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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

५२ सर्वार्थसिद्धि
तक जितने प्राचीन उल्लेख मिलते हैं उनसे इसी तथ्यकी पुष्टि होती है¹ । स्वयं प्रभाचन्द्र आचार्य जिन्होंने कि
इस पर विस्तृत संस्कृत टीका लिखी है, इसे स्वामी समन्तभद्रकी ही कृति मानते हैं। जैसा कि इसके प्रत्येक
अध्यायके अन्तमें पायी जानेवाली पुष्पिकासे विदित होता है² । ऐसी अवस्थामें आचार्य पूज्यपादके सामने
सर्वार्थसिद्धि लिखते समय रत्नकरण्डक अवश्य होना चाहिए। आगे हम इन दोनों ग्रन्थोंके कुछ ऐसे उल्लेख
उपस्थित करते हैं जिससे इस विषयके अनुमान करनेमें सहायता मिलती है। उल्लेख इस प्रकार हैं:—
१ रत्नकरण्डकमें व्रतका स्वरूप इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
‘अमिसन्धिक्कृता विरतिर्विषयाद्योगाद् व्रतं भवति ॥३,१०॥’
इसी बातको सर्वार्थसिद्धिमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
व्रतमभिसन्धिक्कृतो नियमः । ७-१।
रत्नकरण्डकमें अनर्थदण्डके ये पांच नाम दिये हैं—पापोपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुःश्रुति और
प्रमादचर्या । सर्वार्थसिद्धिमें भी ये ही पांच नाम परिलक्षित होते हैं। इतना ही नहीं इनके कुछ लक्षणोंके
विषयमें भी अपूर्व शब्दसाम्य दृष्टिगोचर होता है। यथा—
‘तिर्यक्क्लेशवाणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् ।
कथाप्रसंगप्रसवः स्मर्त्तव्यः पाप उपदेशः ॥’ रत्न० ३ ।।
‘तिर्यक्क्लेशवाणिज्यप्राणिवधकारम्भादिषु पापसंयुक्तं वचनं पापोपदेशः ।’ सर्वा० ७, २१ ।
‘क्षितिसलिलदहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदम् ।
सरणं सारणमपि च प्रमादचर्यां प्रभाषन्ते ॥’ रत्न ३, ३४ ।
‘प्रयोजनमन्तरेण वृक्षादिच्छेदनभूमिकुट्टनसलिलसेचनाद्यवद्यकर्म प्रमादाचरितम् ।’ सर्वा० २१ ।
इन दोनों ग्रन्थोंमें भोगोपभोगव्रत या उपभोगपरिभोगव्रतके निरूपणमें जो अर्थ और शब्दसाम्य दृष्टि-
गोचर होता है वह तो और भी विलक्षण है। दोनोंमें भोग और उपभोगके प्रकार दिखलाकर त्रसघात,
बहुघात और अनिष्टके त्यागका उपदेश दिया गया है। मात्र रत्नकरण्डकमें इनके सिवा अनुपसेव्यके त्यागका
निर्देश विशेषरूपसे किया गया है। रत्नकरण्डकके उल्लेख इस प्रकार हैं—
‘त्रसहतिपरिहरणार्थं क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहृतये ।
मद्यं च वर्जनीयं जिनचरणौ शरणमुपयातैः ॥’ ३, ३८ ॥
‘अल्पफलबहुविघातान्मूलकमाद्राणि शृङ्गवेराणि ।
नवनीतनिम्बकुसुमं कैतकमित्येवमवहेयम् ॥ ३, ३९ ॥
यदनिष्टं तद् व्रतयेद्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् ॥३, ४० ॥’
इसी विषयको सर्वार्थसिद्धिमें देखिए—
‘मधु मांसं मद्यं च सदा परिहर्त्तव्यं त्रसघातानिवृत्तचेतसा । केतक्यर्जुनपुष्पादीनि शृङ्गवेरमूलकादीनि
बहुजन्तुयोनिस्यानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि परिहर्त्तव्यानि बहुघाताल्पफलत्वात् । यानवाहनाभरणादिष्वे-
तावदेवेष्टमतोऽन्यदनिष्टमित्यनिष्टान्निवर्त्तनं कर्तव्यम्•••••••• ।’ ७, २२ ।
इतने विलक्षण साम्यके होते हुए भी इन दोनों ग्रन्थोंमें कुछ विशेषता है। प्रथम विशेषता तो यह है
कि रत्नकरण्डकमें ‘प्रोषध’ शब्दका अर्थ ‘सत्कृद्भुक्ति’ किया है और सर्वार्थसिद्धि में ‘पर्व’ । तथा दूसरी
विशेषता यह है कि रत्नकरण्डकमें आठ मूलगुणोंका स्वतन्त्र रूपसे उल्लेख किया है जब कि सर्वार्थसिद्धिमें
इनकी यत्किंचित् भी चर्चा नहीं की है। इसलिए शंका होती है कि यदि सर्वार्थसिद्धि रत्नकरण्डकके बादकी
१. देखो पं० जुगलकिशोरजी द्वारा सम्पादित और श्रीमाणिकचन्द्र ग्रन्थमाला बम्बईसे प्रकाशित रत्नकरण्ड
श्रावकाचारकी प्रस्तावना, पृ० ५ से पृ० १५ तक । २. इति प्रभाचन्द्र विरचितायां समन्तभद्रस्वामिविरचितो-
पासकाध्ययनटीकायां प्रथमः परिच्छेदः ।