सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
२६६ | सर्वार्थसिद्धौ | [ ७।१६ § ६९२ –
प्राप्नोति । नैष दोषः; सामान्येन मुक्तत्वात् । तथाहि—अयं भिक्षुः पिहितद्वारादिषु न प्रविशति
अमुक्तत्वात् । अथवा 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते । प्रमत्तयोगाददत्तादानं यत् तत्स्तेयमित्युच्यते ।
न च रथ्यादि प्रविशतः प्रमत्तयोगोऽस्ति । तेनैतदुक्तं भवति, यत्र संक्लेशपरिणामेन प्रवृत्तिस्तत्र
स्तेयं भवति बाह्यवस्तुनो¹ ग्रहणे चाग्रहणे च ।
५ § ६९२. अथ चतुर्थमब्रह्म किंलक्षणमित्यत्रोच्यते—
मैथुनमब्रह्म ॥१६॥
§ ६९३. स्त्रीपुंसयोश्चारित्रमोहोदये सति रागपरिणामाविद्धयोः परस्परस्पर्शनं प्रति इच्छा
मिथुनम् । मिथुनस्य कर्म मैथुनमित्युच्यते । न सर्वं कर्म । कुतः । लोके शास्त्रे च तथा प्रसिद्धेः ।
लोके तावद्गोपालादिप्रसिद्धं स्त्रीपुंसयोः रागपरिणामनिमित्तं चेष्टितं मैथुनमिति । शास्त्रेऽपि
१० "अश्ववृषभयोर्मैथुनेच्छायाम्" इत्येवमादिषु तदेव गृह्यते । अपि च 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते तेन
स्त्रीपुंसमिथुनविषयं रतिसुखार्थं चेष्टितं मैथुनमिति गृह्यते, न सर्वम् । अहिंसादयो⁴ गुणा यस्मिन्
परिपाल्यमाने बृंहन्ति वृद्धिमुपयान्ति तद् ब्रह्म । न ब्रह्म अब्रह्म इति । किं तत् । मैथुनम् । तत्र
हिंसादयो दोषाः पुष्यन्ति । यस्मान्मैथुनसेवनप्रवणः स्थास्नूँश्चरिष्णून् प्राणिनो हिनस्ति मृषावाद-
माचष्टे अदत्तमादत्ते अचेतनमितरं⁶ च परिग्रहं गृह्णाति ।
१५ अर्थ करने पर भी भिक्षुके ग्राम नगरादिकमें भ्रमण करते समय गली, कूचा, दरवाजा आदिमें
प्रवेश करने पर बिना दी हुई वस्तुका ग्रहण प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है;
क्योंकि वे गली, कूचा और दरवाजा आदि सबके लिए खुले हैं । यह भिक्षु जिनमें किवाड़ आदि
लगे हैं उन दरवाजा आदिमें प्रवेश नहीं करता, क्योंकि वे सबके लिए खुले नहीं हैं । अथवा,
'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है जिससे यह अर्थ होता है कि प्रमत्तके योगसे बिना दी
२० हुई वस्तुका ग्रहण करना स्तेय है । गली कूचा आदिमें प्रवेश करनेवाले भिक्षुके प्रमत्तयोग तो है
नहीं इसलिए वैसा करते हुए स्तेयका दोष नहीं लगता । इस सब कथनका यह अभिप्राय है कि
बाह्य वस्तु ली जाय या न ली जाय किन्तु जहाँ संक्लेशरूप परिणामके साथ प्रवृत्ति होती है वहाँ
स्तेय है ।
§ ६९२. अब चौथा जो अब्रह्म है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
२५ कहते हैं—
मैथुन अब्रह्म है ॥१६॥
§ ६९३. चारित्र मोहनीयका उदय होनेपर राग परिणामसे युक्त स्त्री और पुरुषके जो एक
दूसरेको स्पर्श करने की इच्छा होती है वह मिथुन कहलाता है और इसका कार्य मैथुन कहा
जाता है । सब कार्य मैथुन नहीं कहलाता क्योंकि लोकमें और शास्त्रमें इसी अर्थमें मैथुन शब्दकी
३० प्रसिद्धि है । लोकमें बाल गोपाल आदि तक यह प्रसिद्ध है कि स्त्री-पुरुषकी रागपरिणामके निमित्त-
से होनेवाली चेष्टा मैथुन है । शास्त्रमें भी 'घोड़ा और बैलकी मैथुनेच्छा होनेपर' इत्यादि वाक्योंमें
यही अर्थ लिया जाता है । दूसरे 'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है इसलिए रतिजन्य
सुखके लिए स्त्री-पुरुषकी मिथुनविषयक जो चेष्टा होती है वही मैथुन रूपसे ग्रहण किया जाता है
सब नहीं । अहिंसादिक गुण जिसके पालन करनेपर बढ़ते हैं वह ब्रह्म कहलाता है और जो इससे
३५ रहित है वह अब्रह्म है । शंका—अब्रह्म क्या है ? समाधान—मैथुन । मैथुनमें हिंसादिक दोष पुष्ट
होते हैं, क्योंकि जो मैथुनके सेवनमें दक्ष है वह चर और अचर सब प्रकार के प्राणियोंकी हिंसा
१. -वस्तुनो ग्रहणे च आ० । २. -पुंसराग-मु० । ३. पा० सू० ७।१।५१ इत्यत्र वार्तिकम् । ४. -दयो
धर्मा य-मु० । ५. अब्रह्म । किं मु० । ६. सचेतनमितरच्च मु० ।
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- ७।१७ ६ ६९५ ] सप्तमोऽध्यायः २६७
§ ६९४. अथ पञ्चमस्य परिग्रहस्य किं लक्षणमित्यत आह-
मूर्च्छा परिग्रहः ॥१७॥
§ ६९५. मूर्च्छत्युच्यते ।$^१$ का मूर्च्छा । बाह्यानां गोमहिषमणिमुक्ताफलादीनां$^२$ चेतनाचेत-
$^३$नानामाभ्यन्तराणां च रागादीनामुपधीनां संरक्षणार्जनसंस्कारादिलक्षणाव्यावृत्तिर्मूर्च्छा । ननु ५
च लोके वातादिप्रकोपविशेषस्य मूर्च्छति प्रसिद्धिरस्ति तद्ग्रहणं कस्मान्न भवति । सत्यमेवैतत् ।
मूर्च्छिरयं मोहसामान्ये वर्तते । “सामान्यचोदनाश्च विशेषेष्ववतिष्ठन्ते” इत्युक्ते विशेषे व्यवस्थितः
परिगृह्यते; परिग्रहप्रकरणात् । एवमपि बाह्यस्य परिग्रहत्वं न प्राप्नोति; आध्यात्मिकस्य संग्रहात् ।
सत्यमेवैतत्; प्रधानत्वादभ्यन्तर एव संगृहीतः ।$^४$ असत्यपि बाह्ये ममेदमिति संकल्पवान् सपरि-
ग्रह$^५$ एव भवति । अथ बाह्यः परिग्रहो न भवत्येव, भवति च मूर्च्छाकारणत्वात् यदि ममेदमिति
संकल्पः परिग्रहः; संज्ञानाद्यपि परिग्रहः प्राप्नोति तदपि हि ममेदमिति संकल्प्यते रागादिपरिणाम- १०
वत् । नैष दोषः; 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते $^६$ । ततो ज्ञानदर्शनचारित्रवतोऽप्रमत्तस्य मोहाभावान्न
मूर्च्छास्तीति निष्परिग्रहत्वं सिद्धम् । किंच तेषां ज्ञानादीनामहेयत्वादात्मस्वभावत्वादपरिग्रहत्वम् ।
रागादयः पुनः कर्मोदयतन्त्रा इति अनात्मस्वभावत्वाद्धेयाः । ततस्तेषु संकल्पः परिग्रह इति
करता है, झूठ बोलता है, बिना दी हुई वस्तु लेता है तथा चेतन और अचेतन दोनों प्रकारके
परिग्रहको स्वीकार करता है। १५
§ ६९४. अब पाँचवां जो परिग्रह है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं-
मूर्च्छा परिग्रह है ॥१७॥
§ ६९५. अब मूर्च्छाका स्वरूप कहते हैं । शंका-मूर्च्छा क्या है ? समाधान-गाय, भैंस,
मणि और मोती आदि चेतन अचेतन बाह्य उपधिका तथा रागादिरूप अभ्यन्तर उपधिका संरक्षण २०
अर्जन और संस्कार आदि रूप व्यापार ही मूर्च्छा है। शंका-लोकमें वातादि प्रकोप विशेषका
नाम मूर्च्छा है ऐसी प्रसिद्धि है, इसलिए यहाँ इस मूर्च्छाका ग्रहण क्यों नहीं किया जाता ? समा-
धान-यह कहना सत्य है तथापि मूच्छ धातुका सामान्य अर्थ मोह है और सामान्य शब्द तद्गत
विशेषोंमें ही रहते हैं ऐसा मान लेने पर यहाँ मूर्च्छाका विशेष अर्थ ही लिया गया है, क्योंकि
यहाँ परिग्रहका प्रकरण है । शंका-मूर्च्छाका यह अर्थ लेने पर भी बाह्य वस्तुको परिग्रहपना नहीं २५
प्राप्त होता, क्योंकि मूर्च्छा इस शब्दसे आभ्यन्तर परिग्रहका संग्रह होता है। समाधान -यह
कहना सही है; क्योंकि प्रधान होनेसे आभ्यन्तरका ही संग्रह किया है। यह स्पष्ट ही है कि बाह्य
परिग्रहके न रहनेपर भी 'यह मेरा है' ऐसा संकल्पवाला पुरुष परिग्रहसहित ही होता है। शंका-
यदि बाह्य पदार्थ परिग्रह नहीं है और मूर्च्छाका कारण होनेसे 'यह मेरा है' इस प्रकारका संकल्प
ही परिग्रह है तो ज्ञानादिक भी परिग्रह ठहरते हैं, क्योंकि रागादि परिणामोंके समान ज्ञानादिक ३०
में भी 'यह मेरा है' इस प्रकारका संकल्प होता है ? समाधान -यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि
'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए जो ज्ञान, दर्शन और चारित्रवाला होकर
प्रमादरहित है उसके मोहका अभाव होनेसे मूर्च्छा नहीं है, अतएव परिग्रहरहितपना सिद्ध होता
है। दूसरे वे ज्ञानादिक अहेय हैं और आत्माके स्वभाव हैं इसलिए उनमें परिग्रहपना नहीं प्राप्त
