सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० सर्वार्थसिद्धि
हुए कुसुमपुर नामके महानगरमें रचा है। जो इस तत्त्वार्थाधिगमको जानेगा और उसमें कथित मार्गका
अनुसरण करेगा वह अव्याबाध सुख नामके परमार्थको शीघ्र ही प्राप्त करेगा¹।'
इसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्यके प्रारम्भमें जो ३१ उत्थानिका कारिकाएँ उपलब्ध होती हैं उनमेंसे २२वीं
कारिकामें कहा गया है कि 'अर्हद्वचनके एकदेशके संग्रह रूप और बहुत अर्थवाले इस तत्त्वार्थाधिगम नामवाले
लघु ग्रन्थको मैं शिष्योंके हितार्थ कहता हूँ।'
प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी उत्थानिकाकी इस कारिका और अन्तिम प्रशस्तिको विशेष महत्त्व देते
हैं²। वे इन्हें मूल सूत्रकारकी मानकर चलते हैं।
इसके सिवा उन्होंने तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार इनको अभिन्न सिद्ध करनेके लिए दो
युक्तियाँ और दी हैं—
क. 'प्रारम्भिक कारिकाओंमें और कुछ स्थानोंपर भाष्यमें भी 'वक्ष्यामि', 'वक्ष्यामः' आदि प्रथम
पुरुषका निर्देश है और इस निर्देशमें की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार ही बादमें सूत्रमें कथन किया गया है; इससे
सूत्र और भाष्य दोनोंको एककी कृति माननेमें सन्देह नहीं रहता।
ख. शुरूसे अन्ततक भाष्यको देख जानेपर एक बात मनमें बैठती है और वह यह है कि किसी
भी स्थलपर सूत्रका अर्थ करनेमें शब्दोंकी खींचातानी नहीं हुई, कहीं भी सूत्रका अर्थ करनेमें सन्देह या विकल्प
करने में नहीं आया, इसी प्रकार सूत्रकी किसी दूसरी व्याख्याको मनमें रखकर सूत्रका अर्थ नहीं किया गया
और न कहीं सूत्रके पाठभेदका ही अवलम्बन लिया गया है।³
पं० नाथूरामजी प्रेमीका लगभग यही मत है। इस विषयका उनका अन्तिम लेख भारतीय विद्याके
तृतीय भागमें प्रकाशित हुआ है। इन्होंने तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्यको अभिन्नकर्तृक सिद्ध करते समय
पं० सुखलालजीकी उक्त तीनों युक्तियोंको ही कुछ शब्दोंके हेरफेरके साथ उपस्थित किया है। मात्र इन दोनों
विद्वानोंके मतोंमें यदि कुछ अन्तर प्रतीत होता है तो इतना ही कि पं० सुखलालजी वाचक उमास्वातिको
सवस्त्र श्वेताम्बरपरम्पराका और प्रेमीजी यापनीय परम्पराका मानते हैं।
२. श्रवणवेल्गोलाके चन्द्रगिरि पर्वतपर कुछ ऐसे शिलालेख पाये जाते हैं जिनमें गृद्धपिच्छ उमास्वाति-
को तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता कहा गया है। इन शिलालेखोंमेंसे ४०, ४२, ४३, ४७ और ५० वें शिलालेखोंमें गृद्ध-
पिच्छ विशेषणके साथ मात्र उमास्वातिको उल्लेख है और १०५ व १०८ वें शिलालेखोंमें उन्हें तत्त्वार्थसूत्रका
कर्ता कहा गया है। ये दोनों शिलालेख डॉ० हीरालालजीके मतानुसार⁴ क्रमशः शक सं० १३२० और शक
सं० १३५५ के माने जाते हैं। शिलालेख १५५ का उद्धरण इस प्रकार है—
'श्रीमानुमास्वातिरथं यतीशस्तत्त्वार्थसूत्रं प्रकटीचकार।
यन्मुक्तिमार्गाचरणोद्यतानां पाथेयमर्घ्यं भवति प्रजानाम् ॥१५॥
तस्यैव शिष्योऽजनि गृद्धपिच्छद्वितीयसंज्ञस्य बलाकपिच्छः।
यत्सूक्तिरत्नानि भवन्ति लोके मुक्त्यंगनामोहनमण्डनानि ॥१६॥'
यतियोंके अधिपति श्रीमान् उमास्वातिने तत्त्वार्थसूत्रको प्रकट किया जो मोक्षमार्गके आचरणमें उद्यत
हुए प्रजा जनोंके लिए उत्कृष्ट पाथेयका काम देता है। गृद्धपिच्छ है दूसरा नाम जिनका ऐसे उन्हीं उमास्वाति-
के एक शिष्य बलाकपिच्छ थे। जिनके सूक्तिरत्न मुक्त्यंगनाके मोहन करनेके लिए आभूषणोंका काम देते हैं।
१. देखो तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति। २. देखो उनके द्वारा लिखित तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रस्तावना । ३. पं० सुखलालजीके तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना, पृष्ठ २१ । ४. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे
प्रकाशित शिला-लेख संग्रह, भाग १ ।