सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरचना मानी जाय तो उसमें यह अन्तर नहीं दिखाई देना चाहिए । 'प्रोषध' शब्दके अर्थको हम छोड़ सकते
हैं, तब भी आठ मूलगुणोंके निर्देश और अनिर्देशका प्रश्न बहुत ही महत्त्व रखता है । पाठक जितने भी
प्राचीनकालकी ओर जायेंगे देखेंगे कि पूर्वकालमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख श्रावकके कर्तव्योंमें अलगसे नहीं
किया जाता था । सर्वप्रथम यह उल्लेख रत्नकरण्डकमें ही दिखलाई देता है ।
श्रीमान् डॉ० हीरालालजी रत्नकरण्डकको श्री स्वामी समन्तभद्रकी कृति माननेमें सन्देह करते हैं ।
उनका यह विचार बननेका मुख्य कारण यह है कि वादिराजसूरिने अपने पार्श्वनाथचरितमें देवागमके कर्ता
स्वामी समन्तभद्रका उल्लेख करनेके बाद पहले 'देव' पद द्वारा जैनेन्द्र व्याकरणके कर्ता आचार्य पूज्यपादका
उल्लेख किया है और इसके बाद रत्नकरण्डकके कर्ताका स्मरण करते हुए उन्हें 'योगीन्द्र' नामसे सम्बोधित किया
है । डॉ० साहब का ख्याल है कि ये 'योगीन्द्र' स्वामी समन्तभद्रसे भिन्न होने चाहिए जो कि आचार्य पूज्य-
पादके बादके प्रतीत होते हैं । यही कारण है कि वादिराजसूरिने अपने पार्श्वनाथचरितमें आचार्य पूज्यपादके
बाद आचार्य योगीन्द्रका स्मरण किया है और उन्हें रत्नकरण्डकका निर्माता कहा है । इसकी पुष्टिमें उन्होंने
और भी कई प्रमाण दिये हैं, पर उनमें मुख्य प्रमाण यही है ।
श्रीमान् पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारने माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित होनेवाले सटीक रत्नकरण्ड-
श्रावकाचारकी प्रस्तावनामें रत्नकरण्डककी अन्तःपरीक्षा करके यह सम्भावना प्रकट की है कि जिस रूपमें
इस समय वह उपलब्ध होता है वह उसका मूलरूप नहीं है । लिपिकारों और टिप्पणकारोंकी असावधानी वश
कई प्रक्षिप्त श्लोक मूलके अंग बन गये हैं² । हमारा अनुमान है कि अष्ट मूलगुणोंका प्रतिपादक यह श्लोक भी
इसी प्रकार मूलका अंग बना है । यद्यपि मुख्तार साहब. आठ मूलगुणोंके प्रतिपादक श्लोकको प्रक्षिप्त नहीं
मानते । उन्होंने इसका कोई खास कारण तो नहीं दिया । केवल उपसंहार करते हुए इतना ही कहा है कि
'इसके न रहनेसे अथवा यों कहिए कि श्रावकाचार विषयक ग्रन्थमें श्रावकोंके मूलगुणोंका उल्लेख न होनेसे,
ग्रन्थमें एक प्रकारकी भारी त्रुटि रह जाती जिसकी स्वामी समन्तभद्र जैसे अनुभवी ग्रन्थकारोंसे कभी आशा
नहीं की जा सकती थी³ ।'
हम यह तो मानते हैं कि केवल वादिराज सूरिके उल्लेखके आधारसे यह तो नहीं माना जा सकता
कि रत्नकरण्डक स्वामी समन्तभद्रकी कृति नहीं है, क्योंकि उन्होंने आचार्योंका उल्लेख सर्वथा कालक्रमके
आधारसे नहीं किया हैं । यथा—वे अध्याय १ श्लोक २० में अकलंकका उल्लेख करनेके बाद २२वें श्लोकमें
सम्मतितर्कके कर्ताका स्मरण करते हैं । यह भी सम्भव है कि किसी लिपिकारकी असावधानीवश रत्नकरण्डक
का उल्लेख करनेवाला पार्श्वनाथचरितका 'त्यागी स एव योगीन्द्रः' श्लोक 'अचिन्त्यमहिमा देवः' इस
श्लोकके बाद लिपिबद्ध हो गया हो । मुद्रित प्रतिमें ये श्लोक इस रूपमें पाये जाते हैं ।
स्वामिनश्चरितं तस्य कस्य नो विस्मयावहम् ।
देवागमेन सर्वज्ञो येनाद्यापि प्रदर्श्यते ॥१, १७॥
अचिन्त्यमहिमा देवः सोऽभिवन्द्यो हितैषिणा ।
शब्दाश्च येन सिद्धयन्ति साधुत्वं प्रतिलम्भिताः ॥१, १८॥
त्यागी स एव योगीन्द्रो येनाक्षय्यसुखावहः ।
अर्थिने भव्यसार्थाय दिष्टो रत्नकरण्डकः ॥१, १९॥
किन्तु इनमेंसे १९ संख्यांकवाले श्लोकको १७ संख्यांकवाले श्लोकके बाद पढ़ने पर 'त्यागी स एव
योगीन्द्रो' इस पद द्वारा स्वामी समन्तभद्रका ही बोध होता हैं और सम्भव है कि वादिराज सूरिने रत्नकरण्डक
का कर्तृत्व प्रकट करनेके अभिप्रायसे पुनः यह श्लोक कहा हो । किन्तु दूसरे प्रमाणोंके प्रकाशमें इसे सम्भावना
द्वारा रत्नकरण्डकको स्वामी . समन्तभद्रकर्तृक मान लेनेपर भी उसमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख अवश्य ही
१. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित पार्श्वनाथचरित, सर्ग १, श्लोक १७, १८ और १९ । २. देखो,
प्रस्तावना पृष्ठ १५ से पृष्ठ ५३ तक । ३. देखो प्रस्तावना पृ० ३२ ।