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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 558 में से

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पृष्ठ 71

प्रस्तावना ६७
विपरीत तत्त्वार्थभाष्यमें सम्यग्दर्शनी और सम्यग्दृष्टि इन दोनों पदोंकी स्वतन्त्र व्याख्या करके सम्यग्दर्शनीसे
सम्यग्दृष्टिको भिन्न बतलाया गया है । वहाँ कहा गया है कि जिसके आभिनिबोधिक ज्ञान होता है वह सम्य-
ग्दर्शनी कहलाता है और जिसके केवलज्ञान होता है वह सम्यग्दृष्टि कहलाता है ।$^१$ स्पष्ट है कि यहाँ पर
तत्त्वार्थभाष्यकार तत्त्वार्थसूत्रका अनुसरण नहीं करते और सम्यग्दृष्टिपदकी तत्त्वार्थसूत्रके विरुद्ध अपनी दो
व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं । एक स्थल ( अ० १ सू० ८) में वे जिस बातको स्वीकार करते हैं दूसरे (अ०
७ सू० २३ ) में वे उसे छोड़ देते हैं ।
२. तत्त्वार्थसूत्रमें मति, स्मृति और संज्ञा आदि मतिज्ञानके पर्यायवाची नाम हैं । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यकार
इन्हें पर्यायवाची नाम न मानकर 'मतिः स्मृतिः' इत्यादि सूत्रके आधारसे मतिज्ञान, स्मृतिज्ञान आदिको
स्वतन्त्र ज्ञान मानते हैं$^२$ । सिद्धसेन गणिने भी तत्त्वार्थभाष्यके आधारसे इनको स्वतन्त्र ज्ञान मानकर उनकी
व्याख्या की है । यह कहना कि सामान्य मतिज्ञान व्यापक है और विशेष मतिज्ञान, स्मृतिज्ञान आदि उसके
व्याप्य हैं कुछ सयुक्तिक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि मतिज्ञान वर्तमान अर्थको विषय करता है । इस तथ्यको जब
स्वयं तत्त्वार्थभाष्यकार स्वीकार करते हैं ऐसी अवस्थामें मति, स्मृति आदि नाम मतिज्ञानके पर्यायवाची ही
हो सकते हैं ज्ञानान्तर नहीं । तथा दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्पराके आगमोंमें इन्हें मतिज्ञानके पर्यायवाची
ही कहा है । स्पष्ट है कि यहाँ पर भी तत्त्वार्थभाष्यकारकी व्याख्या मूल सूत्रका अनुसरण नहीं करती ।
३. तत्त्वार्थभाष्यकारने अध्याय १० सूत्र 'क्षेत्रकालंगति' इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए$^३$ शब्द,
समभिरूढ और एवंभूत इन तीनको मूल नय मान लिया है जब कि वे ही प्रथम अध्यायमें उस सूत्र पाठको
स्वीकार करते हैं जिसमें मूल नयोंमें केवल एक शब्दनय स्वीकार किया गया है । स्पष्टतः उनका १०वें
अध्यायमें शब्दादिक तीन नयोंको मूलरूपसे स्वीकार करना और प्रथम अध्यायमें एक शब्दनयको मूल मानना
परस्पर विरुद्ध है ।
४. श्वेताम्बर तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ सूत्र ५२ में 'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ स्वीकार किया गया है ।
तत्त्वार्थभाष्यकारने प्रारम्भमें इस पदको मानकर ही उसकी व्याख्या की है । किन्तु बादमें वे 'उत्तमपुरुष'
पदका त्याग कर देते हैं और मात्र 'चरमदेह' पदको स्वीकार कर उसका उपसंहार करते हैं । इससे विदित
होता है कि तत्त्वार्थभाष्यकारको इस सूत्रके कुछ हेरफेरके साथ दो पाठ मिले होंगे । जिनमेंसे एक पाठको
उन्होंने मुख्य मानकर उसका प्रथम व्याख्यान किया । किन्तु उसको स्वीकार करनेपर जो आपत्ति आती है
उसे देखकर उपसंहारके समय उन्होंने दूसरे पाठको स्वीकार कर लिया । स्पष्ट है कि इससे तत्त्वार्थभाष्यकार
ही तत्त्वार्थसूत्रकार हैं इस मान्यताको बड़ा धक्का लगता है ।
५. तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ४ सूत्र ४ में प्रत्येक देवनिकायके इन्द्रादिक १० भेद गिनाये हैं । किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकार इन दस भेदोंके उल्लेखके साथ अनीकाधिपति नामका ग्यारहवां भेद और स्वीकार करते
हैं । इसी प्रकार इसी अध्यायके २६वें सूत्रमें लौकान्तिक देवोंके सारस्वत आदिक नौ भेद गिनाये हैं किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकार अपने भाष्यमें यहाँ नौके स्थानमें आठ भेद ही स्वीकार करते हैं । वे कहते हैं--'एते
सारस्वतादयोऽष्टविधा देवा ब्रह्मलोकस्य पूर्वोत्तरादिषु, दिक्षु प्रदक्षिणं भवन्ति यथासंख्यम् ।'
वे ऐसे प्रमाण हैं जो पण्डितजी की पूर्वोक्त मान्यताके विरुद्ध जाते हैं । स्पष्ट है कि पण्डितजीकी उक्त
मान्यताके आधारसे भी तत्त्वार्थभाष्यकारको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता नहीं माना जा सकता ।$^४$
पं० सुखलालजीकी तीसरी मान्यता है कि प्रारम्भिक कारिकाओंमें और कुछ स्थानोंपर भाष्यमें
'वक्ष्यामि, वक्ष्यामः' आदि प्रथम पुरुषकी क्रियाओंका निर्देश है आदि इसलिए तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थ-
१. देखो तत्त्वार्थसूत्र अ० १ सू० ८ का तत्त्वार्थभाष्य । २. देखो अध्याय १ सूत्र १३ का तत्त्वार्थभाष्य ।
३. शब्दादयश्च त्रयः । ४. श्री पं० लालबहादुरजी शास्त्रीने जैन सिद्धान्तभास्कर भाग १३ किरण १ में
'क्या भाष्य स्वोपज्ञ और उसके कर्ता यापनीय हैं' इस शीर्षकसे एक लेख मुद्रित कराया है । उससे भी इस
विषयपर सुन्दर प्रकाश पड़ता है ।