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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 558 में से

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पृष्ठ 66

६२ सर्वार्थसिद्धि
२. सूत्रपाठोंमें मतभेदका उल्लेख करते समय यह सिद्ध करके बतलाया गया है कि यदि तत्त्वार्थसूत्र
और तत्त्वार्थभाष्यके कर्ता एक ही व्यक्ति होते और श्वेताम्बर आचार्य इस तथ्यको समझते होते तो श्वेताम्बर
सूत्रपाठमें जितना अधिक मतभेद उपलब्ध होता है वह नहीं होना चाहिए था ।
३. सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यके पौर्वापर्यका विचार करते समय हम बतला आये हैं कि वाचक
उमास्वातिके तत्त्वार्थभाष्य लिखे जानेके पहले ही तत्त्वार्थसूत्रपर अनेक टीका-टिप्पणियाँ प्रचलित हो गयी थीं।
वहाँ हमने एक ऐसे सूत्रका भी उल्लेख किया है जो सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठसे सम्बन्ध रखता है और जिसे
वाचक उमास्वातिने अपने तत्त्वार्थभाष्यमें उद्धृत किया है। अर्थविकासकी दृष्टिसे विचार करते हुए इसी
प्रकरणमें यह भी बतलाया गया है कि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यको सामने रख कर विचार करनेपर यह
स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसे कई प्रसंग हैं जो तत्त्वार्थभाष्यको सर्वार्थसिद्धिके बादकी रचना ठहराते हैं।
और यह सिद्ध करते समय हमने एक उदाहरण यह भी दिया है कि कालके उपकार प्रकरणमें परत्वा-
परत्वके सर्वार्थसिद्धिमें केवल दो भेद किये गये हैं जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें वे तीन उपलब्ध होते हैं।
इसलिए इन व दूसरे तथ्योंसे यह स्पष्ट हो जानेपर भी कि वाचक उमास्वाति आद्य सूत्रकार नहीं
होने चाहिए, इस विषयके अन्तिम निर्णयके लिए कुछ अन्य बातोंपर भी दृष्टिपात करना है।
किसी भी रचयिताके सम्प्रदाय आदिका निर्णय करनेके लिए उस द्वारा रचित शास्त्र ही मुख्य प्रमाण
होता है। किसी भी शास्त्रमें कुछ ऐसे बीज होते हैं जो उस शास्त्रके रचनाकाल व शास्त्रकारके सम्प्रदाय
आदिपर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। तत्त्वार्थसूत्रकारके समयादिकका विचार करते समय प्रज्ञाचक्षु पं० सुख-
लालजीने भी इस सरणिको¹ अपनाया है। किन्तु वहाँ उन्होंने तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इन दोनोंको
एककर्तृक मानकर इस बातका विचार करनेका प्रयत्न किया है। इससे बहुत बड़ा घोटाला हुआ है। वस्तुतः
इस बातका विचार केवल तत्त्वार्थसूत्रको और उसमें भी तत्त्वार्थसूत्रके उन सूत्रोंको सामने रखकर ही होना
चाहिए जो तत्त्वार्थसूत्रमें दोनों सम्प्रदायोंको मान्य हों। इससे निष्पक्ष समीक्षा द्वारा किसी एक निर्णयपर
पहुँचनेमें बहुत बड़ी सहायता मिलती है।
चार सूत्र—यह तो स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रके दो सूत्रपाठ हो जानेपर भी अधिकतर सूत्र ऐसे हैं जो
दोनों सम्प्रदायोंको मान्य हैं और उनमें भी कुछ ऐसे सूत्र अपने मूलरूपमें रहे आये हैं जिनसे रचयिताकी स्थिति
आदिपर प्रकाश पड़ता है। यहाँ हम इस विचारणामें ऐसे सूत्रोंमेंसे मुख्य चार सूत्रोंको उपस्थित करते हैं—
प्रथम तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धके कारणोंका प्रतिपादक सूत्र, दूसरा बाईस परीषहोंका प्रतिपादक सूत्र, तीसरा
केवली जिनके ग्यारह परीषहोंके सद्भावका प्रतिपादक सूत्र और चौथा एक जीवके एक साथ कितने परीषह
होते हैं इसका प्रतिपादक सूत्र।
१. तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धके कितने कारण हैं इसका उल्लेख दोनों परम्पराओंके मूल आगम करते
हैं। दिगम्बर परम्पराके बंधसामित्तविचयंमें वे ही सोलह कारण उल्लिखित हैं जो लगभग तत्त्वार्थसूत्रमें उसी
रूपमें स्वीकार किये गये हैं। तुलनाके लिए देखिए—
दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ भक्तितस्त्यागतपसो
साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिमार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति
तीर्थंकरत्वस्य ॥ —तत्त्वार्थसूत्र ७,२४ ।
दंसणविसुज्झिदाए विणयसंपण्णदाए सीलव्वदेसु णिरदिचारदाए आवासेसु अपरिहीणदाए खण-
लवपडिवुज्झणदाए लद्धिसंवेगसंपण्णदाए जधा थामे तथा तवे साहूणं पासुअपरिचागदाए साहूणं समाहि-
संधारणाए साहूणं वेज्जावच्चजोगजुत्तदाए अरहंतभत्तीए बहुसुदमत्तीए पवयणमत्तीए पवयणवच्छलदाए
पवयणप्पभावणदाए अमिक्खणं अमिक्खणं णाणोवजोगजुत्तदाए इच्छेदेहि सोलसेहि कारणेहिं जीवा
तित्थयरणामगोदं कम्मं बंधंति । —बंधसामित्तविचय ७ सु० ४१ ।
१. देखो पं० सुखलालजी द्वारा लिखित तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना, पृ० ८ आदि ।