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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 558 में से

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पृष्ठ 60

५६ सर्वार्थसिद्धि
अवश्य ही टीका लिखते। अभी तो केवल इतना ही कहा जा सकता है कि आचार्य विद्यानन्द इसे तत्त्वार्थ-
सूत्रके कर्ताका मंगलाचरण मानते रहे हैं।'
३. तत्त्वार्थसूत्रकार
पुरानी परम्परा — शास्त्रकी प्रमाणता और अप्रमाणताका प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय है। प्राचीन-
कालमें सभी शास्त्रकार शास्त्रके प्रारम्भमें या अन्तमें अपने नाम, कुल, जाति, वास्तव्यस्थान आदिका उल्लेख
नहीं करते थे, क्योंकि वे उस शास्त्रका अपनेको प्रणेता नहीं मानते थे। उनका मुख्य कार्य परम्परासे प्राप्त
भगवान्‌की द्वादशांग वाणीको संक्षिप्त, विस्तृत या भाषान्तरित कर संकलित कर देना मात्र होता था। वे यह
अच्छी तरहसे जानते थे कि किसी शास्त्रके साथ अपना नाम आदि देनेसे उसकी सर्वग्राह्यता या प्रामाणिकता
नहीं बढ़ती। अधिकतर शास्त्रोंमें स्थल-स्थलपर जिनेन्द्रदेवने ऐसा कहा है१, यह जिनदेवका उपदेश है२, सर्वज्ञ-
देवने जिस प्रकार कहा है उस प्रकार हम कहते हैं३, इन वचनोंके उल्लेखके साथ उनका प्रतिपाद्य विषय चर्चित
होता है। यह क्यों ? इसलिए कि जिससे यह बोध हो कि यह किसी व्यक्तिविशेषका अभिप्राय न होकर
सर्वज्ञदेवकी वाणी या उसका सार है। वस्तुतः किसी शास्त्रके अर्थोपदेष्टा छद्मस्थ न होकर वीतराग सर्वज्ञ
होते हैं। छद्मस्थ गणधर तो उनके अर्थोपदेशको सुनकर उनकी वाणीका ग्रन्थरूपमें संकलनमात्र करते हैं४।
यही संकलन परम्परासे आकर नाना आचार्योंके ज्ञानका विषय होकर अनेक प्रकीर्णक शास्त्रोंको जन्म देता है५।
पूर्वकालीन आचार्य इस तथ्यको उत्तम रीतिसे समझते थे और इसलिए वे नाम रूपके व्यामोहसे मुक्त रहकर
द्वादशांगवाणीके संकलनमें लगे रहते थे। आचार्य पुष्पदन्त, आचार्य भूतबलि, आचार्य गुणधर, आचार्य यति-
वृषभ, आचार्य कुन्दकुन्द, स्वामी समन्तभद्र, आचार्य सिद्धसेन दिवाकर और आचार्य पूज्यपाद प्रभृति ऐसे अनेक
आचार्य हुए हैं जिन्होंने इस मार्गका अनुसरण किया है और भगवान् तीर्थंकरकी वाणीका संकलन कर उसे लोक-
कल्याणके हेतु अर्पित किया है। इतना ही क्यों आचार्य गृद्धपिच्छ भी उन्हींमें से एक हैं जिन्होंने तत्त्वार्थसूत्र जैसे
ग्रन्थरत्नको अवशिष्ट समग्र श्रुतके आधारसे संकलन कर नाम प्रख्यापनके व्यामोहसे अपनेको मुक्त रखा है।
प्राचीन कालमें यह परिपाटी जितनी अधिक व्यापक थी, श्रुतधर आचार्योंका उसके प्रति उतना ही अधिक
आदर था।
इस समय श्रुतधर अनेक आचार्योंके जीवन परिचय और उनके कार्योंके तथ्यपूर्ण इतिहासको संकलित
करनेमें जो कठिनाई आती है उसका कारण यही है। इसे हम कठिनाई शब्दसे इस अर्थमें पुकारते हैं, क्योंकि
यह काल ऐतिहासिक तथ्योंके संकलनका होनेसे इस बातपर अधिक बल दिया जाता है कि कौन आचार्य किस
कालमें हुए हैं, उनका गार्हस्थ्यिक जीवन क्या था और उनके उल्लेखनीय कार्य कौन-कौनसे हैं आदि।
प्रकृतमें हमें तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताके सम्बन्धमें विचार करना है। तत्त्वार्थसूत्रका संकलन आगमिक
दृष्टिसे जितना अधिक सुन्दर और आकर्षक हुआ है उसके रचयिताके विषयमें उतना ही अधिक विवाद है।
जैनसंघकी कालान्तरमें हुई दोनों परम्पराओंके कारण इस विवादको और भी अधिक प्रोत्साहन मिला है।
पहला विवाद तो रचयिताके नामादिके विषयमें है और दूसरा विवाद उनके अस्तित्व कालके विषयमें है।
यहाँ हम सर्वप्रथम उन अभ्रान्त प्रमाणोंको उपस्थित करेंगे जिनसे तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताके निर्णय करनेमें
सहायता मिलती है और इसके बाद विवादके कारणभूत तथ्योंपर प्रकाश डालेंगे।
तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य गृद्धपिच्छ — यह तो हम आगे चल कर देखेंगे कि आचार्य पूज्यपादने विविध
विषयोंपर विशाल साहित्य लिखा है। फिर भी उन्होंने कहीं भी अपने नामका उल्लेख नहीं किया है। इतना
१. 'भणियो खलु सव्वदरसीहिं' समयप्राभूत, गाथा ७० । २. 'एसो जिणोवदेसो' समयप्राभूत, गाथा १५० ।
३. 'सद्दवियारो हूओ भासासुत्तेसु जं जिणे कहियं । सो तह कहियं णायंसीसेण य भद्दबाहुस्स ॥' बोधपाहुड़,
गाथा ६१ । ४. 'तित्थयरभासियत्थं गणहरदेवेहिं गुंथियं सम्मं ।' भावपाहुड, गाथा ९२ । ५. देखो सर्वा०,
अ० १, सू० २० ।