होता । परन्तु रागादिक तो कर्मोंके उदयसे होते हैं, अतः वे आत्माका स्वभाव न होनेसे हेय हैं ३५
१. -च्यते । केयं मूर्च्छा मु० आ०, दि० १, दि० २ । २. -मुक्तादी - मु०, ता० । ३. -तनानां च
रागा-मु० । ४. -गृह्यते । एवमपि ता०, ना० । ५. संगृह्यते । असत्यपि मु. । ६. -ग्रहो भवति मु० ।
७. -र्तते । ज्ञान - आ०, दि० १, दि० २ ।
२६८ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।१८ § ६९६-
युज्यते । तन्मूलाः सर्वे दोषाः । ममेदमिति हि सति संकल्पे संरक्षणादयः संजायन्ते । तत्र च हिंसा-
वश्यंभाविनी । तदर्थमनृतं जल्पति । चौर्यं वा१ आचरति । मैथुने च कर्मणि प्रयतते । तत्प्रभवा
नरकादिषु दुःखप्रकाराः ।
§ ६९६. एवमुक्तेन२ प्रकारेण हिंसादिदोषदर्शिनोऽहिंसादिगुणाहितचेतसः परमप्रयत्नस्या-
५ हिंसादीनि व्रतानि यस्य सन्ति सः—
निःशल्यो व्रती ॥१८॥
§ ६९७. शृणाति हिनस्तीति शल्यम् । शरीरानुप्रवेशि काण्डादिप्रहरणं३ शल्यमिव शल्यं
यथा तत् प्राणिनो बाधाकरं तथा४ शरीरमानसबाधाहेतुत्वात्कर्मोदयविकारः शल्यमित्युपचर्यते ।
तत् त्रिविधम्—मायाशल्यं निदानशल्यं मिथ्यादर्शनशल्यमिति । माया निकृतिर्वञ्चना । निदानं
१० विषयभोगाकाङ्क्षा । मिथ्यादर्शनमतत्त्वश्रद्धानम् । एतस्मात्त्रिविधाच्छल्यान्निष्क्रान्तो निःशल्यो
व्रती इत्युच्यते । अत्र चोद्यते—शल्याभावान्निःशल्यो व्रताभिसंबन्धाद् व्रती, न निःशल्यत्वाद् व्रती
भवितुमर्हति । न हि देवदत्तो दण्डसंबन्धाच्छत्री भवतीति । अत्रोच्यते—उभयविशेषणविशिष्ट५-
स्येष्टत्वात् । न हिंसाद्युपरतिमात्रवृता६भिसंबन्धाद् व्रती भवत्यन्तरेण शल्याभावम् । सति शल्या-
पगमे व्रतसंबन्धाद् व्रती विवक्षितो यथा बहुक्षीरघृतो गोमानिति व्यपदिश्यते । बहुक्षीरघृताभा-
१५ इसलिए उनमें होनेवाला संकल्प परिग्रह है यह बात बन जाती है। सब दोष परिग्रहमूलक ही
होते हैं। 'यह मेरा है' इस प्रकारके संकल्पके होनेपर संरक्षण आदि रूप भाव होते हैं। और
इसमें हिंसा अवश्यंभाविनी है। इसके लिए असत्य बोलता है, चोरी करता है, मैथुन कर्ममें प्रवृत्त
होता है। नरकादिकमें जितने दुःख हैं वे सब इससे उत्पन्न होते हैं।
§ ६९६. इस प्रकार उक्त विधिसे जो हिंसादिमें दोषोंका दर्शन करता है, जिसका चित्त
२० अहिंसादि गुणोंमें लगा रहता है और जो प्रयत्नशील है वह यदि अहिंसादि व्रतोंको पाले तो किस
संज्ञाको प्राप्त होता है इसी बातका खुलासा करनेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
जो शल्यरहित है वह व्रती है ॥१८॥
६९७. 'शृणाति हिनस्ति इति शल्यम्' यह शल्य शब्दकी व्युत्पत्ति है। शल्यका अर्थ है
पीड़ा देनेवाली वस्तु। जब शरीरमें कांटा आदि चुभ जाता है तो वह शल्य कहलाता है। यहाँ
२५ उसके समान जो पीड़ाकर भाव है वह शल्य शब्दसे लिया गया है। जिस प्रकार काँटा आदि
शल्य प्राणियोंको बाधाकर होती है उसी प्रकार शरीर और मन सम्बन्धी बाधाका कारण होनेसे
कर्मोदयजनित विकारमें भी शल्यका उपचार कर लेते हैं अर्थात् उसे भी शल्य कहते हैं। वह
शल्य तीन प्रकारकी है—माया शल्य, निदान शल्य और मिथ्यादर्शन शल्य। माया, निकृति और
वंचना अर्थात् ठगनेकी वृत्ति यह माया शल्य है। भोगोंकी लालसा निदान शल्य है और अतत्त्वों-
३० का श्रद्धान मिथ्यादर्शन शल्य है। इन तीन शल्योंसे जो रहित है वही निःशल्य व्रती कहा जाता
है। शंका—शल्यके न होनेसे निःशल्य होता है और व्रतोंके धारण करनेसे व्रती होता है। शल्य-
रहित होनेसे व्रती नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ देवदत्तके हाथमें लाठी होनेपर वह छत्री नहीं हो
सकता ? समाधान—व्रती होनेके लिए दोनों विशेषणोंसे युक्त होना आवश्यक है, यदि किसीने
शल्योंका त्याग नहीं किया और केवल हिंसादि दोषोंको छोड़ दिया तो वह व्रती नहीं हो सकता ।
३५ यहाँ ऐसा व्रती इष्ट है जिसने शल्योंका त्याग करके व्रतोंको स्वीकार किया है। जैसे जिसके यहाँ
१. चौर्यं चाचरति ता. । २. एवमुक्तक्रमेण हिंसा-ता० । ३. -प्रहरणं । तच्छल्य मु. । ४. तथा शरीर-
मु० । ५. -विशिष्टत्वात् मु० । ६. -मात्रसम्ब-मु० ।
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- ७।१९ § ७०० ] सप्तमोऽध्यायः २६९
वात्सतीष्वपि गोषु न गोमांस्तथा सशल्यत्वात्सत्स्वपि व्रतेषु न व्रती । यस्तु निःशल्यः स व्रती ।
§ ६९८. तस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
अगार्यनगारश्च ॥१९॥
§ ६९९. प्रतिश्रयार्थिभिः अङ्ग्यते इति अगारं वेश्म, तद्वानगारी । न विद्यते अगारमस्येत्य-
नगारः । द्विविधो व्रती अगारो अनगारश्च । ननु चात्र विपर्ययोऽपि प्राप्नोति शून्यागारदेवकुलाद्या-
वासस्य मुनेरगारित्वम् अनिवृत्तविषयतृष्णस्य कुतश्चित्कारणाद् गृहं विमुच्य वने वसतोऽनगा-
रत्वं च प्राप्नोतीति¹ । नैष दोषः; भावागारस्य विवक्षितत्वात् । चारित्रमोहोदये सत्यगारसम्बन्धं
प्रत्यनिवृत्तः² परिणामो भावागारमित्युच्यते । स यस्यास्त्यसावगारी वने वसन्नपि । गृहे वसन्नपि
तदभावादनगार इति च भवति । ननु चागारिणो व्रतित्वं न प्राप्नोति; असकलव्रतत्वात् । नैष
दोषः; नैगमादिनयापेक्षया अगारिणोऽपि व्रतित्वमुपपद्यते नगरावासवत् । यथा गृहे अपवरके वा
वसन्नपि नगरावास इत्युच्येत तथा असकलव्रतोऽपि नैगमसंग्रहव्यवहारनयापेक्षया व्रतीति
व्यपदिश्यते ।
§ ७००. अत्राह किं हिंसादीनामन्यतमस्माद्यः प्रतिनिवृत्तः स खल्वगारी व्रती । नैवम् । किं
तर्हि । पञ्चतय्या अपि विरतेर्वैकल्येन विवक्षित इत्युच्यते—
बहुत घी दूध होता है वह गायवाला कहा जाता है । यदि उसके घी दूध नहीं होता और गायें
हैं तो वह गायवाला नहीं कहलाता, उसी प्रकार जो शल्य है व्रतोंके होनेपर भी वह व्रती नहीं
हो सकता । किन्तु जो निःशल्य है वह व्रती है ।
§ ६९८. अब उसके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उसके अगारी और अनागार ये दो भेद हैं ॥१९॥
§ ६९९. आश्रय चाहनेवाले जिसे अंगीकार करते हैं वह अगार है । अगारका अर्थ वेश्म
अर्थात् घर है । जिसके घर है वह अगारी है । और जिसके घर नहीं है वह अनगार है । इस
तरह व्रती दो प्रकारका है—अगारी और अनगार । शंका—अभी अगारी और अनगारका जो
लक्षण कहा है उससे विपरीत अर्थ भी प्राप्त होता है, क्योंकि उपर्युक्त लक्षणके अनुसार जो मुनि
शून्य घर और देवकुलमें निवास करते हैं वे अगारी हो जायेंगे और विषयतृष्णाका त्याग किये
बिना जो किसी कारणसे घरको छोड़कर वनमें रहने लगे हैं वे अनगार हो जायेंगे ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँपर भावागार विवक्षित है । चारित्र मोहनीयका उदय होने
पर जो परिणाम घरसे निवृत्त नहीं है वह भावागार कहा जाता है। वह जिसके है वह वनमें
निवास करते हुए भी अगारी है और जिसके इस प्रकारका परिणाम नहीं है वह घरमें रहते हुए भी
अनगार है । शंका—अगारी व्रती नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पूर्ण व्रत नहीं है ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि नैगम आदि नयकी अपेक्षा नगरावासके समान अगारीके भी व्रती-
पना बन जाता है । जैसे कोई घरमें या झोपड़ीमें रहता है तो भी 'मैं नगरमें रहता हूँ' यह कहा
जाता है उसी प्रकार जिसके पूरे व्रत नहीं है वह नैगम, संग्रह और व्यवहारनयकी अपेक्षा व्रती
कहा जाता है ।
§ ७००. शंका—जो हिंसादिकमें-से किसी एकसे निवृत्त है वह क्या अगारी व्रती है ?
