सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 70, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्यते । ततोऽनन्तरसूत्रे पञ्चादिभेदा ज्ञानावरणादय इत्यवधृतमेव । निर्ज्ञाताश्च स्वरूपतः प्रथमाध्याये
व्याख्यातत्वात् । अतः आदिशब्द एव च युक्तः । भाष्यकारोऽप्येवमेव सूत्रार्थमावेदयते ।'
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य 'भाष्यकारो-' इत्यादि वचन है । इस वचनमें भाष्यकारका सम्बन्ध सीधा
'मत्यादीनाम्' सूत्रकी रचनाके साथ स्थापित न कर उसके अर्थके साथ स्थापित किया गया है । इससे सिद्ध
होता है कि यहाँपर सिद्धसेन गणि सूत्रकारको भाष्यकारसे भिन्न मान रहे हैं, अन्यथा वे किसी अपेक्षासे सूत्र-
कार और भाष्यकारमें अभिन्नता स्थापित कर ऐसी भाषाद्वारा समर्थन करते जिससे भाष्यकारसे अभिन्न सूत्र-
कारने ही 'मत्यादीनाम्' सूत्र रचा है इस बातका दृढ़ताके साथ समर्थन होता ।
जहाँ तक हमारा मत है इन पूर्वोक्त उल्लेखोंके आधारसे हम एक मात्र इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
कि मूल तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार अभिन्न व्यक्ति हैं इस विषयमें सिद्धसेन गणिकी स्थिति संशया-
पन्न रही है, क्योंकि कहीं वे तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार इनको एक व्यक्ति मान लेते हैं और कहीं
दो । इस स्थितिको देखते हुए मालूम ऐसा देता है कि सिद्धसेन गणिके काल तक तत्त्वार्थभाष्यकार ही मूल
तत्त्वार्थसूत्रकार हैं यह मान्यता दृढ़मूल नहीं हो पायी थी । यही कारण है कि सिद्धसेन गणि किसी एक मतका
निश्चयपूर्वक प्रतिपादन करनेमें असमर्थ रहे ।
पण्डितजी—इस प्रकार सिद्धसेन गणिकी टीकाके आधारसे वाचक उमास्वाति तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता
हैं इस बातके अनिर्णीत हो जाने पर भी यहाँ हमें प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीके एतद्विषयक प्रमाणोंका अलगसे
परामर्श कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है । इस विषयमें उन्होंने जिन तीन प्रमाणोंको उपस्थित किया है
उनका हम पहले पृष्ठ ६२ में निर्देश कर आये हैं । उनमेंसे पहला प्रमाण उत्थानिकाकी २२वीं कारिका और
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति है । इन दोनों स्थलोंमेंसे उत्थानिका कारिकामें तत्त्वार्थाधिगम
नामक लघुग्रन्थके कहनेकी प्रतिज्ञा की गयी है और अन्तिम प्रशस्तिमें वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थाधिगम शास्त्र
रचा यह कहा गया है । पण्डितजी इस आधारसे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता वाचक
उमास्वाति ही हैं । किन्तु हम यह पहले ( पृष्ठ १७ में ) ही सिद्ध करके बतला आये हैं कि तत्त्वार्थाधिगम
यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न होकर तत्त्वार्थभाष्यका है । स्वयं वाचक उमास्वाति तत्त्वार्थाधिगमको सूत्र न कह-
कर उसे ग्रन्थ या शास्त्र¹ शब्द द्वारा सम्बोधित करते हैं और आगे तत्त्वार्थाधिगमके रचनेका प्रयोजन बतलाते
हुए २२वीं उत्थानिका कारिकामें कहते हैं कि जिन वचन महोदधि दुर्गमग्रन्थभाष्यपार² होनेसे उसका
समझना कठिन है । ऐतिहासिकोंसे यह छिपी हुई बात नहीं है कि यहाँ वाचक उमास्वातिने आगम ग्रन्थोंके
जिन भाष्योंका उल्लेख किया है वे विक्रमकी ७वीं शताब्दीकी रचना हैं³ । जब कि इनके भी पूर्व तत्त्वार्थसूत्र
पर सर्वार्थसिद्धि प्रभृति अनेक टीकाएँ लिखी जा चुकी थीं । ऐसी अवस्थामें २१वीं उत्थानिका कारिका और
अन्तिम प्रशस्तिके आधारसे वाचक उमास्वातिको मूल तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता सिद्ध करना तो कोई अर्थ
नहीं रखता ।
पण्डितजी की दूसरो युक्तिमें कहा गया है कि तत्त्वार्थभाष्यके आलोडनसे ऐसा लगता है कि
तत्त्वार्थभाष्यमें सूत्रका अर्थ करनेमें कहीं भी खीचातानी नहीं की गयी है आदि । यहाँ विचार इस बातका
करना है कि क्या तत्त्वार्थभाष्यकी वैसी स्थिति है जैसी कि पण्डितजी उसके विषयमें उद्घोषणा करते हैं । इस
दृष्टिसे हमने भी तत्त्वार्थभाष्यका आलोडन किया है किन्तु हमें उसमें ऐसे अनेक स्थल दिखाई देते हैं जिनके
कारण इस दृष्टिसे तत्त्वार्थभाष्यकी स्थिति सन्देहास्पद प्रतीत होती है । यथा—
१ तत्त्वार्थसूत्रमें सम्यग्दर्शनीसे सम्यग्दृष्टिको भिन्न नहीं माना गया है । वहाँ अध्याय ७ सूत्र २३ में
ऐसे सम्यग्दर्शनवालेको भी सम्यग्दृष्टि कहा गया है जिसके शंका आदि दोष सम्भव होते हैं । किन्तु इसके
१. देखो उत्थानिका कारिका २१ व अन्तिम प्रशस्ति तत्त्वार्थभाष्य । २. महतोऽतिमहाविषयस्य दुर्गमग्रन्थ-
भाष्यपारस्य । कः शक्तो प्रत्यासं जिनवचनमहोदधेः कर्तुम् ।। ३. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीके तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रस्तावना पृ० १२ ।