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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 558 में से

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पृष्ठ 69

सातवें अध्यायके अन्तमें जो पुष्पिका उपलब्ध होती है उसमें आये हुए 'उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये'
पदको पण्डितजी भाष्यकार और सूत्रकार एक व्यक्ति हैं इस पक्षमें लगाने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इस पदका
सीधा अर्थ है—उमास्वाति वाचक द्वारा बनाया हुआ सूत्रभाष्य । यहाँ उमास्वातिवाचकोपज्ञ पदका सम्बन्ध
सूत्रसे न होकर उसके भाष्यसे है। दूसरा प्रमाण पण्डितजीने ९वें अध्यायके २२वें सूत्रकी सिद्धसेनीय टीकाको
उपस्थित किया है। किन्तु यह प्रमाण भी सन्देहास्पद है, क्योंकि सिद्धसेन गणिकी टीकाकी जो प्राचीन प्रतियाँ
उपलब्ध होती हैं उनमें 'स्वकृतसूत्रसन्निवेशमाश्रित्योक्तम्' पाठके स्थानमें 'कृतस्तत्र सूत्रसन्निवेशमाश्रित्यो-
क्तम्' पाठ भी उपलब्ध होता है¹। बहुत सम्भव है कि किसी लिपिकारने तत्त्वार्थसूत्रका वाचक उमास्वाति
कर्तृत्व दिखलानेके अभिप्रायसे 'कृतस्तत्र'का संशोधन कर 'स्वकृत' पाठ बनाया हो और बादमें यह पाठ
चल पड़ा हो ।
साधारणतः हमने स्वतन्त्र भावसे सिद्धसेन गणिकी टीकाका आलोडन किया है, इसलिए इस आधारसे
हम यह तो मान लेते हैं कि उसमें कुछ ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जो तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इनको
एककर्तृक सिद्ध करते हैं। उनमेंसे प्रथम उल्लेख प्रथम अध्यायके 'आद्ये परोक्षम्' सूत्रकी सिद्धसेनीय टीका है।
यहाँ पर सिद्धसेन गणि तत्त्वार्थभाष्यके 'सूत्रक्रमप्रामाण्यात् प्रथमद्वितीये शास्ति' अंशकी व्याख्या करते हुए
कहते हैं ।
'ग्रन्थकार एव द्विधा आत्मानं विभज्य सूत्रकारभाष्यकारेणेवमाह—शास्तीति सूत्रकार इति शेषः ।'
अथवा पर्यायभेदात् पर्यायिणो भेद इत्यन्यः सूत्रकारपर्यायोऽन्यश्च भाष्यकारपर्याय इत्यतः सूत्रकारपर्यायः
शास्तीति ।'
इसमें बतलाया गया कि 'ग्रन्थकारने अपनेको सूत्रकार और भाष्यकार इस तरह दो भागोंमें विभक्त कर
'शास्ति' ऐसा कहा है। इसलिए यहाँपर 'शास्ति' क्रियाके साथ उसके कर्त्ताका बोध करानेके लिए 'सूत्रकारः'
पद जोड़ लेना चाहिए। अथवा पर्यायोके भेदसे पर्यायिको भिन्न मान लेना चाहिए। अतः एक ही ग्रन्थकारकी
सूत्रकार पर्याय भिन्न है और भाष्यकार पर्याय भिन्न है, अतः सूत्रकार पर्याय कहती है ऐसा सम्बन्ध कर
लेना चाहिए।
ऐसा ही एक दूसरा उल्लेख अध्याय दोके 'निरुपभोगमन्त्यम्' सूत्रकी सिद्धसेनीय टीकामें मिलता है।
इसमें सूत्रकारसे भाष्यकारको अभिन्न बतलाया गया है। उल्लेख इस प्रकार है—
'सूत्रकारादविभक्तोऽपि हिं भाष्यकारो विभागमदर्शयति व्युच्छित्ति- (पर्याय ) नयसमाश्रयणात् ।'
इस प्रकार यद्यपि इन उल्लेखोंसे यह विदित होता है कि सिद्धसेन गणि तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थ-
भाष्यकार इन दोनों व्यक्तियोंको एक मानते रहे हैं पर इतने मात्रसे यह नहीं माना जा सकता कि यह उनका
निश्चित मत था। उन्होंने अपनी टीकामें कुछ ऐसा भी अभिप्राय व्यक्त किया है जिसके आधारसे विचार
करने पर सूत्रकारसे भाष्यकार भिन्न सिद्ध होते हैं। इसके लिए अध्याय आठके 'मत्यादीनाम्' सूत्रकी टीका
देखना चाहिए ।
यहाँ पर सिद्धसेन गणिके सामने यह प्रश्न है कि जब अन्य आचार्य 'मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम्'
सूत्र मानते हैं तब सूत्रका वास्तविक रूप 'मत्यादीनाम्' माना जाय या अन्य आचार्य जिस प्रकार उसका पाठ
पढ़ते हैं वैसा माना जाय । इस शंकाका समाधान करते हुए पहले तो उन्होंने हेतुओंका आश्रय लिया है किन्तु
इतने मात्रसे स्वयं सन्तोष होता न देख वे कहते हैं कि यतः भाष्यकारने भी इस सूत्रका इसी प्रकार अर्थ
किया अतः 'मत्यादीनाम्' ही सूत्र होना चाहिए। उनका समस्त प्रसंगको व्यक्त करनेवाला टीकावचन इस
प्रकार है—
'अपरे तु प्रतिपदं पञ्चापि पठन्ति - मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानामिति । एवं चापार्थकः पाठो
१. देखो सिद्धसेनीय टीका अ० ९, सू० २२, पृ० २५३ की टिप्पणी ।
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