समाधान—ऐसा नहीं है। शंका—तो क्या है ? समाधान—जिसके एक देशसे पाँचों प्रकारकी
विरति है वह अगारी है यह अर्थ यहाँ विवक्षित है । अब इसी बातको बतलानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
१. -प्नोति नैष आ०, दि० १, दि० २ । २. -वृत्तिपरि-आ०, दि०, १, दि० २ ।
२७० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२० § ७०१ –
अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥
§ ७०१. 'अणु'शब्दोऽल्पवचनः। अणूनि व्रतान्यस्य अणुव्रतोऽगारीत्युच्यते । कथमस्य
व्रतानामणुत्वम् । सर्वसावद्यनिवृत्त्यसंभवात् । कुतस्तर्ह्यसौ निवृत्तः। त्रसप्राणिव्यपरोपणान्निवृत्तः
अगारीत्याद्यमणुव्रतम् । स्नेहमोहादिवशाद् गृहविनाशे ग्रामविनाशे वा कारणमित्यभिमतादसत्य-
वचनान्निवृत्तो गृहीति द्वितीयमणुव्रतम् । अन्यपीडाकरं पार्थिवभयादिवशादवश्यं परित्यक्तमपि
यददत्तं ततः प्रतिनिवृत्त्यादरः श्रावक इति तृतीयमणुव्रतम् । उपात्ताया अनुपात्तायाश्च पराङ्गनायाः
सङ्गान्निवृत्तरतिर्गृहीति चतुर्थमणुव्रतम् । धनधान्यक्षेत्रादीनामिच्छावशात् कृतपरिच्छेदो गृहीति
पञ्चममणुव्रतम् ।
§ ७०२. आह अपरित्यक्तागारस्य किमेतावानेव विशेष आहोस्विदस्ति कश्चिदन्योऽपीत्यत
आह—
दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकप्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसं-
विभागव्रतसंपन्नश्च ॥२१॥
§ ७०३. 'विरति'शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । दिग्विरतिः देशविरतिः अनर्थदण्डविरति-
रिति एतानि त्रीणि गुणव्रतानि; १'व्रत'शब्दस्य प्रत्येकभभिसंबन्धात् । तथा सामायिकव्रतं
प्रोषधोपवासव्रतं उपभोगपरिभोगपरिमाणव्रतं अतिथिसंविभागव्रतं २ एतानि चत्वारि शिक्षा-
व्रतानि । एतैर्वृतैः संपन्नो गृही विरताविरत इत्युच्यते । तद्यथा—दिक्प्राच्यादिः तत्र प्रसिद्धे-
अणुव्रतोंका धारी अगारी है ॥२०॥
§ ७०१. अणु शब्द अल्पवाची है। जिसके व्रत अणु अर्थात् अल्प हैं वह अणुव्रतवाला
अगारी कहा जाता है । शंका—अगारीके व्रत अल्प कैसे होते हैं ? समाधान—अगारीके पूरे हिंसादि
दोषोंका त्याग सम्भव नहीं है इसलिए उसके व्रत अल्प होते हैं। शंका—तो यह किसका त्यागी
है ? समाधान—यह त्रस जीवोंकी हिंसाका त्यागी है; इसलिए उसके पहला अहिंसा अणुव्रत होता
है। गृहस्थ स्नेह और मोहादिकके वशसे गृहविनाश और ग्रामविनाशके कारण असत्य वचनसे
निवृत्त है इसलिए उसके दूसरा सत्याणुव्रत होता है। श्रावक राजाके भय आदिके कारण दूसरेको
पीड़ाकारी जानकर बिना दी हुई वस्तुको लेना यद्यपि अवश्य छोड़ देता है तो भी बिना दी हुई
वस्तुके लेनेसे उसकी प्रीति घट जाती है इसलिए उसके तीसरा अचौर्याणुव्रत होता है। गृहस्थके
स्वीकार की हुई या बिना स्वीकार की हुई परस्त्रीका संग करनेसे रति हट जाती है इसलिए
उसके परस्त्रीत्याग नामका चौथा अणुव्रत होता है। तथा गृहस्थ धन, धान्य और क्षेत्र आदिका
स्वेच्छासे परिमाण कर लेता है इसलिए उसके पाँचवाँ परिग्रहपरिमाण अणुव्रत होता है।
§ ७०२. गृहस्थकी क्या इतनी ही विशेषता है कि और भी विशेषता है, अब यह बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं —
वह दिग्विरति, देशविरति, अनर्थदण्डविरति, सामायिकव्रत, प्रोषधोपवासव्रत, उपभोग-
परिभोगपरिमाणव्रत और अतिथिसंविभागव्रत इन व्रतोंसे भी सम्पन्न होता है ॥२१॥
§ ७०३. विरति शब्द प्रत्येक शब्दपर लागू होता है । यथा—दिग्विरति, देशविरति और
अनर्थदण्डविरति । ये तीन गुणव्रत हैं, क्योंकि व्रत शब्दका हर एकके साथ सम्बन्ध है। तथा
सामायिकव्रत, प्रोषधोपवासव्रत, उपभोगपरिमाणव्रत और अतिथिसंविभागव्रत ये चार हैं। इस
प्रकार इन व्रतोंसे जो सम्पन्न है वह गृही विरताविरत कहा जाता है । खुलासा इस प्रकार है—
१. –करपार्थिव–मु० । २. व्रतम् । इत्येतै–मु० ।
- ७।२१ § ७०३ ] सप्तमोऽध्यायः २७१
रभिज्ञानैरवधिं कृत्वा नियमनं दिग्विरतिव्रतम् । ततो बहिस्त्रसस्थावरव्यपरोपणनिवृत्तेर्महा-
व्रतत्वमवसेयम् । तत्र लाभे सत्यपि परिणामस्य निवृत्तेर्लोभनिरासश्च कृतो भवति । ग्रामा-
दीनामवधृतपरिमाणः² प्रदेशो देशः । ततो बहिर्निवृत्तिर्देशविरतिव्रतम् । पूर्ववद्बहिर्महाव्रतत्वं
व्यवस्थाप्यम् । असत्युपकारे पापादानहेतुरनर्थदण्डः ।³ ततो विरतिरनर्थदण्डविरतिः ।
अनर्थदण्डः पञ्चविधः—अपध्यानं पापोपदेशः प्रमादाचरितं हिंसाप्रदानं अशुभश्रुतिरिति । तत्र ५
परेषां जयपराजयवधबन्धनाङ्गच्छेदपरस्वहरणादि कथं स्यादिति मनसा⁴ चिन्तनमपध्यानम् ।⁵
तिर्यक्क्लेशवाणिज्यप्राणिवधकारम्भादिषु पापसंयुक्तं वचनं पापोपदेशः ।⁷ प्रयोजनमन्तरेण वृक्षा-
दिच्छेदनभूमिकुट्टनसलिलसेचनावद्यकर्म प्रमादाचरितम् ।⁸ विषकण्टकशस्त्राग्निरज्जुकशादण्डा-
दिहिंसोपकरणप्रदानं हिंसाप्रदानम् । हिंसारागादिप्रवर्धनदुष्टकथाश्रवणशिक्षणव्यापृतिरशुभश्रुतिः ।
समेकीभावे९ वर्तते । तद्यथा संगतं घृतं संगतं तैलमित्युच्यते एकीभूतमिति गम्यते । एकत्वेन १०
अयनं गमनं समयः, समय एव सामायिकं, समयः प्रयोजनमस्येति वा विगृह्य सामायिकम् । इयति
जो पूर्वादि दिशाएँ हैं उनमें प्रसिद्ध चिह्नोंके द्वारा मर्यादा करके नियम करना दिग्विरतिव्रत है ।
उस मर्यादाके बाहर त्रस और स्थावर हिंसाका त्याग हो जानेसे उतने अंशमें महाव्रत होता है ।
मर्यादाके बाहर लाभ होते हुए भी उसमें परिणाम न रहनेके कारण लोभका त्याग हो जाता है ।
ग्रामादिककी निश्चित मर्यादारूप प्रदेश देश कहलाता है। उससे बाहर जानेका त्याग कर देना १५
देशविरतिव्रत है। यहाँ भी पहलेके समान मर्यादाके बाहर महाव्रत होता है। उपकार न होकर
जो प्रवृत्ति केवल पापका कारण है वह अनर्थदण्ड है। इससे विरत होना अनर्थदण्डविरति है।
अनर्थदण्ड पाँच प्रकारका है—अपध्यान, पापोपदेश, प्रमादाचरित, हिंसाप्रदान और अशुभश्रुति ।
दूसरोंका जय, पराजय, मारना, बाँधना, अंगोंका छेदना और धनका अपहरण आदि कैसे किया
जाय इस प्रकार मनसे विचार करना अपध्यान नामका अनर्थदण्ड है। तिर्यंचोंको क्लेश पहुँचाने- २०
वाले, वणिजका प्रसार करनेवाले और प्राणियोंकी हिंसाके कारणभूत आरम्भ आदिके विषयमें
पापबहुल वचन बोलना पापोपदेश नामका अनर्थदण्ड है। बिना प्रयोजनके वृक्षादिका छेदना,
भूमिका कूटना, पानीका सींचना आदि पाप कार्य प्रमादाचरित नामका अनर्थदण्ड है। विष, काँटा,
शस्त्र, अग्नि, रस्सी, चाबुक और लकड़ी आदि हिंसाके उपकरणोंका प्रदान करना हिंसाप्रदान
नामका अनर्थदण्ड है। हिंसा और राग आदिको बढ़ानेवाली दुष्ट कथाओंका सुनना और उनकी २५
शिक्षा देना अशुभश्रुति नामका अनर्थदण्ड है। 'सम्' उपसर्गका अर्थ एक रूप है। जैसे 'घी संगत
है, तेल संगत है' जब यह कहा जाता है तब संगतका अर्थ एकीभूत होता है। सामायिकमें मूल
शब्द समय है। इसके दो अवयव हैं सम् और अय। सम्का अर्थ कहा ही है और अयका अर्थ
गमन है। समुदायार्थ एकरूप हो जाना समय है और समय ही सामायिक है। अथवा समय
१. सीमन्तानां परतः स्थूलेतरपञ्चपापसं त्यागात् । देशावकाशिकेन च महाव्रतानि प्रसाध्यन्ते ॥' -रत्न० ३०
३, ५ । २. -माणप्रदेशो मु. । ३. 'पापोपदेशहिंसादानापध्यानदुःश्रुतीः पञ्च । प्राहुः प्रमादचर्यामनर्थदण्डान-
दण्डधराः ॥'-रत्न० ३, ५ । ४. -च्छेदस्वहर-आ० । छेदसर्वस्वहर-दि० १, दि० २ । ५. 'वधबन्ध-
च्छेदादेर्देपाद्रागाच्च परकलत्रादेः । आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदाः ॥' -रत्न० ३,३२ ।
६. -ध्यानम् । प्राणिवधक-आ०, दि० १, दि० २ । ७. 'तिर्यक्क्लेशवणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् ।
कथाप्रसङ्गप्रसवः स्मर्तव्यः पाप उपदेशः ॥' -रत्न० ३, ३० । ८. 'क्षितिसलिलदहनपवनवारम्भं विफलं ३५
वनस्पतिच्छेदम् । सरणं सारणमपि च प्रमादचर्या प्रभाषन्ते ॥' -रत्न० ३,३४ । ६. “तद्यथा तावदेकार्थीभावः
सामर्थ्यन्तदैवं विग्रहः करिष्यते-सङ्गतार्थः समर्थः सृष्टार्थः समर्थ इति । तद्यथा सङ्गतं घृतं सङ्गतं तैलमित्युच्यते
एकीभूतमिति गम्यते ।' -पा० म० भा० २,१,१,१ ।
स्थानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि परिहर्तव्यानि बहुघाताल्पफलत्वात् ।Wait,बहुजन्तुयोनिस्थानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि- checkयोनिस्थानान्य: बहुजन्तुयोनिस्थानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि` - yes!
L11:
यानवाहनाभरणादिष्वेतावदेवेष्टमतोऽन्यदनिष्टमित्यनिष्टान्निवर्तनं कर्तव्यं कालनियमेन यावज्जीवं
Correct.
L12:
अर्थात् एक रूप हो जाना ही जिसका प्रयोजन है वह सामायिक है। इतने देशमें और इतने काल
Correct.
L13:
तक इस प्रकार निश्चित की गयी सामायिकमें स्थित पुरुषके पहलेके समान महाव्रत जानना
Correct.
L14:
चाहिए, क्योंकि इसके सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकारके हिंसा आदि पापोंका त्याग हो जाता है।
Correct.
L15:
शंका—यदि ऐसा है तो सामायिकमें स्थित हुए पुरुषके सकलसंयमका प्रसंग प्राप्त होता है ? समा-
Correct.
L16:
धान—नहीं, क्योंकि इसके संयमका घात करनेवाले कर्मोंका उदय पाया जाता है। शंका—तो फिर
Correct.
