सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० सर्वार्थसिद्धि
विदित होता है कि यह वाक्य आचार्य पूज्यपादने कात्यायनके वार्तिक 'त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्' । ४, २,
१०४ ।' को ध्यानमें रखकर कहा है। आचार्य अभयनन्दिने अपनी वृत्तिमें अवश्य ही 'नेर्ध्रुवम् इति वक्तव्यम् ।'
यह वार्तिक बनाया है । किन्तु वह बादकी रचना है ।
इन तथ्योंके प्रकाशमें यह स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य पूज्यपादने अपनी सर्वार्थसिद्धि टीकामें जैनेन्द्र-
व्याकरणके समान पाणिनीय व्याकरणका भी उपयोग किया है और यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जैनेन्द्रव्याकरण
की रचना होनेके अनन्तर ही उन्होंने सर्वार्थसिद्धि • टीका लिखी थी । अध्याय १० सूत्र ४ की सर्वार्थसिद्धि
टीकामें आचार्य पूज्यपादने पंचमी विभक्तिके लिए 'का' संज्ञाका प्रयोग किया है। आचार्य पूज्यपादने अपने
जैनेन्द्रव्याकरणमें 'विभक्ती' शब्दके व्यंजन अक्षरोंमें 'आ' और स्वरोंमें 'प्' जोड़कर क्रमसे विभक्तियोंको वा,
इप्, भा, अप्, का, ता, ईप् ये सात संज्ञाएँ निश्चित की हैं। इस हिसाबसे 'का' यह पंचमी विभक्तिका संकेत
है। यह भी एक ऐसा प्रमाण है जो इस बातको सूचित करता है कि सर्वार्थसिद्धि लिखे जानेके पहले जैनेन्द्र-
व्याकरणकी रचना हो गयी थी ।
कात्यायनवार्तिक—पाणिनीयके व्याकरण सूत्रोंपर कात्यायन महर्षिने वार्तिक लिखे हैं। अध्याय ७
सूत्र १६ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें आचार्य पूज्यपाद ने शास्त्र कहकर उनके 'अश्ववृषमयोगैर्मुनेच्छायाम् ।'
इस वार्तिकको उद्धृत किया है। यह पाणिनिके ७, १, ५१ पर कात्यायनका पहला वार्तिक है ।
पातंजल महाभाष्य — वैदिक परम्परामें पतंजलि ऋषि एक महान् विद्वान् हो गये हैं। इस समय
पाणिनीय व्याकरणपर जो पातंजल महाभाष्य उपलब्ध होता है वह इन्हीं की अमर कृति है। योगदर्शनके
लेखक भी यही हैं। यह इससे स्पष्ट है—
'योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ।
योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ।'
जिन्होंने योगके द्वारा चित्तके मलको, व्याकरण के द्वारा वचनोंके मलको और वैद्यकद्वारा शरीरके
मलको दूर किया है उन मुनियोंमें श्रेष्ठ पतंजलि ऋषिके समक्ष मैं नतमस्तक होता हूँ ।
पतंजलि ऋषिके अवस्थिति कालके विषयमें मतभेद है। तथापि ये विक्रमपूर्व द्वितीय शताब्दीसे पहले
नहीं हुए हैं इतना निश्चित है। इस समय हमारे सामने पातंजल महाभाष्य और सर्वार्थसिद्धि उपस्थित हैं।
इन दोनोंका तुलनात्मक अध्ययन करनेसे विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादके साहित्यपर और खासकर
सर्वार्थसिद्धिपर पातंजल महाभाष्य की गहरी छाप पड़ी है। दोनोंका अवलोकन करनेसे विदित होता है कि
सर्वार्थसिद्धिके ऐसे अनेक स्थल हैं जो पातंजल महाभाष्यके आश्रयसे सजाये गये हैं। इस बातको स्पष्ट करनेके
लिए आगेकी तुलनापर दृष्टि डालिए—
| पातंजल महाभाष्य | सर्वार्थसिद्धि |
|---|---|
| अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वेति । | अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा । |
| बहवो हि शब्दाः, एकार्था भवन्ति । तद्यथा इन्द्रः, | सत्यपि प्रकृतिभेदे रूढिबललाभात् पर्यायशब्द- |
| शक्रः, पुरुहूतः, पुरन्दरः । | त्वम् । यथा—इन्द्रः, शक्रः, पुरन्दर इति । |
| अनुदरा कन्येति | यथा, अनुदरा कन्या इति । |
| अस्त्येव संख्यावाची । तद्यथा, एको द्वौ बहव | संख्यावाची यथा—एको द्वौ बहव इति । |
| इति । | |
| बहुरोदनो बहुः सूप इति । | बहुरोदनो बहुः सूप इति । |
| सिद्धे विधिरारभ्यमाणो ज्ञापकार्थो भवति । | सिद्धे विधिरारभ्यमाणे नियमार्थः । |
| हि मन्यै रथेन यास्यसीति | एहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यति यातस्ते |
| पितेति । |
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri