सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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इसका यह अर्थ नहीं कि अन्तरंग कारणोंके अनुसार जहाँ जितने परीषहोंका उल्लेख उन्होंने किया है वहाँ
उतने परीषहोंका सद्भाव वे नियमसे मानते ही हैं। उन्होंने परीषह प्रकरणके अन्तिम सूत्रमें परीषहोंका कार्यके
अनुसार भी अलगसे विधान किया है। वे कहते हैं कि यद्यपि कुल परीषह बाईस हैं तथापि एक जीवके एक
साथ एकसे लेकर उन्नीस तक परीषह हो सकते हैं। स्पष्ट है कि इस अन्तिम सूत्रके प्रकाशमें यह अर्थ नही
फलित किया जा सकता है कि जिस प्रकार तत्त्वार्थसूत्रकारने अधिकारी भेदसे कहाँ कितने परीषह होते हैं
इस बातका विधान किया है उसी प्रकार उन्हें सर्वत्र उनका कार्य भी इष्ट है। इसका तो केवल इतना ही
अर्थ है कि अन्तरंग कारणोंके अनुसार सर्वत्र परीषहोंकी सम्भावना स्वीकार कर लेने पर भी यदि उन
परीषहोंके जो अन्य बाह्य निमित्त हैं वे नहीं मिलते तो एक भी परीषह नहीं होते। तभी तो सूत्रकार १ परी-
षहसे लेकर १९ परीषह तक होने रूप विकल्पका कथन करते हैं। यथा किसी प्रमत्तसंयत साधुके सब कर्मोंका
उदय होनेसे सब परीषह सम्भव हैं पर उनके परषहोंके बाह्य निमित्त एक भी नहीं हैं तब उन्हें एक भी
परीषहका वेदन न होगा। यदि एक परीषहका बाह्य निमित्त है तो एक परीषहका वेदन होगा और अधिक
परीषहोंके बाह्य निमित्त उपस्थित हैं तो अधिक परीषहोंका वेदन होगा। तात्पर्य यह है कि केवल अन्तरंग
कारणोंके सद्भावसे परीषहोंका वेदन कार्य नहीं माना जा सकता। स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रकारकी दृष्टि केवल
अन्तरंग कारणोंके सद्भावमें उनके कार्यको स्वीकार करनेकी नहीं है। उन्होंने तो मात्र अन्तरंग कारणोंकी
दृष्टिसे सर्वत्र उनका उल्लेखमात्र किया है।
इस दृष्टिसे हमने श्वेताम्बर आगम साहित्यका आलोडन किया है। किन्तु वहाँ तत्त्वार्थसूत्रकारकी
दृष्टिसे सर्वथा भिन्न दृष्टि अपनायी गयी प्रतीत होती है। वहाँ जहाँ जितने परीषह सम्भव हैं उनमेंसे विरोधी
परीषहोंको छोड़कर सबके वेदनकी बात स्वीकार की गयी है। वहाँ यह स्वीकार ही नहीं किया गया है कि
कोई एकका वेदन करता है, कोई दो का और कोई अधिकसे अधिक इतनेका वेदन करता है। वहाँ तो एक
मात्र यही बतलाया गया है कि 'जो सात या आठ कर्मोंका बन्ध करते हैं उनके सब परोषह सम्भव हैं परन्तु
वे एक साथ वेदन मात्र बीसका करते हैं। जो छह कर्मका बन्ध करते हैं उनके चौदह परीषह सम्भव हैं
परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका करते हैं। जो वीतराग छद्मस्थ एक कर्मका बन्ध करते हैं उनके भी
चौदह परीषह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका ही करते हैं। जो एक कर्मका बन्ध करनेवाले
सयोगी जिन हैं उनके परीषह तो ग्यारह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र नौका करते हैं। तथा जो
अबन्धक अयोगी जिन हैं उनके भी परीषह तो सयोगी जिनके समान ग्यारह ही सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ
वेदन मात्र नौका करते हैं ।¹
इसलिए यहाँ भी तत्त्वार्थसूत्र और श्वेताम्बर आगम साहित्यके तुलनात्मक अध्ययनसे हम इसी
निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'एकादश जिने' सूत्रका विधान करते हुए भी तत्त्वार्थसूत्रकार जितने अधिक दिगम्बर
परम्पराके नजदीक हैं उतने श्वेताम्बर परम्पराके नजदीक नहीं।
यह है तत्त्वार्थसूत्रके कुछ सूत्रोंका परीक्षण जिससे भी हमें इस बातके निर्णय करनेमें सहायता मिलती
है कि तत्त्वार्थसूत्रकार वाचक उमास्वातिसे भिन्न होने चाहिए।
किन्तु दिगम्बर परम्परामें उमास्वाति या उमास्वामी नामके कोई आचार्य हुए हैं इस बातका सूचक
कोई प्राचीन उल्लेख नहीं मिलता। श्रवणवेलगोलाके शिलालेख या दूसरे जितने भी प्रमाण मिलते हैं वे सब
उन उल्लेखोंसे जो तत्त्वार्थसूत्रको आचार्य गृद्धपिच्छकी कृति प्रकट करते हैं, बादके हैं, अतएव इस मामलेमें
उनका उतना विश्वास नहीं किया जा सकता ।
सिद्धसेनीय टीका—पं० सुखलालजीने अपने तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावनामें सिद्धसेन गणि और हरि-
भद्रसूरिकी टीकासे एक दो उल्लेख उपस्थित कर² यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि तत्त्वार्थसूत्रकार
और उनके भाष्यकार एक ही व्यक्ति हैं किन्तु वे उल्लेख सन्देहास्पद हैं। उदाहरणार्थ सिद्धसेन गणिकी टीकामें
१. व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ८ । २. देखो उनके तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृष्ठ १७ की टिप्पणी १ ।