L17:
`इसके महाव्रतका अभाव प्राप्त होता है ? समाधान—
- ७।२२ ६ ७०५ ] सप्तमोऽध्यायः २७३
वा यथाशक्ति । संयममविनाशयन्नतीतत्यतिथिः । अथवा नास्य तिथिरस्तीत्यतिथिः अनियतकाला-
गमन इत्यर्थः । अतिथये संविभागोऽतिथिसंविभागः । स चतुर्विधः; भिक्षोपकरणौषधप्रतिश्रय-
भेदात् । मोक्षार्थमभ्युद्यतायातिथये संयमपरायणाय शुद्धाय शुद्धचेतसा निरवद्या भिक्षा देया ।
धर्मोपकरणानि च सम्यग्दर्शनाद्युपबृंहणानि दातव्यानि । औषधमपि योग्यमुपयोजनीयम् । प्रति-
श्रयश्च परमधर्मश्रद्धया प्रतिपादियितव्य इति । 'च'शब्दो वक्ष्यमाणगृहस्थधर्मसमुच्चयार्थः । ५
§ ७०४. कः पुनरसौ-
मारणान्तिक सल्येखना जोषिता ॥ २२ ॥
§ ७०५. स्वपरिणामोपात्तस्यायुष इन्द्रियाणां बलानां च कारणवशात्संक्षयो मरणम् । 'अन्त'-
ग्रहणं तद्भवमरणप्रतिपत्त्यर्थम् । मरणमन्तो मरणान्तः । स प्रयोजनमस्येति मारणान्तिकी ।
सम्यक्कायकषायलेखना सल्लेखना । कायस्य बाह्यस्याभ्यन्तराणां च कषायाणां तत्कारणहापन- १०
क्रमेण सम्यग्लेखना सल्लेखना । तां मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता सेविता गृहीत्यभि-
संबध्यते । ननु च विस्पष्टार्थं सेवितेत्येवं वक्तव्यम् । न; अर्थविशेषोपपत्तेः । न केवलमिह सेवनं
परिगृह्यते । किं तर्हि । प्रीत्यर्थोऽपि । यस्मादसत्यां प्रीतौ बलान्न सल्लेखना कार्यते । सत्यां हि
संयमका विनाश न हो इस विधिसे जो आता है वह अतिथि है या जिसके आनेकी कोई
तिथि नहीं उसे अतिथि कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसके आनेका कोई काल निश्चित नहीं है १५
उसे अतिथि कहते हैं। इस अतिथिके लिए विभाग करना अतिथिसंविभाग है। वह चार प्रकारका
है-भिक्षा, उपकरण, औषध और प्रतिश्रय अर्थात् रहनेका स्थान । जो मोक्षके लिए बद्धकक्ष
है, संयमके पालन करनेमें तत्पर है और शुद्ध है उस अतिथिके लिए शुद्ध मनसे निर्दोष भिक्षा
देनी चाहिए । सम्यग्दर्शन आदिके बढ़ानेवाले धर्मोपकरण देने चाहिए । योग्य औषधकी योजना
करनी चाहिए तथा परम धर्ममें श्रद्धापूर्वक निवास-स्थान भी देना चाहिए । सूत्रमें जो 'च' शब्द है २०
वह आगे कहे जानेवाले गृहस्थधर्मके संग्रह करनेके लिए दिया है ।
§ ७०४. वह और कौन-सा गृहस्थ धर्म है-
तथा वह मारणान्तिक संलेखनाका प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला होता है ॥२२॥
§ ७०५. अपने परिणामोंसे प्राप्त हुई आयुका, इन्द्रियोंका और मन, वचन, काय इन तीन
बलोंका कारण विशेषके मिलने पर नाश होना मरण है। उसी भवके मरणका ज्ञान करानेके लिए २५
सूत्रमें मरण शब्दके साथ अन्त पदको ग्रहण किया है। मरण यही अन्त मरणान्त है और जिसका
यह मरणान्त ही प्रयोजन है वह मारणान्तिकी कहलाती है। अच्छे प्रकारसे काय और कषायका
लेखन करना अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। अर्थात् बाहरी शरीरका और भीतरी कषायोंका,
उत्तरोत्तर काय और कषायको पुष्ट करनेवाले कारणोंको घटाते हुए, भले प्रकारसे लेखन करना
अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। मरणके अन्तमें होने वाली इस सल्लेखनाको प्रीतिपूर्वक सेवन ३०
करनेवाला गृहस्थ होता है यह इस सूत्रका तात्पर्य है। शंका- सहज तरीकेसे अर्थका स्पष्टीकरण
हो इसके लिए सूत्रमें 'जोषिता' इसके स्थानमें 'सेविता' कहना ठीक है ? समाधान - नहीं क्योंकि
'जोषिता' क्रियाके रखनेसे उससे अर्थ-विशेष ध्वनित हो जाता है। यहाँ केवल 'सेवन करना' अर्थ
नहीं लिया गया है किन्तु प्रीति रूप अर्थ भी लिया गया है, क्योंकि प्रीतिके न रहने पर बलपूर्वक
सल्लेखना नहीं करायी जाती । किन्तु प्रीतिके रहने पर जीव स्वयं ही सल्लेखना करता है। तात्पर्य ३५
यह है कि 'प्रीतिपूर्वक सेवन करना' यह अर्थ 'जोषिता' क्रियासे निकल आता है 'सेविता' से नहीं,
अतः सूत्रमें 'जोषिता' क्रिया रखी है। शंका- चूंकि सल्लेखनामें अपने अभिप्रायसे आयु आदिका
१. -हापनया क्रमे-आ०, दि० १, ता० ।
३५
[Header] २७४ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२२ § ७०६ –
प्रीतौ स्वयमेव करोति । स्यान्मतमात्मवधः प्राप्नोति; स्वाभिसन्धिपूर्वकायुरादिनिवृत्तेः । नैष
दोषः; अप्रमत्तत्वात् । 'प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्युक्तम् । न चास्य प्रमादयोगोऽस्ति ।
कुतः ? रागाद्यभावात् । रागद्वेषमोहाविष्टस्य हि विषशस्त्राद्युपकरणप्रयोगवशादात्मानं घ्नतः
स्वघातो भवति । न सल्लेखनां प्रतिपन्नस्य रागादयः सन्ति ततो नात्मवधदोषः । उक्तं च—
“रागादीणमणुप्पा अहिंसगत्तं ति¹ देसिदं समये ।
तेसिं चे उप्पत्ती हिंसेति जिणेहि णिद्दिट्ठा ॥”
किं च मरणस्यानिष्टत्वात्तथा वणिजो विविधपण्यदानादानसंचयपरस्य स्वगृहविनाशोऽनिष्टः ।
तद्विनाशकारणे च कुतश्चिदुपस्थिते यथाशक्ति² परिहरति । दुष्परिहारे च पण्यविनाशो यथा न
भवति तथा यतते । एवं गृहस्थोऽपि व्रतशीलपण्यसंचये प्रवर्तमानः तदाश्रयस्य न पातमभिवाञ्छति ।
तदुपप्लवकारणे चोपस्थिते स्वगुणाविरोधेन परिहरति । दुष्परिहारे च यथा स्वगुणविनाशो
न भवति तथा प्रयतत इति कथमात्मवधो भवेत् ।
§ ७०६. अत्राह, 'निःशल्यो व्रती' इत्युक्तं तत्र च तृतीयं शल्यं मिथ्यादर्शनम् । ततः
सम्यग्दृष्टिना व्रतिनां³ निःशल्येन भवितव्यमित्युक्तम् । तत्सम्यग्दर्शनं किं सापवादं निरपवादमिति ।
उच्यते—कस्यचिन्मोहनीयावस्थाविशेषात्कदाचिदिमे भवन्त्यपवादाः—
त्याग किया जाता है इसलिए यह आत्मघात हुआ ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि
सल्लेखनामें प्रमादका अभाव है । 'प्रमत्तयोगसे प्राणोंका वध करना हिंसा है' यह पहले कहा जा
चुका है । परन्तु इसके प्रमाद नहीं है, क्योंकि इसके रागादिक नहीं पाये जाते । राग, द्वेष और
मोहसे युक्त होकर जो विष और शस्त्र आदि उपकरणोंका प्रयोग करके उनसे अपना घात करता
है उसे आत्मघातका दोष प्राप्त होता है । परन्तु सल्लेखनाको प्राप्त हुए जीवके रागादिक तो हैं
नहीं इसलिए इसे आत्मघातका दोष नहीं प्राप्त होता । कहा भी है—
“शास्त्रमें यह उपदेश है कि रागादिका नहीं उत्पन्न होना अहिंसा है । तथा जिनदेवने
उनकी उत्पत्तिको हिंसा कहा है ॥”
दूसरे मरण किसी को भी इष्ट नहीं है । जैसे नाना प्रकारकी विक्रेय वस्तुओंके देन, लेन और
संचयमें लगे हुए किसी व्यापारीको अपने घरका नाश होना इष्ट नहीं है । फिर भी परिस्थिति-
वश उसके विनाशके कारण आ उपस्थित हों तो यथाशक्ति वह उनको दूर करता है । इतने पर
भी यदि वे दूर न हो सकें तो जिससे विक्रेय वस्तुओंका नाश न हो ऐसा प्रयत्न करता है उसी
प्रकार पण्यस्थानीय व्रत और शीलके संचयमें जुटा हुआ गृहस्थ भी उनके आधारभूत आयु आदि-
का पतन नहीं चाहता । यदा कदाचित् उनके विनाशके कारण उत्पन्न हो जाँय तो जिससे अपने
गुणोंमें बाधा नहीं पड़े इस प्रकार उनको दूर करनेका प्रयत्न करता है । इतने पर भी यदि वे दूर
न हों तो जिससे अपने गुणोंका नाश न हो इस प्रकार प्रयत्न करता है इसलिए इसके आत्मघात
नामका दोष कैसे हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता है ।
§ ७०६. यहाँ पर शंकाकार कहता है कि व्रती निःशल्य होता है ऐसा कहा है और वहाँ
तीसरी शल्य मिथ्यादर्शन है । इसलिए सम्यग्दृष्टि व्रतीको निःशल्य होना चाहिए यह उसका
अभिप्राय है, तो अब यह बतलाइए कि वह सम्यग्दर्शन सापवाद होता है या निरपवाद होता है ?
