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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

विचारणीय हो जाता है। इस विषयमें हमारा तो खयाल है कि जिस कालमें श्रावकके पाक्षिक, नैष्ठिक और
साधक ये तीन भेद किये गये और इस आधारसे श्रावकाचार के प्रतिपादन करनेका प्रारम्भ हुआ उसी कालसे
आठ मूलगुणोंका वर्गीकरण हो कर उन्हें श्रावकाचारोंमें स्थान मिला है। रत्नकरण्डकमें कुछ ऐसे बीज हैं
जिनसे उसका संकलन दूसरे श्रावकाचारोंमें हुए विकास क्रमके बहुत पहलेका माना जा सकता है। अतएव
सम्भव है कि रत्नकरण्डकमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख प्रक्षिप्त हो। रत्नकरण्डकमें जिस स्थानपर यह आठ
मूलगुणोंका प्रतिपादक श्लोक संकलित है उसे देखते हुए तो यह सम्भावना और भी अधिक बढ़ जाती है।
इसके पहले स्वामी समन्तभद्र अतीचारोंके साथ पाँच अणुव्रतोंका कथन कर आये हैं और आगे वे सात शील-
व्रतोंका अतीचारोंके साथ कथन करनेवाले हैं। इनके बीचमें यह श्लोक आया है जो अप्रासंगिक है।
युक्त्यनुशासन—स्वामी समन्तभद्रकी रत्नकरण्डके समान अन्यतम अमर कृति उनका युक्त्यनुशासन
है। इसमें वीर जिनकी स्तुति करते हुए युक्तिपूर्वक उनके शासनकी स्थापना की गयी है। इसके एक स्थलपर
वे कहते हैं कि जो शीर्षोपहार आदिके द्वारा देवकी आराधना कर सुख चाहते हैं और सिद्धि मानते हैं उनके
आप गुरु नहीं हो। श्लोक इस प्रकार है—
'शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखैर्देवान् किलाराध्य सुखाभिगृद्धाः।
सिद्धयन्ति दोषापचयानपेक्षा युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥'
अब इसके प्रकाशमें सर्वार्थसिद्धिके इस स्थलको पढ़िए—
तेन तीर्थाभिषेकर्दाक्षाशीर्षोपहारदेवताराधनादयो निवर्तिता भवन्ति। अ० ९, सू० २ की टीका।
इस तुलनासे विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादके समक्ष युक्त्यनुशासनका उक्त वचन उपस्थित था।
द्वात्रिंशत्का—आचार्य पूज्यपादके पूर्व और स्वामी समन्तभद्रके बाद विक्रमकी पाँचवीं छठीवीं शताब्दीके
मध्यमें¹ सिद्धसेन दिवाकर एक बहुत बड़े आचार्य हो गये हैं जिनका उल्लेख दिगम्बर आचार्योंने बड़े आदरके
साथ किया है²। इनके द्वारा रचित सन्मतितर्क ग्रन्थ प्रसिद्ध है। अनेक द्वात्रिंशत्काओंके रचयिता भी यही
माने जाते हैं³। आचार्य पूज्यपादने अध्याय ७ सूत्र १३ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें 'वियोजयति चासुभिः' यह
पद उद्धृत किया है जो इनकी सिद्धद्वात्रिंशत्कासे लिया गया जान पड़ता है।
इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धिमें कुछ ऐसी गाथाएँ, पद्य और वाक्य उद्धृत हैं जिनमेंसे कुछके स्रोतका हम
अभी तक ठीक तरहसे निर्णय नहीं कर सके हैं और कुछ ऐसे हैं जो सर्वार्थसिद्धिके बादमें संकलित हुए या
रचे गये ग्रन्थोंमें उपलब्ध होते हैं। यहाँ हमने उन्हीं ग्रन्थोंका परिचय दिया है जो निश्चयतः आचार्य पूज्यपाद
के सामने रहे होंगे।
मंगलाचरण—सर्वार्थसिद्धिके प्रारम्भमें यह मंगल श्लोक आता है—
'मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥'
यहाँ विचार इस बातका करना है कि यह मंगल श्लोक तत्त्वार्थसूत्रका अंग है या सर्वार्थसिद्धिका ।
कुछ विद्वानोंका मत इसे तत्त्वार्थसूत्रका अंग माननेके पक्षमें है। वे इसके समर्थनमें इन हेतुओंको उपस्थित
करते हैं—
एक तो तत्त्वार्थसूत्रकी हस्तलिखित अधिकतर जो प्राचीन प्रतियां उपलब्ध होती हैं उनके प्रारम्भमें
यह मंगल श्लोक उपलब्ध होता है और दूसरे आचार्य विद्यानन्दने अपनी आप्तपरीक्षामें इसे सूत्रकारका कहकर
इसका उल्लेख किया है। यथा—
'किं पुनस्तत्परमेष्ठिनो गुणस्तोत्रं शास्त्रादौ सूत्रकाराः प्राहुरिति निगद्यते ।'
१. देखो भारतीय विद्या भाग ३, पृष्ठ ११। २. देखो जिनसेनका महापुराण । ३. देखो पुरातन जैन वाक्य-
सूची, प्रस्तावना पृ० १३२ ।