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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 558 में से

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पृष्ठ 73

प्रस्तावना ६९
समयकी दृष्टिसे रविवर्धन गणिने उन्हें जिनभद्रगणिके बादका ही बतलाया है, अतः उक्त सब पट्टावलियोंमें
एकमत होकर स्वीकार किये गये वास्तव कालका विचार करते हुए अन्य प्रमाणोंके प्रकाशमें अधिक सम्भव
यही दिखाई देता है कि ये जिनभद्र गणिके बाद ही हुए हैं।
३. एक प्रशस्ति तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें भी उपलब्ध होती है जिसमें वाचक उमास्वातिने स्वयंको
तत्त्वार्थाधिगम शास्त्रका रचयिता कहा है। किन्तु इसमें समयादिका कुछ निर्देश न होनेसे यह प्रशस्ति समय
सम्बन्धी पूर्वोक्त तथ्यकी पूरक ही प्रतीत होती है।
यह तो हम अनेक प्रमाणोंके आधारसे पहले ही स्वीकार कर आये हैं कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थ-
भाष्यकी रचना की और तत्त्वार्थभाष्यमें स्वीकृत तत्त्वार्थसूत्रके पाठको संस्कारित कर अन्तिम रूप दिया, इस-
लिए इस रूपमें इन तथ्योंको स्वीकार कर लेने पर भी वाचक उमास्वाति मूल तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता नहीं ठहरते,
और हमारा ऐसा मानना अनुचित भी नहीं है क्योंकि विक्रमकी आठवीं शताब्दीके पूर्व ६वीं शताब्दीके
प्रारम्भमें या इसके कुछ काल पूर्व तत्त्वार्थसूत्र पर सर्वार्थसिद्धि टीका लिखी जा चुकी थी तथा अनेक टीका-
टिप्पणियाँ प्रचलित हो चुकी थीं।
यद्यपि धर्मसागर गणी, बलिसहके शिष्य स्वातिने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की, ऐसी शंका करते हैं,
किन्तु यह उनका निश्चित मत नहीं है। केवल सम्भावना मात्र है। जैसा कि उनके इन शब्दोंसे प्रकट है।
यथा—'तस्य बलिसहस्य शिष्यः स्वातिः तत्त्वार्थादयो ग्रन्थास्तु तत्कृता एव सम्भाव्यन्ते ।' अतएव इसे
विशेष महत्त्व नहीं दिया जा सकता ।
यहाँ तक हमने पाँच मतोंकी समीक्षा की। मात्र एक प्रमुख मत शेष रहता है जिस पर यहाँ तीन
दृष्टियोंसे विचार करना है—नाम, परम्परा और समय ।
नाम—यह हम प्रारम्भमें ही उद्धरणोंके साथ लिख आये हैं कि आचार्य वीरसेन और आचार्य
विद्यानन्द तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताका नाम आचार्य गृद्धपिच्छ घोषित करते हैं और ये उल्लेख अपेक्षाकृत प्राचीन
हैं। किन्तु इन उल्लेखों को छोड़कर दिगम्बर परम्परामें अन्य जितने उल्लेख मिलते हैं उनमें गृद्धपिच्छको
उपपद या दूसरा नाम मान कर नानारूपता दिखाई देती है। इनमेंसे कुछ प्रमुख उल्लेखोंका निर्देश हम 'अन्य
मत' शीर्षकके अन्तर्गत कर आये हैं। इसी तरहका एक प्रमुख मत नन्दिसंघकी पट्टावलीका है। नन्दिसंघकी
दो पट्टावलियाँ उपलब्ध होती हैं—एक संस्कृत पट्टावली और दूसरी प्राकृत पट्टावली। इनमेंसे संस्कृत पट्टा-
वलिमें आचार्य उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता कहा गया है।
यहाँ देखना यह है कि तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताके नामके विषयमें इतना मतभेद होनेका कारण क्या है और
उनका ठीक नाम क्या है ?
पहले हम श्रवणवेलगोलमें पाये जानेवाले शिलालेख १०५ और १०८ के उद्धरण उपस्थित कर आये
हैं। वे शिलालेख क्रमशः शक सं० १३२० और १३५५ के अनुमानित किये गये हैं। शक सं० १०३७ और
१०८५ के भी दो शिलालेख वहाँ उपलब्ध होते हैं जो जैन शिलालेख संग्रह भाग १ में क्रमशः ४७ और ४०
नम्बर पर दर्ज हैं। ४७ नं० के शिलालेखमें कहा गया है—
'श्री गौतम गणधरके अन्वयमें नन्दिसंघके प्रमुख आचार्य पद्मनन्दी हुए जिनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द
था। फिर उनके अन्वयमें गृद्धपिच्छ अपर नामवाले उमास्वाति आचार्य हुए । इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे और
बलाकपिच्छके शिष्य गुणनन्दि थे ।'
नं० ४० के शिलालेखमें कहा गया है कि 'गौतम गणधरके बाद पांचवें श्रुतकेवली भद्रबाहु और
उनके शिष्य चन्द्रगुप्त हुए। इसके बाद उनके अन्वयमें पद्मनन्दी हुए। इनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द था।
फिर इनके अन्वयमें गृद्धपिच्छ उमास्वाति आचार्य हुए। इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे। इस प्रकार महान्
आचार्योंकी परम्परामें क्रमशः आचार्य समन्तभद्र हुए ।'
नं० १०५ और १०८ के शिलालेखोंमें, जिनका उल्लेख हम पहले कर आये हैं, लगभग यही बात