अब इसका समाधान करते हैं—किसी जीवके मोहनीयकी अवस्था विशेषके कारण ये अपवाद
होते हैं—
१. त्ति भासिदं स-मु० । २. -शक्ति च परि -मु० । ३. व्रतिना भवि-आ०, दि०, १, दि० २ ।
– ७।२५ § ७१० ] सप्तमोऽध्यायः २७५
शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतिचाराः ॥ २३ ॥
§ ७०७. निःशङ्कितत्वादयो व्याख्याताः 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यत्र । तत्प्रतिपक्षभूताः शङ्कादयो
वेदितव्याः । अथ प्रशंसासंस्तवयोः को विशेषः । मनसा मिथ्यादृष्टेर्ज्ञानचारित्रगुणोद्भावनं प्रशंसा,
भूताभूतगुणोद्भाववचनं संस्तव इत्ययमनयोर्भेदः । ननु च सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमुक्तं तस्यातिचारै-
रप्यष्टाभिर्भवितव्यम् । नैष दोषः; व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा इत्युत्तरत्र विवक्षुणाचार्येण ५
प्रशंसासंस्तवयोरितरानतिचारानन्तर्भाव्य पञ्चैवातिचारा उक्ताः ।
§ ७०८. आह, सम्यग्दृष्टेरतिचारा उक्ताः । किमेवं व्रतशीलेष्वपि भवन्तीति । ओमित्युक्त्वा
तदतिचारसंख्यानिर्देशार्थमाह—
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥ २४ ॥
§ ७०९. व्रतानि च शीलानि च व्रतशीलानि तेषु व्रतशीलेषु । शीलग्रहणमनर्थकम्; १०
व्रतग्रहणेनैव सिद्धेः । नानर्थकम्; विशेषज्ञापनार्थं व्रतपरिरक्षणार्थं शीलमिति दिग्विरत्यादीनीह
'शील'ग्रहणेन गृह्यन्ते ।
§ ७१०. अगार्यधिकारादगारिणो व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा वक्ष्यमाणा यथाक्रमं
वेदितव्याः । तद्यथा—आद्यस्य तावदहिंसाव्रतस्य—
बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥ २५ ॥ १५
शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव ये सम्यग्दृष्टि के पांच
अतिचार हैं ॥२३॥
§ ७०७. 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यादि सूत्रका व्याख्यान करते समय निःशंकितत्व आदिका
व्याख्यान किया । ये शंकादिक उनके प्रतिपक्षभूत जानना चाहिए । शंका—प्रशंसा और संस्तवमें
क्या अन्तर है ? समाधान—मिथ्यादृष्टिके ज्ञान और चारित्र गुणोंका मनसे उद्भावन करना प्रशंसा २०
है और मिथ्यादृष्टिमें जो गुण हैं या जो गुण नहीं हैं इन दोनोंका सद्भाव बतलाते हुए कथन करना
संस्तव है, इस प्रकार यह दोनोंमें अन्तर है । शंका—सम्यग्दर्शनके आठ अंग कहे हैं, इसलिए
उसके अतिचार भी आठ ही होने चाहिए । समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आगे आचार्य
व्रतों और शीलोंके पाँच-पाँच अतिचार कहनेवाले हैं इसलिए अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव
इन दो अतिचारोंमें शेष अतिचारोंका अन्तर्भाव करके सम्यग्दृष्टिके पांच ही अतिचार कहे हैं । २५
§ ७०८. सम्यग्दृष्टिके अतिचार कहे, क्या इसी प्रकार व्रत और शीलोंके भी अतिचार होते
हैं ? हां, यह कह कर अब उन अतिचारोंकी संख्याका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
व्रतों और शीलोंमें पांच पांच अतिचार हैं जो क्रमसे इस प्रकार हैं ॥२४॥
§ ७०९. शील और व्रत इन शब्दोंका कर्मधारय समास होकर व्रतशील पद बना है । उनमें
अर्थात् व्रत-शीलोंमें । शंका—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल है, क्योंकि व्रत पदके ग्रहण ३०
करनेसे ही उसकी सिद्धि हो जाती है ? समाधान—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल नहीं
है, क्योंकि विशेषका ज्ञान करानेके लिए और व्रतोंकी रक्षा करनेके लिए शील है इसलिए यहाँ
शील पदके ग्रहण करनेसे दिग्विरति आदि लिये जाते हैं ।
§ ७१०. यहाँ गृहस्थका प्रकरण है, इसलिए गृहस्थके व्रतों और शीलोंके आगे कहे जाने-
वाले क्रमसे पाँच पाँच अतिचार जानने चाहिए जो निम्न प्रकार हैं । उसमें भी पहले प्रथम अहिंसा ३५
व्रतके अतिचार बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बन्ध, वध, छेद, अतिभारका आरोपण और अन्नपानका निरोध ये अहिंसा अणुव्रतके पांच
अतिचार हैं ॥२५॥
२७६ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२६ § ७११ -
§ ७११. अभिमतदेशगतिनिरोधहेतुर्बन्धः । दण्डकशावेत्रादिभिरभिघातः प्राणिनां वधः,
न प्राणव्यपरोपणम्; ततः प्रागेवास्य विनिवृत्तत्वात् । कर्णनासिकादीनामवयवानामपनयनं छेदः ।
न्याय्यभारादतिरिक्तवाहनमतिभारारोपणम् । गवादीनां क्षुत्पिपासाबाधाकरणमन्नपाननिरोधः ।
एते पञ्चाहिंसाणुव्रतस्यातिचाराः ।
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः ॥ २६ ॥
§ ७१२. अभ्युदयनिःश्रेयसार्थेषु क्रियाविशेषेषु अन्यस्यान्यथा प्रवर्तनमतिसंधानं वा
मिथ्योपदेशः। यत्स्त्रीपुंसाभ्यामेकान्तेऽनुष्ठितस्य क्रियाविशेषस्य प्रकाशनं तद्रहोभ्याख्यानं वेदितव्यम् ।
अन्येनानुक्तं मननुष्ठितं यत्किंचित्परप्रयोगवशादेव तेनोक्तमनुष्ठितमिति वञ्चनानिमित्तं लेखनं
कूटलेखक्रिया । हिरण्यादेर्द्रव्यस्य निक्षेप्तुर्विस्मृतसंख्यस्याल्पसंख्येयमाददानस्यैवमित्यनुज्ञावचनं
न्यासापहारः । अर्थप्रकरणाङ्गविकारभ्रूविक्षेपादिभिः पराकूतमुपलभ्य तदाविष्करणमसूयादि-
निमित्तं यत्तत्साकारमन्त्रभेद इति कथ्यते । त एते सत्याणुव्रतस्य पञ्चातिचारा बोद्धव्याः ।
स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपक-
व्यवहाराः ॥ २७ ॥
§ ७१३. मुष्णन्तं स्वयमेव वा प्रयुङ्क्तेऽन्येन वा प्रयोजयति प्रयुक्तमनुमन्यते वा यतः स
स्तेनप्रयोगः । अप्रयुक्तेनाननुमतेन च चौरेणानीतस्य ग्रहणं तदाहृतादानम् । उचितन्यायादन्येन
प्रकारेण दानग्रहणमतिक्रमः विरुद्धं राज्यं विरुद्धराज्यं विरुद्धराज्येऽतिक्रमः विरुद्धराज्यातिक्रमः ।
§ ७११. किसीको अपने इष्ट स्थानमें जानेसे रोकनेके कारणको बन्ध कहते हैं। डंडा, चाबुक
और बेंत आदिसे प्राणियोंको मारना वध है। यहाँ वधका अर्थ प्राणोंका वियोग करना नहीं लिया
है क्योंकि अतिचारके पहले ही हिंसाका त्याग कर दिया जाता है। कान और नाक आदि अवयवों
का छेदना छेद है। उचित भारसे अतिरिक्त भारका लादना अतिभारारोपण है। गौ आदिको भूख-
प्यासके लगने पर अन्नपानका रोकना अन्नपाननिरोध है। ये पाँच अहिंसाणु व्रतके अतिचार हैं।
मिथ्योपदेश, रहोभ्याख्यान, कूटलेखक्रिया, न्यासापहार और साकारमंत्रभेद ये सत्याणुव्रतके
पाँच अतिचार हैं ॥२६॥
§ ७१२. अभ्युदय और मोक्षकी कारणभूत क्रियाओंमें किसी दूसरेको विपरीत मार्गसे लगा
देना या मिथ्या वचनों द्वारा दूसरोंको ठगना मिथ्योपदेश है। स्त्री और पुरुष द्वारा एकान्तमें
किये गये आचरण विशेषका प्रकट कर देना रहोभ्याख्यान है। दूसरेने न तो कुछ कहा और न
कुछ किया तो भी अन्य किसीकी प्रेरणासे उसने ऐसा कहा है और ऐसा किया है इस प्रकार छलसे
लिखना कूटलेखक्रिया है। धरोहरमें चाँदी आदिको रखनेवाला कोई उसकी संख्या भूलकर यदि
उसे कमती लेने लगा तो 'ठीक है' इस प्रकार स्वीकार करना न्यासापहार है। अर्थवश, प्रकरण-
वश, शरीरके विकारवश या भ्रूक्षेप आदिके कारण दूसरेके अभिप्रायको जान कर डाहसे उसका
प्रकट कर देना साकारमंत्रभेद है। इस प्रकार ये सत्याणुव्रतके पाँच अतिचार जानने चाहिए।
स्तेनप्रयोग, स्तेन आहृतादान, विरुद्धराज्यातिक्रम, हीनाधिक मानोन्मान और प्रतिरूपक-
व्यवहार ये अचौर्य अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२७॥
§ ७१३. किसीको चोरीके लिए स्वयं प्रेरित करना, या दूसरेके द्वारा प्रेरणा दिलाना या
प्रयुक्त हुए की अनुमोदना करना स्तेनप्रयोग है। अपने द्वारा अप्रयुक्त और असम्मत चोरके द्वारा
लायी हुई वस्तुका ले लेना तदाहृतादान है। यहाँ न्यायमार्गको छोड़ कर अन्य प्रकारसे वस्तु ली
१. -नुक्तं यत्किं मु० । २. -भ्रूनिक्षेपणादि -मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
- ७।२९ § ७१४ ] सप्तमोऽध्यायः २७७
तत्र ह्यल्पमूल्यलभ्यानि महार्घ्याणि द्रव्याणीति प्रयत्नः । प्रस्थादि मानम्, तुलाद्युन्मानम् । एतेन
न्यूनेनान्यस्मै देयमधिकानेनात्मनो ग्राह्यमित्येवमादिकूटप्रयोगो हीनाधिकमानोन्मानम् । कृत्रिमैर्हिरण्या-
दिभिर्वञ्चनापूर्वको व्यवहारः प्रतिरूपकव्यवहारः । त एते पञ्चादत्तादानाणुव्रतस्यातिचाराः ।
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीडाकाम-
तीव्राभिनिवेशाः ॥ २८ ॥ ५
§ ७१४. कन्यादानं विवाहः । परस्य विवाहः परविवाहः । परविवाहस्य करणं परविवाह-
करणम् । परपुरुषानिति गच्छतीत्येवं शीला¹ इत्वरी । कुत्सिता इत्वरी कुत्सायां क इत्वरिका । या
एकपुरुषभर्तृका सा परिगृहीता । या गणिकात्वेन पुंश्चलीत्वेन वा परपुरुषगमनशीला अस्वामिका
सा अपरिगृहीता । परिगृहीता चापरिगृहीता च परिगृहीतापरिगृहीते । इत्वरिके च ते परिगृहीता-
परिगृहीते च इत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीते, तयोर्गमने इत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमने । अङ्गं १०
प्रजननं योनिश्च ततोऽन्यत्र क्रीडा अनङ्गक्रीडा । कामस्य प्रवृद्धः परिणामः कामतीव्राभिनिवेशः ।
त एते पञ्च स्वदारसंतोषव्रतस्यातिचाराः ।
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः ॥ २९ ॥
गयी है इसलिए अतिचार है । विरुद्ध जो राज्य वह विरुद्धराज्य है । राज्यमें किसी प्रकारका विरोध
