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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 558 में से

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पृष्ठ 72

६८ सर्वार्थसिद्धि
भाष्यकार एक ही व्यक्ति हैं। किन्तु पण्डितजी की यह कोई पुष्ट दलील नहीं है। अक्सर टीकाकार मूलकारसे
तादात्म्य स्थापित कर इस प्रकारकी क्रियाओंका प्रयोग करते हैं। उदाहरणके लिए देखो अध्याय १ सूत्र १ की
सर्वार्थसिद्धि टीका$^{१}$, अध्याय ८ सूत्र १ की उत्थानिका तत्त्वार्थवार्तिक$^{२}$, अध्याय ८ सूत्र १ की उत्थानिका
हरिभद्रकी टीका$^{३}$ व अध्याय १० सूत्र १ की उत्थानिका सिद्धसेन गणिकी टीका। यहाँ सिद्धसेन गणि कहते
हैं 'सम्प्रति तत्फलं मोक्षः, तं वक्ष्यामः ।' स च केवलज्ञानोत्पत्तिमन्तरेण न जातुचिदभूद् भवति भविष्यति
अतः केवल्योत्पत्तिमेव तावद् वक्ष्यामः । इसलिए इस आधारसे भी तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वाति
तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता नहीं सिद्ध होते ।
श्वेताम्बर पट्टावलियाँ- श्वेताम्बर पट्टावलियोंके देखनेसे भी इस स्थितिकी पुष्टि होती है । इनमें
सबसे पुरानी कल्पसूत्र स्थविरावली और नन्दिसूत्रकी पट्टावलि है । किन्तु इनमें समय नहीं दिया है। समय
गणना बहुत पीछेकी पट्टावलियोंमें है। कहा जाता है कि नन्दिसूत्र पट्टावली वि० सं० ५१० में संकलित हुई
थी। इनमें उमास्वाति व उनके गुरुओंके नाम नहीं हैं।
पिछले कालकी रची गयी पट्टावलियोंमेंसे धर्मघोषसूरिकृत दुःषमाकाल श्रमणसंघ स्तव एक है । इसकी
रचना विक्रमकी तेरहवीं सदीमें हुई अनुमानित की जाती है । इसमें उमास्वातिक नाम हरिभद्र और जिन-
भद्रके बाद आता है पर हरिभद्रने उमास्वातिके तत्त्वार्थभाष्य पर टीका लिखी है। ये विक्रमकी ८वीं-९वीं
सदीके विद्वान् हैं अतएव आचार्योंकी क्रम-परम्पराकी दृष्टिसे इस पट्टावलीको विशेष प्रमाण नहीं माना जा
सकता । इसमें वि० सं० ७२० में वाचक उमास्वातिकी अवस्थिति स्वीकार की गयी है ।
धर्मसागर गणिकृत तपागच्छ पट्टावली वि० सं० १६४६ में लिखी गयी थी। इसमें जिनभद्रके बाद
विबुधप्रभ, जयानन्द और रविप्रभका उल्लेख करनेके बाद उमास्वार्तिका नाम निर्देश किया है और इनका
समय वि० सं० ७२० बतलाया है। यद्यपि इन्होंने आर्यमहागिरिके बहुल और बलिसह नामक दो शिष्योंमें-
से बलिसहके शिष्य उमास्वातिक उल्लेख कर इन प्रथम उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता होनेकी सम्भा-
वना की है। किन्तु उनकी यह सम्भावना भ्रमजन्य है। कारण कि नन्दिसूत्र पट्टावलीकी २६वीं गाथामें
'हारियगुत्तं साइं च वंदे ।' पद आता है। जिसमें हारितगोत्रीय स्वातिका उल्लेख है। मालूम पड़ता है धर्म-
सागर गणिने नामकी आंशिक समता देखकर द्वितीयके स्थानमें भ्रमसे इन्हें ही तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता होनेकी
आशंका की है। पं० सुखलालजीने भी इस आशंकाको भ्रममूलक बतलाया है।$^{४}$
विनयविजय गणिने अपना लोकप्रकाश वि० सं० १७०८ में पूरा किया था। वे उमास्वातिको युग-
प्रधान आचार्य बतलाते हैं और जिनभद्र तथा पुष्पमित्रके बीच उनकी अवस्थिति स्वीकार करते हैं। इन्होंने
अपनी पट्टावलिमें उमास्वातिके समयका निर्देश नहीं किया है ।
रविवर्धन गणि (वि० सं० १७३९ ) ने भी पट्टावलीसारोद्धारमें उमास्वात्तिका उल्लेख किया है।
इसमें समयका निर्देश करते हुए वास्तव्वकाल वीर नि० सं० ११९० (वि० सं० ७२०) स्वीकार किया है ।$^{५}$
श्वेताम्बर परम्पराकी ये पट्टावलियाँ हैं जिनमें उमास्वातिक निर्देश किया है। यद्यपि ये पट्टावलियाँ
अपेक्षाकृत अर्वाचीन हैं और इनमें कुछ मतभेद है तथापि इनको सर्वथा निराधार मानना उचित नहीं है।
इनमें निर्दिष्ट वस्तुके आधारसे निम्नलिखित तथ्य फलित होते हैं-
१. वाचक उमास्वाति युगप्रधान आचार्य थे। वे वि० सं० ७२० के आसपास हुए हैं। बहुत सम्भव
है कि इसी कारणसे नन्दिसूत्र पट्टावली और कल्पसूत्र स्थविरावलिमें इनकी परम्पराका किसी भी प्रकारका
उल्लेख नहीं किया है।
२. यद्यपि रविवर्धन गणिने जिनभद्र गणिके पूर्व वाचक उमास्वात्तिका उल्लेख किया है परन्तु
१. एतेषां स्वरूपं लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्देश्यामः । २. अवसरप्राप्तं बन्धं व्याख्यास्महे ।
३. बन्ध इति वर्तते । एतच्चोपरिष्टाद्दर्शयिष्यामः । ४. देखो उनका तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृष्ठ २। ५ ये चारों
पट्टावलियाँ मुनिदर्शनविजय द्वारा सम्पादित श्री पट्टावलीसमुच्चय प्रथम भागमें मुद्रित हुई हैं।