि इस काल तक जैन परम्परामें तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता आचार्य गृद्धपिच्छ हैं एकमात्र
यही मान्यता प्रचलित थी।
अन्य मत—किन्तु इस मतके विरुद्ध तीन चार मत और मिलते हैं जिनकी यहाँ चर्चा कर लेना
प्रासंगिक है।
१—श्वेताम्बर तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें एक प्रशस्ति उपलब्ध होती है। उनमें कहा गया है कि
'जिनके दीक्षागुरु ग्यारह अंग के धारक घोषनन्दि श्रमण थे और प्रगुरु वाचकमुख्य शिवश्री थे, वाचनाकी
अपेक्षा जिनके गुरु मूल नामक वाचकाचार्य और प्रगुरु महावाचक मुण्डपाद थे, जो गोत्रसे कौभीषणि थे और
जो स्वाति पिता और वात्सी माताके पुत्र थे, जिनका जन्म न्यग्रोधिका में हुआ था और जो उच्चानागर शाखाके
थे, उन उमास्वाति वाचकने गुरुपरम्परासे प्राप्त हुए श्रेष्ठ अर्हद्वचनको भली प्रकार धारण करके तथा दुरागम
द्वारा हतबुद्धि दुःखित लोकको देखकर प्राणियोंकी अनुकम्पावश यह तत्त्वार्थाधिगम नामका शास्त्र विहार करते