होने पर मर्यादाका न पालना विरुद्धराज्यातिक्रम है । यदि वहाँ अल्प मूल्यमें वस्तुएँ मिल गयीं तो १५
उन्हें महँगा बेचनेका प्रयत्न करना विरुद्धराज्यातिक्रम है । मानपदसे प्रस्थ आदि मापनेके बाट लिये
जाते हैं और उन्मानपदसे तराजू आदि तौलनेके बाट लिये जाते हैं । कमती माप-तौलसे दूसरेको
देना और बढ़ती माप-तौलसे स्वयं लेना इत्यादि कुटिलतासे लेन-देन करना हीनाधिकमानोन्मान
है । बनावटी चाँदी आदिसे कपटपूर्वक व्यवहार करना प्रतिरूपक व्यवहार है । इस प्रकार ये
अदत्तादान अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं । २०
परविवाहकरण, इत्वरिकापरिगृहीतागमन, इत्वारिका-अपरिगृहीतागमन, अनङ्गक्रीड़ा और
कामतीव्राभिनिवेश ये स्वदारसन्तोष अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२८॥
§ ७१४. कन्याका ग्रहण करना विवाह है । किसी अन्यका विवाह परविवाह है और इसका
करना परविवाह-करण है । जिसका स्वभाव अन्य पुरुषोंके पास जाना-आना है वह इत्वरी कह-
लाती है । इत्वरी अर्थात् अभिसारिका । इसमें भी जो अत्यन्त आचरट होती है वह इत्वरिका २५
कहलाती है । यहाँ कुत्सित अर्थमें 'क' प्रत्यय होकर इत्वरिका शब्द बना है । जिसका कोई एक
पुरुष भर्ता है वह परिगृहीता कहलाती है । तथा जो वेश्या या व्यभिचारिणी होनेसे दूसरे पुरुषोंके
पास जाती-आती रहती है और जिसका कोई पुरुष स्वामी नहीं है वह अपरिगृहीता कहलाती है ।
परिगृहीता इत्वरिकाका गमन करना इत्वरिकापरिगृहीतागमन है और अपरिगृहीता इत्वरिकाका
गमन करना इत्वरिकाअपरिगृहीतागमन है । यहाँ अंग शब्दका अर्थ प्रजनन और योनि है । ३०
तथा इनके सिवा अन्यत्र क्रीडा करना अनंगक्रीडा है । कामविषयक बढ़ा हुआ परिणाम काम-
तीव्राभिनिवेश है । ये स्वदारसन्तोष अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ।
क्षेत्र और वास्तुके प्रमाणका अतिक्रम, हिरण्य और सुवर्णके प्रमाणका अतिक्रम, धन और
धान्यके प्रमाणका अतिक्रम, दासी और दासके प्रमाणका अतिक्रम तथा कुप्यके प्रमाणका अतिक्रम
ये परिग्रहपरिमाण अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२९॥ ३५
१. शीला इत्वरी कुत्सा-मु०, ता० ।
§ ७१५. क्षेत्रं सस्याधिकरणम् । वास्तु आगारम् । हिरण्यं रूप्यादिव्यवहारतन्त्रम् । सुवर्णं
प्रतीतम् । धनं गवादि । धान्यं व्रीह्यादि । दासीदासं भृत्यस्त्रीपुंसवर्गः । कुप्यं क्षौमकार्पासकौशे-
यचन्दनादि । क्षेत्रं च वास्तु च क्षेत्रवास्तु, हिरण्यं च सुवर्णं च हिरण्यसुवर्णम्, धनं च धान्यं च
धनधान्यम्, दासी च दासश्च दासीदासम् । क्षेत्रवास्तु च हिरण्यसुवर्णं च धनधान्यं च दासीदासं
च कुप्यं च क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यानि । एतावानेव परिग्रहो मम नान्य इति
परिच्छिन्नाणुप्रमाणात्क्षेत्रवास्त्वादिविषयादतिरेका अतिलोभवशात्प्रमाणातिक्रमा इति प्रत्याख्या-
यन्ते । त एते परिग्रहपरिमाणव्रतस्यातिचाराः ।
§ ७१६. उक्ता व्रतानामतिचाराः शीलानामतिचारा वक्ष्यन्ते । तद्यथा—
ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥ ३० ॥
§ ७१७. परिमितस्य दिगवधेरतिलङ्घनमतिक्रमः । स समासतस्त्रिविधः—ऊर्ध्वातिक्रमः
अधोऽतिक्रमस्तिर्यग्गतिक्रमश्चेति । तत्र पर्वताद्यारोहणादूर्ध्वातिक्रमः । कूपावतरणादेरधोऽतिक्रमः ।
बिलप्रवेशादेस्तिर्यग्गतिक्रमः । परिगृहीताया दिशो लोभावेषादाधिक्याभिसन्धिः क्षेत्रवृद्धिः । स
एषोऽतिक्रमः प्रमादान्मोहाद् ³व्यासङ्गाद्वा भवतीत्यवसेयः । अननुस्मरणं स्म
- ७।३४ § ७२१ ] सप्तमोऽध्यायः २७९
एवं कुर्विति नियोगः प्रेष्यप्रयोगः । व्यापारकरान्पुरुषान्प्रत्युत्कासिकादिकरणं शब्दानुपातः ।
स्वविग्रहदर्शनं रूपानुपातः । लोष्टादिनिपातः पुद्गलक्षेपः । त एते देशविरमणस्य पञ्चातिचाराः ।
कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥३२॥
§ ७१९. रागोद्रेकात्प्रहासमिश्रोऽशिष्टवाक्प्रयोगः कन्दर्पः । तदेवोभयं परत्र दुष्टकायकर्म- ५
प्रयुक्तं कौत्कुच्यम् । धाष्टर्यप्रायं१ यत्किंचनानर्थकं बहुप्रलापित्वं२ मौखर्यम् । असमीक्ष्य प्रयोजन-
माधिक्येन करणमसमीक्ष्याधिकरणम् । यावताऽर्थेनोपभोगपरिभोगौ सोऽर्थस्ततोऽन्यस्याधिक्य-
मानर्थक्यम् । त एते पञ्चानर्थदण्डविरतेरतिचाराः ।
योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३३ ॥
§ ७२०. योगो व्याख्यातस्त्रिविधः । तस्य दुष्टं३ प्रणिधानं योगदुष्प्रणिधानम्—कायदुष्प्रणि-
धानं वाग्दुष्प्रणिधानं मनोदुष्प्रणिधानमिति । अनादरोऽनुत्साहः । अनैकाग्र्यं स्मृत्यनुपस्थानम् । त १०
एते पञ्च सामायिकस्यातिक्रमाः ।
अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३४ ॥
§ ७२१. जन्तवः सन्ति न सन्ति वेति प्रत्यवेक्षणं चक्षुर्व्यापारः । मृदुनोपकरणेन यत्क्रियते
प्रयोजनं तत्प्रमार्जितम् । तदुभयं प्रतिषेधविशिष्टमुत्सर्गादिभिस्त्रिभिरभिसंबध्यते४—अप्रत्यवेक्षिता-
की आज्ञा करना आनयन है । ऐसा करो इस प्रकार काममें लगाना प्रेष्यप्रयोग है। जो पुरुष १५
किसी उद्योगमें जुटे हैं उन्हें उद्देश्य कर खाँसना आदि शब्दानुपात है। उन्हीं पुरुषोंको अपने
शरीरको दिखलाना रूपानुरूपात है । ढेला आदिका फेंकना पुद्गलक्षेप है । इस प्रकार देशविरमण
व्रतके पाँच अतिचार हैं।
कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये अनर्थदण्ड-
विरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३२॥ २०
§ ७१९. रागभावकी तीव्रतावश हास्यमिश्रित असभ्य वचन बोलना कन्दर्प है। परिहास
और असभ्यवचन इन दोनोंके साथ दूसरेके लिए शारीरिक कुचेष्टाएँ करना कौत्कुच्य है। धीठता-
को लिये हुए निःसार कुछ भी बहुत बकवास करना मौखर्य है । प्रयोजनका विचार किये बिना
मर्यादाके बाहर अधिक काम करना असमीक्ष्याधिकरण है। उपभोग परिभोगके लिए जितनी वस्तु-
की आवश्यकता है वह अर्थ है उससे अतिरिक्त अधिक वस्तु रखना उपभोगपरिभोगानर्थक्य है। २५
इस प्रकार ये अनर्थदण्डविरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
काययोगदुष्प्रणिधान, वचनयोगदुष्प्रणिधान, मनोयोगदुष्प्रणिधान, अनादर और स्मृतिका
अनुपस्थान ये सामायिक व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३३॥
§ ७२०. तीन प्रकारके योगका व्याख्यान किया जा चुका है। उसका बुरी तरहसे चलते
रहना योगदुष्प्रणिधान है जो तीन प्रकारका है - कायदुष्प्रणिधान, वचनदुष्प्रणिधान और मनो- ३०
दुष्प्रणिधान । उत्साहका न होना अनुत्साह है और वही अनादर है। तथा एकाग्रताका न होना
स्मृत्यनुपस्थान है । इस प्रकार ये सामायिक व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित भूमिमें उत्सर्ग, अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित वस्तुका आदान, अप्रत्य-
वेक्षित अप्रमार्जित संस्तरका उपक्रमण, अनादर और स्मृतिका अनुपस्थान ये प्रोषधोपवास व्रतके
पाँच अतिचार हैं ॥३४॥ ३५
§ ७२१. जीव हैं या नहीं हैं इस प्रकार आँखसे देखना प्रत्यवेक्षण कहलाता है और कोमल
उपकरणसे जो प्रयोजन साधा जाता है वह प्रमार्जित कहलाता है । निषेधयुक्त इन दोनों पदोंका
१. -प्रायं बहु-आ., दि. १, दि. २ । २. -प्रलपितं मौ-मु. । ३. दुःप्रणि-मु. । ४. -दिभिरभि-मु. ।
२८० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।३५ § ७२२ -
प्रमार्जितोत्सर्ग इत्येवमादि । तत्र अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितायां १ भूमौ मूत्रपुरीषोत्सर्गः अप्रत्यवेक्षिताप्र-
मार्जितोत्सर्गः । अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितस्यार्हदाचार्यपूजोपकरणस्य गन्धमाल्यधूपायदेरात्मपरिधाना-
र्थस्य च वस्त्रादेरादानमप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितादानम् । अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितस्य प्रावरणादेः
संस्तरस्योपक्रमणं अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितसंस्तरोपक्रमणम् । क्षुद्भ्यर्दितत्वादावश्यकेष्वनादरोऽनु-
त्साहः । स्मृत्यनुपस्थानं व्याख्यातम् । त एते पञ्च प्रोषधोपवासस्यातिचाराः ।
सचित्तसंबन्धसंमिश्राभिषवदुष्पक्वाहाराः ॥३५॥
§ ७२२. सह चित्तेन वर्तते इति सचित्तं चेतनावद् द्रव्यम् । तदुपश्लिष्टः संबन्धः ।
तद्व्यतिकीर्णः संमिश्रः । कथं पुनरस्य सचित्तादिषु प्रवृत्तिः २ । प्रमादसंमोहाभ्याम् । द्रवो वृष्यो
वाभिषवः । असम्यक्पक्वो दुष्पक्वः । एतैराहारो विशेष्यते—सचित्ताहारः संबन्धाहारः संमिश्रा-
हारोऽभिषवाहारो दुष्पक्वाहार इति । त एते पञ्च भोगोपभोगपरिसंख्यानस्यातिचाराः ।
सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥३६॥
§ ७२३. सचित्ते पद्मपत्रादौ निक्षेपः सचित्तनिक्षेपः । अपिधानमावरणम् । सचित्तेनैव
संबध्यते सचित्तापिधानमिति । अन्यदातृदेयार्पणं परव्यपदेशः । प्रयच्छतोऽप्यादराभावोऽन्यदातृ-
उत्सर्ग आदि अगले तीन पदोंसे सम्बन्ध होता है । यथा—अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग आदि ।
बिना देखी और बिना प्रमार्जित भूमिमें मल मूत्रका त्याग करना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग है ।
अरहंत और आचार्यकी पूजाके उपकरण, गन्ध, माला और धूप आदिको तथा अपने ओढ़ने आदि-
