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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 558 में से

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पृष्ठ 65

प्रस्तावना ६१
शिलालेख १०८ में इसी बातको इस प्रकार लिपिबद्ध किया गया है—
‘अभूदुमास्वातिमुनिः पवित्र वंशे तदीये सकलार्थवेदी।
सूत्रीकृतं येन जिनप्रणीतं शास्त्रार्थजातं मुनिपुङ्गवेन ॥११॥’
‘स प्राणिसंरक्षणसावधानो बभार योगी किल गृद्धपक्षान्।
तदा प्रभृत्येव बुधा यमाहुराचार्यशब्दोत्तरगृद्धपिच्छम् ॥२२॥’
तत्त्वार्थसूत्रपर विभिन्न समयोंमें छोटी-बड़ी टीकाएँ तो अनेक लिखी गयी हैं पर उनमेंसे विक्रमकी
१३वीं शतीके विद्वान् बालचंद$^१$ मुनिकी बनायी हुई एक ही कनडी टीका है जिसमें उमास्वाति नामके साथ
गृद्धपिच्छाचार्य नाम भी दिया है।
पं० जुगुलकिशोरजी मुख्तार कर्ता विषयक इसी मतको प्रमाण मानकर चलते हैं। उन्होंने गृद्धपिच्छ-
को उमास्वातिको ही नामान्तर कहा है।$^२$
३. दिगम्बर परम्परामें मूल तत्त्वार्थसूत्रकी जो प्रतियाँ उपलब्ध होती हैं, उनके अन्तमें एक श्लोक
आया है—
'तत्त्वार्थसूत्रकर्तारं गृद्धपिच्छोपलक्षितम्।
वन्दे गणीन्द्रसंजातमुमास्वामिमुनीश्वरम् ॥’
इसमें गृद्धपिच्छसे उपलक्षित उमास्वामी मुनीश्वरको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता बतलाकर उन्हें गणीन्द्र
कहा गया है।
४. नगर ताल्लुकेके एक शिलालेखमें यह उल्लेख उपलब्ध होता है—
‘तत्त्वार्थसूत्रकर्तारमुमास्वातिमुनीश्वरम्।
श्रुतकेवलिदेशीयं वन्देऽहं गुणमन्दिरम् ॥’
इसमें तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताका नाम उमास्वाति बतलाया है और उन्हें श्रुतकेवलिदेशीय तथा गुणमन्दिर
कहा गया है।
५. आचार्य कुन्दकुन्दने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की है ऐसा भी उल्लेख देखनेमें आता है जो तत्त्वार्थसूत्र-
की अन्यतम टीका अर्हत्सूत्रवृत्तिका है। तत्त्वार्थसूत्रके एक श्वेताम्बर टिप्पणकार भी इस मतसे परिचित थे,
उन्होंने अपने टिप्पणमें इस मतका उल्लेख कर अपने सम्प्रदायको सावधान करनेका प्रयत्न किया है।$^३$
समीक्षा— इस प्रकार ये पाँच अन्य मत हैं जिनमें तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता कौन हैं इस बातका विचार
किया गया है। इनमेंसे प्रारम्भके तत्त्वार्थभाष्यके उल्लेखको छोड़कर शेष सब उल्लेख लगभग १३वीं
शताब्दीसे पूर्वके नहीं हैं और मुख्यतया वे गृद्धपिच्छ और उमास्वाति इन दो नामोंकी ओर ही किसी रूपमें
संकेत करते हैं।$^४$ एक अन्तिम मत कि आचार्य कुन्दकुन्द तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता हैं अवश्य ही विलक्षण
लगता है किन्तु आचार्य कुन्दकुन्दकी गृद्धपिच्छ इस नामसे ख्याति होनेके कारण ही यह मत प्रसिद्धिमें आया है
ऐसा प्रतीत होता है।$^५$ मुख्य मत दो ही हैं जो यहाँ विचारणीय हैं। प्रथम यह कि आचार्य गृद्धपिच्छ तत्त्वार्थ-
सूत्रके रचयिता हैं और दूसरा यह कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की है।
साधारणतः हम पहले 'तत्त्वार्थसूत्र' इस नामके विषयमें विचार करते हुए 'सूत्रपाठोंमें मतभेद' प्रकरण-
को लिखते हुए और 'पौर्वापर्यविचार' प्रकरण द्वारा सर्वार्थसिद्धि व तत्त्वार्थभाष्य की तुलना करते हुए कई
महत्त्वपूर्ण बातोंपर प्रकाश डाल आये हैं जिनका सारांश इस प्रकार है—
१. वाचक उमास्वातिने तत्त्वाथाधिगम शास्त्रकी रचना की थी। किन्तु यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न
हो कर तत्त्वार्थभाष्यका है।
१. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीका तत्त्वार्थसूत्र, प्रस्तावना पृ० १६। २. देखो मा० ग्र० से प्रकाशित रत्नकरण्डक
की प्रस्तावना, पृष्ठ १४५। ३. पं० कैलाशचन्द्रजीका तत्त्वार्थसूत्र, प्रस्तावना पृ० १७। ४. इसके लिए देखो
हमारे द्वारा लिखे गये तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना। ५. देखो प्रवचनसारकी डॉ० ए० एन० उपाध्येकी भूमिका।