के वस्त्रादि पदार्थोंको बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए ले लेना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जिता-
दान है । बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए प्रावरण आदि संस्तरका बिछाना अप्रत्य-
वेक्षिताप्रमार्जितसंस्तरोपक्रमण है । भूखसे पीड़ित होनेके कारण आवश्यक कार्योंमें अनुत्साहित
होना अनादर है । स्मृत्यनुपस्थानका व्याख्यान पहले किया ही है । इस प्रकार ये प्रोषधोपवास
व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
सचित्ताहार, सम्बन्धाहार, सम्मिश्राहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये उपभोगपरि-
परिमाण व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३५॥
§ ७२२. जो चित्त सहित है वह सचित्त कहलाता है । सचित्तसे चेतना सहित द्रव्य लिया
जाता है । इससे सम्बन्धको प्राप्त हुआ द्रव्य सम्बन्धाहार है । और इससे मिश्रित द्रव्य सम्मिश्र
है । शंका—यह गृहस्थ सचित्तादिकमें प्रवृत्ति किस कारणसे करता है ? समाधान—प्रमाद और
सम्मोहके कारण । द्रव, वृष्य और अभिषव इनका एक अर्थ है । जो ठीक तरहसे नहीं पका है
वह दुःपक्व है । ये पाँचों शब्द आहारके विशेषण हैं या इनसे आहार पांच प्रकारका हो जाता
है । यथा—सचित्ताहार, सम्बन्धाहार, सम्मिश्राहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये सब भोगोप-
भोग परिसंख्यान व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
सचित्तनिक्षेप, सचित्तापिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रम ये अतिथिसंविभाग
व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३६॥
§ ७२३. सचित्त कमलपत्र आदिमें रखना सचित्तनिक्षेप है । अपिधानका अर्थ ढांकना है ।
इस शब्दको भी सचित्त शब्दसे जोड़ लेना चाहिए जिससे सचित्त कमलपत्र आदिसे ढांकना यह
अर्थ फलित होता है । इस दानकी वस्तुका दाता अन्य है यह कहकर देना परव्यपदेश है । दान
१. -मार्जितभूमौ आ०, दि०, १, दि० २ । २. -त्तिः स्यात् । प्रमा-मु० ।
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- ७३७ § ७२७ ] सप्तमोऽध्यायः २८१
गुणासहनं वा मात्सर्यम् । अकाले भोजनं कालातिक्रमः । त एते पञ्चातिथिसंविभागशीला-
तिचाराः ।
जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥
§ ७२४. आशंसनमाशंसा आकाङ्क्षणमित्यर्थः । जीवितं च मरणं च जीवितमरणम्,
जीवितमरणस्याशंसे जीवितमरणाशंसे । पूर्वसुहृत्सहपांसुक्रीडनाद्यनुस्मरणं मित्रानुरागः । अनुभूत- ५
प्रीतिविशेषस्मृतिसमन्वाहारः सुखानुबन्धः । भोगाकाङ्क्षया नियतं दीयते चित्तं तस्मिंस्तेनेति वा
निदानम् । त एते पञ्च सल्लेखनाया अतिचाराः ।
§ ७२५. अत्राह, उक्तं भवता¹ तीर्थंकरत्वकारणकर्मसूत्रनिर्देशे 'शक्तिस्तस्त्यागतपसी' इति,
पुनश्चोक्तं शीलविधाने 'अतिथिसंविभाग' इति । तस्य दानस्य लक्षणमनिर्ज्ञातं तदुच्यतामित्यत
आह— १०
अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥
§ ७२६. स्वपरोपकारोऽनुग्रहः । स्वोपकारः पुण्यसंचयः, परोपकारः सम्यग्ज्ञानादिवृद्धिः ।
'स्व'शब्दो धनपर्यायवचनः । अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गस्त्यागो दानं वेदितव्यम् ।
§ ७२७. अत्राह—उक्तं दानं तत्किमविशिष्टफलमाहोस्विदस्ति कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत
आह— १५
विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥३६॥
करते हुए भी आदरका न होना या दूसरे दाताके गुणोंको न सह सकना मात्सर्य है । भिक्षाकालके
सिवा दूसरा काल अकाल है और उसमें भोजन कराना कालातिक्रम है । ये सब अतिथिसंविभागके
शीलव्रतके पाँच अतिचार हैं ।
जीविताशंसा, मरणाशंसा, मित्रानुराग, सुखानुबन्ध और निदान ये सल्लेखनाके पाँच अति- २०
चार हैं ॥३७॥
§ ७२४. आशंसाका अर्थ चाहना है । जीनेकी चाह करना जीविताशंसा है और मरनेकी
चाह करना मरणाशंसा है । पहले मित्रोंके साथ पांसुक्रीड़न आदि नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ की रहीं
उनका स्मरण करना मित्रानुराग है । अनुभवमें आये हुए विविध सुखोंका पुनः-पुनः स्मरण
करना सुखानुबन्ध है । भोगाकांक्षासे जिसमें या जिसके कारण चित्त नियमसे दिया जाता है २५
वह निदान है । ये सब सल्लेखनाके पाँच अतिचार हैं ।
§ ७२५. तीर्थंकर पदके कारणभूत आस्रवके कारणोंका कथन करते समय शक्तिपूर्वक त्याग
और तप कहा; पुनः शीलोंका कथन करते समय अतिथिसंविभागव्रत कहा परन्तु दानका लक्षण
अभीतक ज्ञात नहीं हुआ इसलिए दानका स्वरूप बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अनुग्रहके लिए अपनी वस्तुका त्याग करना दान है ॥३८॥ ३०
§ ७२६. स्वयं अपना और दूसरेका उपकार करना अनुग्रह है । दान देनेसे पुण्यका संचय
होता है यह अपना उपकार है तथा जिन्हें दान दिया जाता है उनके सम्यग्ज्ञान आदिकी वृद्धि
होती है यह परका उपकार है । सूत्रमें आये हुए स्वशब्दका अर्थ धन है । तात्पर्य यह है कि अनु-
ग्रहके लिए जो धनका अतिसर्ग अर्थात् त्याग किया जाता है वह दान है ।
§ ७२७. दानका स्वरूप कहा तब भी उसका फल एक-सा होता है या उसमें कुछ विशेषता ३५
है, यह बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
विधि, देय, वस्तु, दाता और पात्रकी विशेषतासे उसकी विशेषता है ॥३९॥
१. भगवता मु०, ता० ।
३६
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२८२ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।३९ § ७२८ –
§ ७२८. प्रतिग्रहादिक्रमो विधिः । विशेषो गुणकृतः । तस्य प्रत्येकमभिसंबन्धः क्रियते—
विधिविशेषो द्रव्यविशेषो दातृविशेषः पात्रविशेष इति । तत्र विधिविशेषः प्रतिग्रहादिष्वादरानादर-
कृतो भेदः तपःस्वाध्यायपरिवृद्धिहेतुत्वादिर्र्द्रव्यविशेषः । अनसूयाविषादादिर्दातृविशेषः । मोक्षकारण-
गुणसंयोगः पात्रविशेषः । ततश्च पुण्यफलविशेषः क्षित्यादिविशेषाद्¹ बीजफलविशेषवत् ।
५ इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥७॥
§ ७२८. प्रतिग्रह आदि करनेका जो क्रम है वह विधि है । विशेषता गुणसे आती है ।
इस विशेष शब्दको विधि आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा—विधिविशेष, द्रव्य-
विशेष, दाताविशेष और पात्रविशेष । प्रतिग्रह आदिकमें आदर और अनादर होनेसे जो भेद होता
है वह विधिविशेष है । जिससे तप और स्वाध्याय आदिकी वृद्धि होती है वह द्रव्यविशेष है । अन-
१० सूया और विषाद आदिका न होना दाताकी विशेषता है । तथा मोक्षके कारणभूत गुणोंसे युक्त
रहना पात्रकी विशेषता है । जैसे पृथिवी आदिमें विशेषता होनेसे उससे उत्पन्न हुए बीजमें विशे-
षता आ जाती है वैसे ही विधि आदिककी विशेषतासे दानसे प्राप्त होनेवाले पुण्य फलमें विशेषता
आ जाती है ।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥७॥
१५ १. क्षेत्रादि-मु. ।
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अथाष्टमोऽध्यायः
§ ७२९. व्याख्यात आस्रवपदार्थः । तदनन्तरोद्देशभागबन्धपदार्थ इदानीं व्याख्येयः । तस्मि-
न्न्याख्येये सति पूर्वं बन्धहेतूपन्यासः क्रियते; तत्पूर्वकत्वाद् बन्धस्येति—
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥
§ ७३०. मिथ्यादर्शनादय उक्ताः । क्व । मिथ्यादर्शनं तावदुक्तम्, 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्-
दर्शनम्' इत्यत्र तत्प्रतिपक्षभूतम्, आस्रवविधाने च क्रियासु व्याख्यातं मिथ्यादर्शनक्रियेति । विर-
तिरुक्ता । तत्प्रतिपक्षभूता अविरतिर्ग्राह्या । आज्ञाव्यापादनक्रिया अनाकाङ्क्षाक्रियेत्यनयोः प्रमाद-
स्यान्तर्भावः । स च प्रमादः कुशलेष्वनादरः । कषायाः क्रोधादयः अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्या-
ख्यानसंज्वलनविकल्पाः प्रोक्ताः । क्व । 'इन्द्रियकषाया' इत्यत्रैव । योगाः कायादिविकल्पाः
प्रोक्ताः । क्व । 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र ।
§ ७३१. मिथ्यादर्शनं द्विविधम्; नैसर्गिकं परोपदेशपूर्वकं च । तत्र परोपदेशमन्तरेण
मिथ्यात्वकर्मोदयवशाद् यदाविर्भवति तत्त्वार्थाश्रद्धानलक्षणं तन्नैसर्गिकम् । परोपदेशनिमित्तं चतु-
र्विधम्; क्रियाक्रियावाद्यज्ञानिकवैनयिकविकल्पात् । अथवा पञ्चविधं मिथ्यादर्शनम्—एकान्त-
मिथ्यादर्शनं विपरीतमिथ्यादर्शनं संशयमिथ्यादर्शनं वैनयिकमिथ्यादर्शनम् अज्ञानिकमिथ्यादर्शनं
§ ७२९. आस्रव पदार्थका व्याख्यान किया अब उसके बाद कहे गये बन्ध पदार्थका व्याख्यान
करना चाहिए । उसका व्याख्यान करते हुए पहले बन्धके कारणोंका निर्देश करते हैं, क्योंकि बन्ध
तत्पूर्वक होता है—
मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये बन्धके हेतु हैं ॥१॥
§ ७३०. मिथ्यादर्शन आदिका व्याख्यान पहले किया जा चुका है । शंका—इनका व्याख्यान
पहले कहाँ किया है ? 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्' इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनका व्याख्यान किया है ।
मिथ्यादर्शन उसका उलटा है, अतः इससे उसका भी व्याख्यान हो जाता है । या आस्रवका कथन
करते समय पच्चीस क्रियाओंमें मिथ्यादर्शनका व्याख्यान किया है । विरतिका व्याख्यान पहले
कर आये हैं । उसकी उलटी अविरति लेनी चाहिए । प्रमादका अन्तर्भाव आज्ञाव्यापादनक्रिया
और अनाकांक्षाक्रिया इन दोनोंमें हो जाता है । अच्छे कार्योंके करनेमें आदरभावका न होना यह
प्रमाद है । कषाय क्रोधादिक हैं जो अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलनके
भेदसे अनेक प्रकारके हैं । इनका भी पहले कथन कर आये हैं । शंका—कहाँ पर ? समाधान—
'इन्द्रियकषाया' इत्यादि सूत्रका व्याख्यान करते समय । तथा कायादिके भेदसे तीन प्रकारके योग-
का व्याख्यान भी पहले कर आये हैं । शंका—कहाँ पर ? समाधान—'कायवाङ्मनःकर्म योगः'
इस सूत्रमें ।
§ ७३१. मिथ्यादर्शन दो प्रकारका है—नैसर्गिक और परोपदेशपूर्वक । इनमेंसे जो परोप-
देशके बिना मिथ्यादर्शन कर्मके उदयसे जीवादि पदार्थोंका अश्रद्धानरूप भाव होता है वह नैसर्गिक
मिथ्या दर्शन है । तथा परोपदेशके निमित्तसे होनेवाला मिथ्यादर्शन चार प्रकारका है—क्रियावादी,
अक्रियावादी, अज्ञानी और वैनयिक । अथवा मिथ्यादर्शन पाँच प्रकारका है—एकान्त मिथ्यादर्शन,
१. श्रद्धानं इत्यत्र आ०, दि० १, दि० २ । २. -ज्ञानिवै-मु० । ३. अज्ञानमिथ्या-मु० ।
चेति । तत्र इदमेव इत्थमेवेति धर्मिधर्मयोरभिनिवेश एकान्तः । “पुरुष एवेदं सर्वम्१” इति वा
नित्य एव वा अनित्य एवेति । सग्रन्थो निर्ग्रन्थः, केवली कवलाहारी, स्त्री सिध्यतीत्येवमादिः
विपर्ययः । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि किं मोक्षमार्गः स्याद्वा न वेत्यन्तरपक्षापरिग्रहः संशयः । सर्व-
देवतानां सर्वसमयानां च समदर्शनं वैनयिकम् । हिताहितपरीक्षाविरहोऽज्ञानिकत्वम् । उक्तं च—
५ “असिदिसदं २ किरियाणं अक्किरियाणं३ तह य होइ चुलसीदी ।
४सत्तट्ठमण्णाणीणं वेणइयाणं तु बत्तीसं ॥”
§ ७३२. अविरतिर्द्वादशविधा; षट्कायषट्करणविषयभेदात् । षोडश कषाया नव नोकषायो-
स्तेषामीषद्वेदो न भेद इति पञ्चविंशतिः कषायाः । चत्वारो मनोयोगाश्चत्वारो वाग्योगाः पञ्च
काययोगा इति त्रयोदशविकल्पो योगः । आहारककाययोगाहारकमिश्रकाययोगयोः प्रमत्तसंयते
१० संभवात्पञ्चदशापि५ भवन्ति । प्रमादोऽनेकविधैः; शुद्धयष्टकोत्तमक्षमादिविषयभेदात्६ । त एते पञ्च
बन्धहेतवः समस्ता व्यस्ताश्च भवन्ति । तद्यथा—मिथ्यादृष्टेः पञ्चापि समुदािता बन्धहेतवो भवन्ति ।
स सादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टीनामविरत्यादयश्चत्वारः । संयतासंयतस्या-
विरतिविरतिमिश्रा प्रमादकषाययोगाश्च । प्रमत्तसंयतस्य प्रमादकषाययोगाः । अप्रमत्तादीनां
विपरीतमिथ्यादर्शन, संशयमिथ्यादर्शन, वैनयिकमिथ्यादर्शन और अज्ञानिक मिथ्यादर्शन ।
१५ यही है, इसी प्रकारका है इस प्रकार धर्म और धर्मीमें एकान्तरूप अभिप्राय रखना एकान्त
मिथ्यादर्शन है । जैसे यह सब जग परब्रह्म रूप ही है, या सब पदार्थ अनित्य ही हैं या नित्य ही
हैं । सग्रन्थको निर्ग्रन्थ मानना, केवलीको कवलाहारी मानना और स्त्री सिद्ध होती है इत्यादि
मानना विपर्यय मिथ्यादर्शन है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर
क्या मोक्षमार्ग है या नहीं इस प्रकार किसी एक पक्षको स्वीकार नहीं करना संशय मिथ्यादर्शन
२० है। सब देवता और सब मतोंको एक समान मानना वैनयिक मिथ्यादर्शन है। हिताहितकी
परीक्षासे रहित होना अज्ञानिक मिथ्यादर्शन है। कहा भी है—“क्रियावादियोंके एकसौ अस्सी,
अक्रियावादियोंके चौरासी, अज्ञानियोंके सरसठ और वैनयिकोंके बत्तीस भेद हैं।
§ ७३२. छहकायके जीवोंकी दया न करनेसे और छह इन्द्रियोंके विषयभेदसे अविरति
बारह प्रकारकी होती है। सोलह कषाय और नौ नोकषाय ये पच्चीस कषाय हैं। यद्यपि कषायोंसे
२५ नोकषायोंमें थोड़ा भेद है पर वह यहाँ विवक्षित नहीं है, इसलिए सबको कषाय कहा है। चार
मनोयोग, चार वचनयोग और पाँच काययोग ये योगके तेरह भेद हैं। प्रमत्तसंयत गुणस्थानमें
आहारक ऋद्धिधारी मुनिके आहारककाययोग और आहारक मिश्रकाययोग भी सम्भव हैं इस
प्रकार योग पन्द्रह भी होते हैं। शुद्धयष्टक और उत्तम क्षमा आदि विषयक भेदसे प्रमाद अनेक
प्रकारका है। इस प्रकार ये मिथ्यादर्शन आदि पाँचों मिलकर या पृथक्-पृथक् बन्धके हेतु हैं।
३० स्पष्ट इस प्रकार है—मिथ्यादृष्टि जीवके पाँचों ही मिलकर बन्धके हेतु हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि,
सम्यग्मिथ्यादृष्टि और अविरतसम्यग्दृष्टिके अविरति आदि चार बन्धके हेतु हैं। संयतासंयतके
विरति और अविरति ये दोनों मिश्ररूप तथा प्रमाद, कषाय और योग ये बन्धके हेतु हैं। प्रमत्त-
संयतके प्रमाद, कषाय और योग ये तीन बन्धके हेतु हैं। अप्रमत्तसंयत आदि चारके योग और
१. इति वा नित्यमेवेति मु०, दि० १, दि० २, आ० । २. गो० कर्म०, गा० ८७६ । ३. -याणं च
३५ होइ मु० । ४. सत्तच्छण्णा-मु० । ५. -पायाः ईषद्भे-दि० १, दि० २, आ० । ६. -दश भवन्ति आ०,
दि० १, दि० २ । ७. -नेकविधः पञ्चसमितित्रिगुप्तिशुद्धय-मु०, आ०, दि० १, दि० २ । ८. -भेदात् ।
शुद्धयष्टकस्यार्थः भावकायविनयेर्यापथभिक्षाप्रतिष्ठापनशयनासनवाक्यशुद्धयोऽष्टौ दशलक्षणो धर्मश्च । त एते
मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।
- ८।२ § ७३४ ] अष्टमोऽध्यायः २८५
चतुर्णां योगकषायौ। उपशान्तकषायक्षीणकषायसयोगकेवलिनामेक एव योगः। अयोगकेवलिनो
न बन्धहेतुः।
§ ७३३. उक्ता बन्धहेतवः। इदानीं बन्धो वक्तव्य इत्यत आह—
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥ २ ॥
§ ७३४. सह कषायेण वर्तत इति सकषायः। सकषायस्य भावः सकषायत्त्वम्। तस्मात्स- ५
कषायत्वादिति। पुनर्हेतुनिर्देशः¹ जठराग्न्याशयानुरूपाहारग्रहणवत्तीव्रमन्दमध्यमकषायाशयानुरूप-
स्थित्यनुभवविशेषप्रतिपत्त्यर्थम्²। अमूर्तिरहस्त आत्मा कथं कर्मादत्त इति चोदितः सन् ‘जीवः’
इत्याह। जीवनाज्जीवः प्राणधारणादायूःसंबन्धान्नायुर्विरहादिति। ‘कर्मयोग्यान्’ इति लघुनिर्देशा-
त्सिद्धे ‘कर्मणो योग्यान्’ इति पृथग्विभक्त्युच्चारणं वाक्यान्तरज्ञापनार्थम्। किं पुनस्तद्वा-
क्यान्तरम्। कर्मणो जीवः सकषायो भवतीत्येकं वाक्यम्। एतदुक्तं भवति—‘कर्मणः’ इति १०
हेतुनिर्देशः कर्मणो हेतोर्जीवः सकषायो भवति नाकर्मकस्य कषायलेपोऽस्ति। ततो जीवकर्मणोरना-
दिसंबन्ध इत्युक्तं भवति। तेनामूर्तो जीवो मूर्तेन कर्मणा कथं बध्यते इति चोद्यमपाकृतं भवति।
इतरथा हि बन्धस्यादिमत्त्वे आत्यन्तिकीं शुद्धिं दधतः सिद्धस्येव बन्धाभावः प्रसज्येत। द्वितीयं
वाक्यं ‘कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते’ इति। अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति³ पूर्वहेतुसंबन्धं
कषाय ये दो बन्धके हेतु हैं। उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली इनके एक योग ही १५
बन्धका हेतु है। अयोगकेवलीके बन्धका हेतु नहीं है।
§ ७३३. बन्धके हेतु कहे। अब बन्धका कथन करना चाहिए इसलिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
कषाय सहित होनेसे जीव कर्मके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता है वह बन्ध है ॥२॥
§ ७३४. कषायके साथ रहता है इसलिए सकषाय कहलाता है और सकषायका भाव २०
सकषायत्व है। इससे अर्थात् सकषाय होनेसे। यह हेतुनिर्देश है। जिस प्रकार जठराग्निके अनु-
रूप आहारका ग्रहण होता है उसी प्रकार तीव्र, मन्द और मध्यम कषायाशयके अनुरूप ही स्थिति
और अनुभाग होता है। इस प्रकार इस विशेषताका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें ‘सकषायत्वात्’ इस
पदद्वारा पुनः हेतुका निर्देश किया है। अमूर्ति और बिना हाथवाला आत्मा कर्मोंको कैसे ग्रहण
करता है इस प्रश्नका उत्तर देनेके अभिप्रायसे सूत्रमें ‘जीव’ पद कहा है। जीव शब्दका व्युत्पत्ति- २५
लभ्य अर्थ है—जीवनाज्जीवः—जो जीता है अर्थात् जो प्राणोंको धारण करता है, जिसके आयुका
सद्भाव है, आयुका अभाव नहीं है वह जीव है। सूत्रमें ‘कर्मयोग्यान्’ इस प्रकार लघु निर्देश
करनेसे काम चल जाता फिर भी ‘कर्मणो योग्यान्’ इस प्रकार पृथक् विभक्तिका उच्चारण वाक्या-
न्तरका ज्ञान करानेके लिए किया है। वह वाक्यान्तर क्या है? ‘कर्मणो जीवः सकषायो भवति’
यह एक वाक्य है। इसका यह अभिप्राय है कि ‘कर्मणः’ यह हेतुपरक निर्देश है। जिसका अर्थ है ३०
कि कर्मके कारण जीव कषायसहित होता है। कर्मरहित जीवके कषायका लेप नहीं होता। इससे
जीव और कर्मका अनादि सम्बन्ध है यह कथन निष्पन्न होता है। और इससे अमूर्त जीव मूर्त
कर्मके साथ कैसे बँधता है इस प्रश्नका निराकरण हो जाता है। अन्यथा बन्धको सादि मानने
पर आत्यन्तिक शुद्धिको धारण करनेवाले सिद्ध जीवके समान संसारी जीवके बन्धका अभाव
प्राप्त होता है। ‘कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते’ यह दूसरा वाक्य है, क्योंकि, अर्थके अनुसार ३५
विभक्ति बदल जाती है इसलिए पहले जो हेत्वर्थमें विभक्ति थी वह अब ‘कर्मणो योग्यान्’ इस
प्रकार षष्ठी अर्थको प्राप्त होती है। सूत्रमें ‘पुद्गल’ पद कर्मके साथ तादात्म्य दिखलानेके लिए
१. -निर्देशः किमर्थम् ? जठ-मु०, दि० १ । २. -त्यर्थः । अहस्त आत्मा ता०, ना० । ३. पूर्वं हेतु-मु० ।